आँग सान सू ची का संघर्ष जारी

Image caption आंग सान सू ची की नज़रबंदी के विरोध के स्वरों के बावजूद इसे बढ़ा दिया गया

बर्मा की लोकतंत्र समर्थक नेता आँग सान सू ची की नज़रबंदी की अवधि को इस साल एक बार फिर बढ़ा दिया गया.

आंग सान सू ची की नज़रबंदी की अवधि अमरीकी नागरिक जॉन येटॉ के उनके घर चले जाने के कारण डेढ़ साल बढ़ा दी गई.

बर्मा की लोकतंत्र समर्थक नेता आँग सान सू ची वर्षों से देश में लोकतंत्र की स्थापना की लड़ाई लड़ रही है. उन्हें बर्मा में लौह महिला की संज्ञा दी जाती है.

लेकिन जब पूरी दुनिया नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित 64 वर्षीय आँग सान सू ची की रिहाई की प्रतीक्षा कर रही थी तो एक बार फिर उनकी नज़रबंदी की अवधि बढ़ा दी गई.

बर्मा के लोगों के लिए देश के सैन्य शासन से मुक्ति की सू ची ही आख़िरी आशा हैं.

संघर्षभरा जीवन

सू ची का जीवन संघर्षों से भरा रहा है.

वर्ष 1991 में जब वे नज़रबंद थीं तब उन्हें बर्मा में शांति लाने के प्रयासों के लिए नोबेल शांति पुरस्कार दिया गया.

विदेश से बर्मा लौटने के लगभग 20 वर्षों में अधिकतर समय वे रंगून में नज़रबंद रही हैं.

पहली बार छह साल तक नज़रबंद रहने के बाद 10 जुलाई, 1995 को उन्हें रिहा किया गया था.

अक्सर कहा जाता है कि नज़रबंदी के प्रारंभिक दिनों ने उन्हें और मज़बूत बना दिया और उन्होंने अपना बाक़ी जीवन बर्मा के आम आदमी के प्रतिनिधि के रूप में बिताने का निश्चय किया.

बर्मा में आँग सान सूची के प्रति आकर्षण का एक मुख्य कारण यह भी है कि वे देश के स्वतंत्रता संग्राम के नायक जनरल आँग सान की पुत्री हैं.

स्वतंत्रता से केवल छह महीने पहले जुलाई 1947 में जनरल आँग सान की हत्या कर दी गई थी.

एक आम बर्मा वासी के लिए सू ची स्वतंत्रता की इच्छा का प्रतीक हैं.

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