युद्ध के बाद का श्रीलंकाः कुछ पड़ाव

श्रीलंका में मई 2009 को इतिहास ने एक अहम करवट ली थी. 26 बरस से जारी एलटीटीई और श्रीलंका सरकार का संघर्ष खत्म होने की घोषणा कर दी गई थी. एलटीटीई प्रमुख प्रभाकरन सदा के लिए सो गए थे और इसी के साथ तमिलों के लिए पृथक स्वायत्तता की मांग की आवाज़ केवल प्रतिध्वनियों का हिस्सा बन गई थी, नारे लगाने वाले गले खामोश हो चुके थे. संगीनें टूट चुकी थीं.

श्रीलंका इतिहास की नई दहलीज़ पर था. जहाँ से पुनर्निर्माण का एक दौर शुरू होना था. जहाँ शांति का एक नया एहसास जुड़ा था. जहाँ सत्ता नए सिरे से चीज़ों को सजाने, बनाने के वादे कर रही थी.

संघर्ष के बाद देश के पहले संसदीय चुनावों से जुड़े कुछ अहम सवालों और जवाबों पर डालिए एक नज़र-

कौन हैं प्रत्याशी और क्या हैं अहम मुद्दे..?

कुल 225 सीटों पर 7,620 प्रत्याशी अपनी किस्मत आज़मा रहे हैं. इनमें से 196 लोग सीधे संसद के लिए चुने जाएंगे. बाकी के लोग मत प्रतिशत के आधार पर चुने जाएंगे.

राष्ट्रपति राजपक्षे की यूनाइटेड पीपुल्स फ्रीडम पार्टी ने जनवरी में जनरल शरथ फोंसेका के खिलाफ़ चुनाव जीतकर अपनी सत्ता पर पकड़ क़ायम रखी थी. वो इसे दोहराना चाहेंगे और सत्ता के शीर्ष पर अपना प्रभाव बनाए रखना चाहेंगे.

राष्ट्रपति को उम्मीद है कि उनकी पार्टी को दो तिहाई बहुमत मिलेगा जिससे उनकी सरकार संविधान संशोधन कर पाने की स्थिति में होगी. उनके वर्तमान गठबंधन के पास 128 प्रतिनिधि हैं और माना जा रहा है कि इनमें से कुछ को कड़ी चुनौती से रूबरू होना पड़ेगा.

सत्तापक्ष के पास उम्मीद की वजह यह है कि विपक्ष कमज़ोर है. जनवरी की हार के बाद से विपक्ष बिखरा और बंटा हुआ है.

संवाददाताओं का कहना है कि चुनाव में मुख्य मुद्दे हैं बेरोज़गारी, कमज़ोर अर्थव्यवस्था, ग्रामीण विकास में पिछड़ेपन जैसी चुनौतियों से निपटना. इसके साथ साथ तमिल समुदाय के लोगों को कैसे मुख्यधारा में शामिल करें और भ्रष्टाचार से कैसे निपटें, ये भी अहम सवाल हैं.

राष्ट्रपति चुनाव को अभी तीन महीने ही बीते हैं इसलिए माना जा रहा है कि मतदान का प्रतिशत कम ही रहेगा.

तमिल मतों का क्या..?

इन चुनावों में तमिल समुदाय के बहुत सारे प्रत्याशी हैं लेकिन संकट यह है कि इनमें कोई सामंजस्य या एकता नज़र नहीं आती. हालांकि तमिल समुदाय के सबसे बड़े राजनीतिक धड़े तमिल राष्ट्रीय गठबंधन से अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद की जा रही है.

देश में तमिल आबादी 12 प्रतिशत है इसलिए सभी प्रमुख दलों ने तमिलों का मत हासिल करने के लिए कई लुभावने वादे किए हैं लेकिन इन वादों में तमिलों के अधिकारों को लेकर कोई खास बात नहीं कही गई है.

उधर, देश के उत्तरी हिस्से में अभी भी लाखों तमिल अस्थाई शिविरों में रहने को विवश हैं. विस्थापित तमिलों की इस दशा को लगभग एक वर्ष होने जा रहा है. तमिल राजनीतिक दलों की शिकायत है कि इनमें से कई लोगों को मतदाता पहचान पत्र तक नहीं मिले हैं.

आगे की प्रक्रिया..?

