बांग्लादेश राइफ़ल्स का विद्रोह

  • 25 दिसंबर 2009
Image caption बांग्लादेश राइफ़ल्स के जवानों के विद्रोह में अनेक लोग मारे गए थे

वर्ष 2009 की शुरुआत बांग्लादेश में सात साल बाद हुए आम चुनाव में ऐतिहासिक जीत दर्ज करने वाली शेख हसीना के प्रधानमंत्री पद की शपथ ग्रहण के साथ हुई

इसके साथ ही पिछले लगभग दो बरसों से आपातकाल झेल चुके बांग्लादेश में लोकतांत्रिक सरकार ने कार्यभार संभाल लिया.

बांग्लादेश में जनवरी, 2007 में आपातकाल लागू कर दिया गया था और सैनिक नियंत्रण वाली अंतरिम सरकार शासन कर रही थी.

दिसंबर,2008 में ही देश में आपातकाल हटाकर आम चुनावों की अनुमति दी गई.

इन चुनावों में शेख हसीना सबसे बड़ी नेता के तौर पर उभरकर आईं.

शेख़ हसीना की पार्टी अवामी लीग के नेतृत्व वाले 14 दलों के गठबंधन ने इन चुनावों में नेशनल असेंबली की तीन सौ में से 260 से अधिक सीटें जीतीं थीं.

बीडीआर का विद्रोह

बांग्लादेश की राजधानी ढाका में 25 फ़रवरी को (बीडीआर) के जवानों ने विद्रोह कर दिया था.

लगभग 33 घंटे तक चले इस विद्रोह में सेना के बहुत सारे अधिकारियों समेत 74 लोग मारे गए थे.

ये विद्रोह बांग्लादेश राइफ़ल्स (बीडीआर) के जवानों ने किया था और बाद में ये विद्रोह ढाका के बाहर 12 अन्य शहरों में फैल गया था.

शुरुआत में कहा गया था कि वेतन, कामकाज का वातावरण और तरक्की के सवालों पर नाराज़ जवानों ने विद्रोह किया था.

उल्लेखनीय है कि शुरुआत में बांग्लादेश सरकार ने विद्रोह करने वालों को आम माफ़ी की पेशकश की थी लेकिन जब मारे गए लोगों की संख्या का असल आँकड़ा सामने आया तो सरकार ने कहा कि दोषियों को सज़ा दी जाएगी.

लेकिन प्रधानमंत्री शेख़ हसीना का कहना है कि ये उनकी सरकार को गिराने की साज़िश का हिस्सा हो सकता है.

बाद में बीडीआर के 40 जवानों से पूछताछ के दौरान ये बात सामने आई है कि जमायत-उल-मुजाहिदीन और कुछ जवानों के बीच संबंध था.

मुजीब की हत्या में सज़ा

Image caption शेख मुजीब के मामले में मौत की सज़ा सुनाई गई

सर्वोच्च न्यायालय ने बांग्लादेश के पहले राष्ट्रपति शेख़ मुजीबुर्रहमान की हत्या के मामले में पाँच पूर्व सैन्य अधिकारियों की अपील ख़ारिज कर दी थी.

उन्हें पहले ही मौत की सज़ा सुनाई जा चुकी थी और इस सज़ा के ख़िलाफ़ यह उनकी आख़िरी अपील थी.

जिन पांच पूर्व सैनिकों की अपील ख़ारिज की गई है वे शेख मुजीब की हत्या के आरोपों से इनकार नहीं करते, पर उनका कहना था कि उन पर मुक़दमा नागरिक अदालत में नहीं बल्कि सैन्य अदालत में चलना चाहिए.

यह बांग्लादेश में लंबे समय से चल रहा सबसे विवादास्पद मुक़दमा था. इस मामले की सुनवाई दस साल पहले शुरु हुई थी.

बांग्लादेश के पहले राष्ट्रपति शेख़ मुजीबुर्रहमान की उनके परिवार के ज़्यादातर सदस्यों के साथ 1975 में हत्या कर दी गई थी.

शेख़ मुजीबुर्रहमान की बेटी और इस समय बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख़ हसीना उस समय इसलिए बच गई थीं क्योंकि वे उस समय विदेश में थीं.

इसी साल जून में बांग्लादेश के सर्वोच्च न्यायालय ने फ़ैसला सुनाया था कि शेख़ मुजीबुर्रहमान ने ही बांग्लादेश की आज़ादी की घोषणा की थी इसलिए उन्हें ही राष्ट्रपिता माना जाना चाहिए.

आइला की तबाही

Image caption आइला तूफ़ान ने बांग्लादेश में भारी तबाही मचाई थी

समुद्री तूफ़ान 'आइला' ने पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश में 170 से अधिक लोगों की जान ले ली थी.

साथ ही लगभग पाँच लाख लोगों को बेघर कर दिया है.

राहत कार्य में सेना और सुरक्षाबलों की मदद ली गई.

समुद्री तूफ़ान 'आइला' से पश्चिम बंगाल में मची तबाही के बाद राज्य के तटीय ज़िलों से अनेक शव बरामद किए गए थे.

पड़ोसी देश बांग्लादेश से 'आइला' की वजह से लगभग सौ लोग मारे गए थे..

भारत-बांग्लादेश समझौता

Image caption शेख हसीना के सत्ता संभालने के बाद भारत से बांग्लादेश के संबंध सुधरे

भारत और बांग्लादेश ने मुजरिमों की अदला बदली समेत कई अहम मुद्दों पर समझौता किया.

दोनों देशों के बीच सीमा पर बाज़ार शुरू करने और रेल तथा जल मार्ग के ज़रिए व्यापार करने के लिए माल लाने ले जाने की अनुमति पर भी सहमति हुई.

बांग्लादेश की विदेश मंत्री दीपू मोनी की चार दिनों की भारत यात्रा के दौरान ये फ़ैसले किए गए हैं.

इस समझौते के बाद पूर्वोत्तर में सक्रिय चरमपंथी संगठनों के सदस्यों को सौंपने के लिए भारत बांग्लादेश पर दबाव डाल सकने में सफल रहा है.

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