पाकिस्तान ने संविधान में संशोधन किया

पाकिस्तानी संसद
Image caption पाकिस्तानी संसद के दोनों सदनों ने 18वां संवैधानिक संशोधन पारित कर दिया है

पाकिस्तानी संसद के दोनों सदनों ने 18वें संविधान संशोधन को सर्वसम्मति से पारित कर दिया है और अब इस पर राष्ट्रपति आसिफ़ अली ज़रदारी को दस्तख़त करना बाक़ी है.

राष्ट्रपति आसिफ़ अली ज़रदारी के हस्ताक्षर के साथ ही यह संशोधन पाकिस्तान के संविधान का हिस्सा बन जाएगा.

विशेषज्ञ मानते हैं कि पीपुल्स पार्टी के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार ने एक ऐतिहासिक विधेयक को पारित करवाया है और महत्वपूर्ण बात यह है कि उस ने अपने ही राष्ट्रपति के अधिकार घटा कर प्रधानमंत्री को दिए हैं.

पीपुल्स पार्टी के सह-अध्यक्ष आसिफ़ अली ज़रदारी ने 2008 में जब राष्ट्रपति का पद संभाला था तो संसद के संयुक्त सत्र को संबोधित करते हुए उन्होंने राष्ट्रपति पद का अधिकार घटाने, संसद और लोकतंत्र को मज़बूत करने का वादा किया था.

विपक्षी दलों ने राष्ट्रपति के इस वादे पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि राष्ट्रपति ज़रदारी अपने अधिकार कभी भी नहीं घटाएँगे क्योंकि वे एक बड़े राजनीतिक दल के वरिष्ठ नेता हैं.

लेकिन जब एक साल बाद संसद की समिति ने इस विधेयक का मसौदा तैयार कर लिया तो उससे सब हैरान हो गए.

बड़ी चुनौती

पीपुल्स पार्टी का इस पर कहना है कि उसने कई वर्षों से लोकतंत्र के लिए संघर्ष किया है और वह लोकतंत्र को मज़बूत करने संबंधी हर संभव क़दम उठाएगी.

देश के सभी राजनीतिक दलों ने इसका भारी स्वागत किया है और इसे देश की लोकतंत्र व्यवस्था के लिए मुनासिब क़रार दिया है.

गठबंधन सरकार सहित सभी राजनीतिक दलों ने इस विधेयक को संसद से पारित तो करवा लिया है लेकिन इस संशोधन की मंज़ूरी के बाद सरकार के लिए सब से बड़ी चुनौती इस पर अमल करवाने की होगी.

समवर्ती सूची की समाप्ति और प्रांतों को स्वतंत्र करने से 24 के क़रीब मंत्रालय और विभाग केंद्र से प्रांतों को चले जाएँगे जिससे अफ़सरशाही को बड़ा धक्का लगेगा.

पूर्व केंद्रीय सचिव फ़ज़लुल्लाह क़ुरैशी ने बताया कि 24 के क़रीब मंत्रालय और विभाग जब सूबों को चले जाएंगे तो क़रीब ढाई लाख कर्मचारियों को सूबों की ओर भेजना मसला हो सकता है

इससे सबसे ज़्यादा नुक़सान पंजाब प्रांत को होगा जिन के क़रीब डेढ़ लाख कर्मचारी हैं.

इस संवैधानिक संशोधन की कुछ धाराओं पर पाकिस्तानी मीडिया में गंभीर रूप से चर्चा हो रही है जिसके अनुसार सेनाध्यक्ष की नियुक्ति प्रधानमंत्री करेंगे, संसद को भंग करने का अधिकार भी उनके पास है और प्रांतों को स्वतंत्र करना भी शामिल है.

अनूठी बात

Image caption पाकिस्तानी राष्ट्रपति ने इस विधेयक को पेश करके सबको हैरान कर दिया

जाने-माने विश्लेषक प्रोफ़ेसर तौसीफ़ अहमद ने बीबीसी से बातचीत करते हुए कहा, “ये पाकिस्तान के इतिहास की अनूठी बात है कि एक राष्ट्रपति ने अपने अधिकार कम किए हैं और एक बड़े राजनीतिक दल ने अपने सह-अध्यक्ष जो कि राष्ट्रपति भी हैं, उनके अधिकार प्रधानमंत्री को दिए हैं.”

उन्होंने आगे कहा, “दूसरी बड़ी बात ये हुई है कि प्रांतों की स्वतंत्रता का जो मसला है वह हल होने जा रहा है और यह स्पष्ट रूप से सेना की नीतियों के विरुद्ध है.”

तौसीफ़ अहमद के अनुसार इस संशोधन के पारित होने के बाद प्रधानमंत्री का पद मज़बूत हो गया है और साथ ही उनके सामने कई चुनौतियाँ आ गई हैं.

उन्होंने बताया, “अब ये ज़रूरी है कि प्रधानमंत्री, संसद और उनका मंत्रिमंडल बेहतर रूप से काम करे नहीं तो अगर इसमें कोई फ़र्क आया तो फिर सेना को मौक़ा मिलेगा कि वह अधिकारों को बाँटे.”

उनके मुताबिक देश में कुछ ऐसी शक्तियाँ हैं जो इस नए ढाँचे को बर्दाश्त नहीं करेंगी और प्रांत की सरकारें बेहतर काम के ज़रिए ही इन शक्तियों को हरा सकती हैं.

उन्होंने कहा कि संसद के मज़बूत होने से प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति में कोई टकराव नहीं होगा क्योंकि इससे पहले भी प्रधानमंत्री ने कई ऐसे काम किए जो राष्ट्रपति की नीतियों के ख़िलाफ़ थे और उस समय भी दोनों के बीच मतभेद नहीं हुए.

संविधान संशोधन को लेकर सेना की भूमिका पर बात करते हुए प्रोफ़ेसर तौसीफ़ ने कहा, “जिन्ना से लेकर ज़रदारी तक के इतिहास में सेना ने हमेशा राष्ट्रपति को मज़बूत किया है और ये कभी नहीं चाहा कि संसद शक्तिशाली हो क्योंकि संसद की तुलना में राष्ट्रपति उनके लिए बेहतर तौर पर काम कर सकता है.”

उन्होंने कहा, “ऐसा लगता है कि अब सेना भी इस परिस्थिति के लिए तैयार है और जब वह तैयार है तो उनकी ओर से कोई प्रतिरोध नहीं होना चाहिए.”

कुछ जानकारों का मानना है कि राजनीतिक दलों ने इस विधेयक को पारित करने के लिए जिस इच्छाशक्ति का प्रदर्शन किया है अगर आगे चल कर ऐसा किया गया तो इस पर अमल करना संभव है.

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