गुरुवार की शाम मतदान का काम पूरा हो रहा है. मतदान का काम सप्ताह के पूरे होने तक जारी रह सकता है क्योंकि पेचीदा प्रक्रिया और प्रत्याशियों की लंबी सूची के चलते अंतिम परिणाम आने में कुछ समय लगेगा.

संवाददाताओं का कहना है कि मतदान के बाद जो फैसले आएंगे उनसे भी बहुत कुछ बदलने वाला नहीं है क्योंकि सत्ता की बागडोर और ताकत राष्ट्रपति के हाथों में ही रहनी है.

नई संसद के सामने क्या नई चुनौतियां हैं..?

दो दशकों से भी लंबे चले संघर्ष में पिछड़ चुके और लगभग ध्वस्त से देश के उत्तरी और पूर्वी हिस्से को फिर से खड़ा करना, वहाँ राहत और आधारभूत ढांचे को फिर से तैयार करना सबसे अहम चुनौती है.

संघर्ष के क्षेत्र से बारूदी सुरंगों को हटाने का काम किया जाना है. वहाँ फिर से नए निर्माण करने की ज़रूरत है. लाखों तमिल लोग इस संघर्ष के दौरान विस्थापित हो गए थे. इनमें से कुछ लौट गए हैं और कुछ अभी भी राहत शिविरों में हैं. जिन लोगों को वापसी का मौका मिला है, उनके सामने अपने घरों और ज़रूरतों को फिर से खड़ा करने की चुनौती है. सरकार को इसमें मदद देनी होगी. एक बड़ी संख्या शिविरों से अपनी वापसी का इंतज़ार कर रही है.

इतना ही नहीं, तमिलों के लिए एक राजनीतिक समाधान भी एक बड़ी चुनौतीपूर्ण ज़िम्मेदारी है जिसका निर्वहन नई सरकार को करना होगा.

किन बातों के लिए लड़ रहे थे तमिल विद्रोही..?

सत्तर के दशक में अपनी स्वायत्तता और पृथक तमिल राष्ट्र- एलम- की मांग के साथ तमिल विद्रोहियों का संघर्ष शुरू हुआ. देश के उत्तरी और पूर्वी हिस्से में तमिल समुदाय की आबादी है और संघर्ष वहीं से सिर उठाता नज़र आया.

तर्क यह था कि अल्पसंख्यक तमिल समुदाय राजनीतिक और सामाजिक रूप से उपेक्षा का शिकार बनता रहा. उनके साथ कई स्तरों पर भेदभाव हुआ.

इसके बाद श्रीलंका के साथ साथ दुनिया ने उस दौर का सबसे कुशल प्रबंधित, व्यवस्थित, अनुशासित गुरिल्ला संघर्ष को देखा. वो संघर्ष जिसमें विद्रोहियों के पास अपनी मुद्रा, अपनी सेना, अपना मुख्यालय, अपनी वायु और नौसेना थी. आत्मघाती हमलों की कई बानगियाँ इस संघर्ष से निकलीं. भारत के प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या को दक्षिण एशिया के लोग नहीं भूल सकते.

क्या विद्रोहियों का पूरी तरह से दमन हो चुका है..?

श्रीलंका सरकार का दावा है कि विद्रोह और विद्रोहियों का पूरी तरह से दमन कर दिया गया है. लगभग तीन दशकों के बाद पहली बार ऐसा है कि सेना के पास पूरे श्रींलंका का नियंत्रण है.

विद्रोह का अंत इस तरह से कहा जा सकता है कयोंकि उनका नेतृत्व और सैन्य आधार पूरी तरह से समाप्त हो चुके हैं.

पर विद्रोह के विचार का अंत कहना मुश्किल है. दुनियाभर में तमिल समुदाय के लोगों के मन में इस आंदोलन के मूल भाव के प्रति सहानुभूति है, उससे उनका जुड़ाव है और उन्होंने मदद भी की है.

कई जानकार मानते हैं कि अगर श्रीलंका सरकार ने गंभीरता से तमिल समुदाय के पुनर्वास और फिर उनको समाज और देश की मुख्यधारा में लेने का काम नहीं किया तो तमिलों की नई पीढ़ियां आगे एक नई चुनौती बन सकती हैं. ज़रूरत है उस कटुता, अलगाव की खाई को पाटने की. सरकार की सबसे बड़ी चुनौती भी यही है.

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