राजनीतिक संकट से घिरा नेपाल

नेपाल की राजधानी काठमांड़ू में हज़ारों माओवादी सत्तारुढ़ गठबंधन सरकार के ख़िलाफ़ आंदोलन का झंडा उठाए हुए हैं.

माओवादियों की मांग है कि राष्ट्रपति के अधिकारों को लेकर संसद में बहस करवाई जानी चाहिए.

पिछले साल नेपाल में हुए चुनाव में माओवादियों ने हिस्सा लिया था और सबसे बड़ी पार्टी के रुप में उभरे थे.

लेकिन सेना प्रमुख कटवाल को बर्खास्त किए जाने के सरकार के फ़ैसले को जब राष्ट्रपति राम बरन यादव ने पलट दिया तो विरोध स्वरुप माओवादी नेता पुष्प कमल दहाल यानी प्रचंड ने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफ़ा दे दिया था और माओवादी सरकार से हट गए थे.

इसके बाद नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी के नेता माधव कुमार नेपाल को नेपाल का नया प्रधानमंत्री चुना गया था.

माओवादियों का आरोप है कि राष्ट्रपति ने मंत्रिमंडल का फ़ैसला अस्वीकार करने से निर्वाचित सरकार के अधिकारों का उल्लंघन किया है.

उनका कहना है कि सेना प्रमुख हज़ारों पूर्व माओवादियों को सेना में शामिल किए जाने के प्रस्ताव का विरोध कर रहे थे.

उनका कहना है कि ये प्रदर्शन तब तक जारी रहेंगे जब तक उनकी मांगें मान नहीं ली जातीं.

हालांकि अपने भाषण में प्रचंड ने कहा कि वे मामला सुलझाने के लिए सरकार को एक और मौका देने के लिए तैयार हैं.

बहुत से नेपालवासी माओवादियों की इस चेतावनी को सत्ता में लौटने की कोशिश की तरह देखते हैं.

नेपाल में सेना और माओवादी विद्रोहियों के बीच एक दशक तक भारी लड़ाई चली थी जिसमें लगभग 13 हज़ार लोग मारे गए थे.

वर्ष 2006 में नेपाल सरकार और माओवादियों के बीच एक शांति समझौते के बाद इस गृहयुद्ध का अंत हुआ था.

राम बरन यादव बने राष्ट्रपति

Image caption राम बरन यादव के राष्ट्रपति चुने जाने से माओवादियों को झटका

संविधान सभा में हुए दूसरे चरण के मतदान में नेपाली कांग्रेस के उम्मीदवार राम बरन यादव राष्ट्रपति चुनाव जीते थे.

राम बरन यादव ने रामराजा प्रसाद सिंह को हराया जो पूर्व माओवादी विद्रोहियों के उम्मीदवार थे.

राम बरन को कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ नेपाल और मधेशी पीपुल्स राइट्स फ़ोरम का समर्थन हासिल था.

राम बरन यादव का राष्ट्रपति चुने जाने से सरकार बनाने की माओवादियों की कोशिश को झटका लगा था.

नेपाल में राष्ट्रपति की भूमिका सांकेतिक है लेकिन नए सरकार के गठन में इसे अहम माना गया क्योंकि नए प्रधानमंत्री को शपथ राष्ट्रपति ही दिलाई थी.

हिंदी में शपथ पर विवाद

राष्ट्रपति चुनाव के तुरंत बाद नेपाल में वहाँ के सुप्रीम कोर्ट के जज परमानंद झा को पहला उपराष्ट्रपति चुना गया.

लेकिन परमानंद झा के हिंदी में शपथ लेने का नेपाल के कई हिस्सों में भारी विरोध हुआ.

उनके हिंदी में शपथ लेने को सुप्रीम कोर्ट में भी चुनौती दी गई.

सुप्रीम कोर्ट ने उनसे दोबारा नेपाली में शपथ लेने की व्यवस्था दी लेकिन उन्होंने ऐसा करने से इनकार कर दिया.

तब से नेपाल में उपराष्ट्रपति पद खाली है.

भारतीय पुजारियों की पिटाई

Image caption नेपाल में भारतीय पुजारियों की पिटाई से विवाद खड़ा हो गया था

नेपाल के पशुपतिनाथ मंदिर में माओवादियों ने दो नवनियुक्त भारतीय पुजारियों की पिटाई की थी और उनके कपड़े फाड़ दिए थे और जनेऊ को तोड़ दिया था.

पशुपतिनाथ मंदिर में भारतीय पुजारियों की नियुक्ति को लेकर माओवादी अपना विरोध जताते रहे हैं.

उनकी माँग है कि मंदिर में भारत के बजाय नेपाल के पुजारियों को नियुक्त करना चाहिए.

इस साल जनवरी में माओवादियों की अगुआई वाली सरकार ने प्रतिष्ठित पशुपतिनाथ मंदिर में पूजा अर्चना का काम नेपाल के ब्राह्मणों से कराने का फ़ैसला किया था. लेकिन इसका भारी विरोध हुआ था.

नेपाल के सुप्रीम कोर्ट ने स्थानीय पुजारियों की नियुक्ति पर प्रतिबंध लगाने के फ़ैसले के बावजूद तत्कालीन नेपाल सरकार ने ये नियुक्ति की थी.

इस मंदिर में परंपरागत तौर पर दक्षिण भारतीय ब्राह्मण ही पूजा पाठ कराते आए हैं. इन्हें भट्ट कहा जाता है. उनका सहयोग स्थानीय नेपाली पुजारी करते हैं, लेकिन उनका क़द ब्राह्मण पुजारियों से छोटा होता है.

नेपाली ब्राह्मणों को नियुक्त करने के फ़ैसले के विरोध के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री प्रचंड ने निर्णय वापस ले लिया था.

एवरेस्ट पर बैठक

Image caption नेपाल में कैबिनेट की बैठक एवरेस्ट पर हुई

पर्यावरण पर चिंता व्यक्त करने के लिए नेपाल के मंत्रिमंडल की बैठक एवरेस्ट के आधार शिविर में हुई.

नेपाल मंत्रिमंडल ने उम्मीद जताई थी कि उनका ये क़दम पृथ्वी के बढ़ते तापमान से हिमालय के ग्लेशियरों पर हो रहे असर को उठाएगा.

प्रधानमंत्री समेत पूरी मंत्रिमंडल कालिपतर गया जो समुद्र तट से 5000 मीटर की ऊँचाई पर है.

अनेक वैज्ञानिकों का कहना है कि ग्लेशियर ऐसी गति से पिघल रहे हैं कि एक अरब लोगों से अधिक का पानी का स्रोत ख़तरे में पड़ सकता है.

विशेषज्ञों का कहना है कि हिमालय के पिघलते ग्लेशियरों से उनसे निकलने वाली नदियों का भविष्य ख़तरे में पड़ जाएगा.

नेपाल दुनिया के कुल ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन के केवल .025 प्रतिशत के लिए ज़िम्मेदार है लेकिन उसे इन शिखरों की बर्फ़ पिघलने का भारी ख़मियाज़ा भुगतना पड़ेगा.

हिमालय के हज़ारों ग्लेशियर एशिया की दस प्रमुख नदियों का स्रोत हैं जिन पर करोड़ों का जीवन निर्भर है. पृथ्वी के बढ़ते तापमान के कारण अगले पचास वर्षों में ये नदियाँ सूख सकती हैं.

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