पाकिस्तान का माफ़ी फ़रमान खारिज हुआ

Image caption राष्ट्रपति ज़रदारी की कुर्सी पर फ़िलहाल इसका असर नहीं पड़ेगा.

पाकिस्तान की एक अदालत ने उस विवादास्पद अध्यादेश को अवैध क़रार दिया है जिसके तहत वहां के कई राजनेताओं और वरिष्ठ अधिकारियों के ख़िलाफ़ दर्ज भ्रष्टाचार के मामले खत्म हो गए थे.

नैशनल रिकंसिलिएशन आर्डिनेंस या एनआरओ के नाम से प्रचलित इस क़ानून के लाभ उठाने वालों में राष्ट्रपति आसिफ अली ज़रदारी, गृह मंत्री रहमान मलिक, कई अन्य मंत्री, वरिष्ट नेता और सरकारी कर्मचारी शामिल हैं.

इस फ़ैसले के बाद ये मामले फिर से खोले जा सकेंगे लेकिन राष्ट्रपति ज़रदारी पर फ़िलहाल इसका असर नहीं होगा क्योंकि राष्ट्रपति की कुर्सी इस के दायरे में नहीं आती.

राष्ट्रपति आसिफ अली ज़रदारी के प्रवक्ता फरहातुल्लाह बाबर ने फैसला सुनने के अदालत के बाहर पत्रकारों को बताया कि राष्ट्रपति आसिफ ज़रदारी का इस्तीफ़ा देने का कोई सवाल ही पैदा नहीं हो सकता.

उन्होने कहा कि 12 साल पहले जो मुक़दमे दर्ज दिए गए थे उन के ख़िलाफ वो साबित नहीं हो सके और पीपुल्स पार्टी अदालती फ़ैसले का आदर करती है और सभी चुनौतियों का सामना करेगी. उन के मुताबिक राष्ट्रपति आसिफ ज़रादारी घबराने वाले नहीं हैं और उन की पार्टी मुक़दमों का सामना करेगी.

दूसरी ओर मुख्य विपक्षी पार्टी मुस्लिम नवाज़ ने इस फैसले का स्वागत किया है जिस ने इस का भारी विरोध किया था. मुस्लिम लीग ने राष्ट्रपति आसिफ ज़रदारी ने इस्तीफ़े की मांग की है.

सुप्रीम कोर्ट ने इस अध्यादेश के ख़िलाफ दायर याचिकाओं पर अपना संक्षिप्त फैसला साढ़े पांच घंटे बाद सुनाया. अदालत ने कहा कि यह अध्यादेश पाकिस्तान के संविधान से टकराव की स्थिति में है और यह ग़ैरक़ानूनी है.

पूर्व राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ ने 5 अक्तूबर 2007 को यह अध्यादेश जारी किया था और इस उद्देश्य यह था कि जिन राजनेताओं और सरकारी कर्मचारियों के ख़िलाफ भ्रष्टाचार के मामले दर्ज थे वह ख़तम हो गए.

ये मामले पहली जनवरी 1986 से बारह अक्तूबर 1999 के बीच के हैं यानि दो फ़ौजी शासनों के बीच का समय.

इस अध्यादेश के ख़िलाफ कई याचिकाएँ दायर की गई थी जिनकी सुनवाई लगातार सात दिनों तक जारी रही और बुधवार की शाम को सुनवाई समाप्त की गई.

Image caption गृहमंत्री रहमान मलिक भी इसकी चपेट में आए हैं.

अदालत ने चारों प्रांतों को आदेश दिया है कि वह अभियुक्तों के ख़िलाफ नोटिस भेजे ताकि वह मुक़दमों का सामना कर सकें.

अदालत ने अपने फैसले में यह भी कहा कि पाकिस्तान के अटॉर्नी जनरल को कोई अधिकार नहीं है कि वह किसी नागरिक के ख़िलाफ विदेश में दर्ज मुक़दमे ख़त्म करने के लिए किसी को पत्र लिखे.

अदालत ने केंद्रीय सरकार को आदेश दिया है कि वह पूर्व अटॉर्नी जनरल मलिक क़यूम के ख़िलाफ कार्रवाई करे. मलिक क़यूम ने परवेज़ मुशर्रफ के कार्यकाल में पूर्व प्रधानमंत्री बेनज़ीर भुट्टो और राष्ट्रपति आसिफ अली ज़रदारी के ख़िलाफ स्विट्ज़रलैंड में दर्ज मुक़दमे को ख़तम करने केलिए स्विस सरकार को पत्र लिखा था.

ग़ौरतलब है कि कुछ सप्ताह पहले सत्तारूढ़ दल पीपुल्स पार्टी ने इस विवादास्पद अध्यादेश को संसद में पेश न करने का फ़ैसला लिया था.

विपक्ष और सत्तारूढ़ गठबंधन के कुछ दलों ने भी इस का भारी विरोध किया था जिससे पीपुल्स पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार को काफ़ी ख़तरा हो गया था.

प्रधानमंत्री यूसुफ़ रज़ा गिलानी ने संसद में बात करते हुए इस अध्यादेश के बारे में फ़ैसला अदालतों पर छोड़ दिया था.

उन्होंने संसद में बोलते हुए कहा था, '' मेरी सरकार ऐसे विवादास्पद नियमों को हाथ नहीं लगाएगी जिससे संस्थाओं को नुक़सान पहुँचे और सभी संस्थाओं को सुरक्षित बनाना मेरी सरकार का कर्तव्य है.''

उन्होंने आगे कहा था,'' अगर इस अध्यादेश पर सर्वसम्मति नहीं बनती तो इसको आन का मसला नहीं बनाया जाएगा.''

ग़ौरतलब है कि इस अध्यादेश पर पूर्व राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ ने 2007 में हस्ताक्षर किए थे.

इस अध्यादेश से उन लोगों को राहत मिली जिनके ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार और अन्य मामले दर्ज थे और बेनज़ीर भुट्टो की स्वदेश वापसी भी इसी के कारण हुई थी.

पाकिस्तान के संविधान के अनुसार जब तक राष्ट्रपति आसिफ ज़रदारी अपने पद पर बने हुए हैं तब तक उन के ख़िलाफ दायर मुक़दमे नहीं चल सकते हैं लेकिन मंत्रियों और दूसरे लोगों के ख़िलाफ मुक़दमे चल सकते हैं.

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