बिरादर की गिरफ़्तारी महत्वपूर्ण

सैनिक
Image caption अफ़गानिस्तान और पाकिस्तान में आए दिन तालेबान के लड़ाके हमले कर रहे हैं.

पाकिस्तान में तालेबान के शीर्ष कमांडर मुल्ला अब्दुल गनी बिरादर की गिरफ़्तारी 2007 मार्च के बाद अमरीकी खुफ़िया एजेंसी सीआईए और पाकिस्तानी खुफ़िया एजेंसी आईएसआई के लिए सबसे बड़ी सफलता है.

बिरादर को कराची में गिरफ़्तार किया गया है. मार्च 2007 में दोनों खुफ़िया एजेंसियों के गुप्तचरों ने मिलकर तालेबान के प्रमुख मुल्ला मोहम्मद उमर के सहयोगी और तालेबान के पूर्व रक्षा मंत्रि मुल्ला ओबेदुल्ला अखुंद को गिरफ्तार किया था.

मुल्ला ओबेदुल्ला और मुल्ला बिरादर दोनों ही उस दस सदस्यीय नेतृत्व परिषद के वरिष्ठ सदस्य हैं जिसकी स्थापना मुल्ला उमर ने 2003 में की थी जिसके बाद वो कहीं छिप गए थे.

दक्षिणी और पूर्वी अफ़गानिस्तान के सभी तालेबान कमांडरों को इसी परिषद को रिपोर्ट करनी होती है.

मुल्ला ओबेदुल्ला की क्वेटा में 2007 में हुई गिरफ़्तारी के बाद अफ़गानिस्तान में तालेबान की सारी ज़िम्मेदारी मुल्ला बिरादर पर ही आ गई थी.

बिरादर के महत्व का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि कुछ समय पहले यह ख़बरें आने लगी थीं कि बरादर ने मुल्ला उमर को मार दिया है या फिर इतना डरा दिया है कि मुल्ला उमर स्थायी रुप से कहीं छुप गए हैं.

विशेषज्ञों का मानना है कि बिरादर की गिरफ़्तारी तालेबान के बारे में पुष्ट ख़बरों के नज़िरए से एक बड़ी सफलता है क्योंकि बरादर के पास अफ़गानिस्तान में तालेबान की गतिविधियों की पूरी जानकारी भी होगी और साथ ही आईएसआई और तालेबान के संबंधों की भी.

लेकिन क्या मुल्ला बिरादर मुंह खोलेंगे. और अगर हां तो कितने समय में तालेबान अपनी जगह बदल लेगा ताकि बिरादर की जानकारियों का उन पर कोई असर न पड़े.

ये कठिन सवाल है जिसका उत्तर अभी किसी को नहीं पता.

उधर पाकिस्तान में कई लोगों का मानना है कि बिरादर की गिरफ़्तारी तालेबान के लिए झटका है क्योंकि अफ़गानिस्तान में तालेबान वैसे ही नैटो के हमलों से त्रस्त है.

वैसे मुल्ला बरादर की गिरफ़्तारी का एक और पहलू भी है. पश्चिमी देशों के सैन्य कमांडर और अफ़गानिस्तान की सरकार काफ़ी समय से तालेबान नेताओं के साथ अफ़गानिस्तान के संविधान के दायरे में बातचीत शुरु कराने की उम्मीद करती रही है.

कुछ हलकों में संकेत हैं कि पाकिस्तान ने ही बिरादर को गिरफ़्तार करवाया है ताकि उन तालेबान कमांडरों के साथ बातचीत शुरु करवाई जा सके जो बात करने के इच्छुक हैं.

अगर ये संकेत सही हुए तो अफ़गानिस्तान में जल्दी ही बातचीत शुरु हो सकती है.

इतना ही नहीं यह पाकिस्तान की रणनीति में एक बड़े बदलाव का भी संकेत होगा वो ये कि पाकिस्तान का अपने लोगों के ज़रिए अफ़गानिस्तान में शांति लाने की कोशिश करना.

लेकिन अगर ये गिरफ़्तारी सही मायने में सीआईए और आईएसआई का संयुक्त अभियान है तो फिर पाकिस्तान के पास अमरीका की बात मानने के अलावा कोई और विकल्प नहीं होगा.

अगर ऐसा हुआ तो फिर अफ़गानिस्तान में तालेबान नेतृत्व और पाकिस्तान में उनको समर्थन देने वालों की बेचैनी बढ़ जाएगी. इस स्थिति में पाकिस्तान सरकार के लिए और दिक्कत होगी क्योंकि वैसे ही सरकार पर अमरीकी पिट्ठू होने का ठप्पा लगता रहा है.

लेकिन इस समय जवाब से ज़्यादा सवाल हैं और इस मामले पर काफ़ी गर्द है जिसका साफ़ होना बाकी है.

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