भूटान डॉयरी

  • 27 अप्रैल 2010

दक्षिण एशिया के ज़्यादातर देशों में अभी तापमान ने कीर्तिमान खड़ा कर रखा है, ऐसे में पहाड़ों से घिरे खुशनुमा मौसम का लुत्फ़ ही अलग है.

और भूटान के माहौल का मज़ा सभी अतिथि उठाते दिख रहे है.

यहाँ अपने पारंपरिक कपड़ों, पुराने डिजाइन की लकड़ी पर साज सज्जा कर बनाए मकान सभी सहेज के रखे गए हैं.

यहाँ तक की सरकार अपनी देश की पहचान बनाए रखने और अपने संस्कृति को बचाने के लिए ज्यादा पर्यटकों को भी नहीं आने देती.

हर सैलानी को दो सौ डॉलर रोज़ देने पड़ते है यानि दुनिया का सबसे महंगा पर्यटक स्थल आप भूटान को कह सकते है.

यहाँ तक की पड़ोसी नेपाल से आने वाले लोगों को भी यहाँ ज्यादा पसंद नहीं किया जाता.

पर भारतीयों को न तो यहाँ डॉलर देने पड़ते है और न ही उन्हें वैमनस्य से लोग देखते है.

थोड़े की ज़रूरत है...

यहाँ की सरकार का फ़लसफा थोड़ा अलग है. थोड़ा है, थोडे की ज़रूरत है और थोड़ा ही काफ़ी है.

Image caption भूटान सरकार सीमित संख्या में पर्यटकों को आने देती है

सोच के देखिए कि अगर आपका नज़रिया ऐसा हो जाए तो न आप पैसे के पीछे भागेंगे, न आप जीवन की दौड़ में किसी को मात देने में व्यस्त होंगे.

आप कमाएँगे और मौज करेंगे.

न ब्लड प्रेशर, न दिल का दौरा, बस होठों पर मुस्कान और गुलाबी गाल.

ऐसे जीवन का मज़ा लेने के लिए ही सही आप भूटान आ सकते है और अगर नहीं तो अगली बार ज़िंदगी की मार धाड़ में जुटने के पहले सोचिएगा क्या वाकई यह सब ज़रूरी है.

मिर्ची लगी तो...

भूटान में लोग खाने में मिर्ची मसाले के तौर पर नहीं बल्कि सब्जी के तौर पर खाते है.

एम दशी को यहाँ का राष्ट्रीय भोज कह सकते है. बस चीज़ और लाल मिर्च की सब्जी ये आपको हेर रेस्तरां में मिल जाएगी.

मिर्ची से खेत भरे नज़र आते हैं और मिर्ची के बिना भूटानी खाना आप सोच भी नहीं सकते.

और तो और यहाँ छोटे छोटे बच्चों को माँ बाप बचपन में ही मिर्ची चटा देते हैं और मानो कहते हैं मिर्ची लगी तो मैं क्या करूँ...

बजाते रहो...

थिम्पू के सेना शिविर में भी सार्क की तैयारी हो रही है.

Image caption भूटान में सेना व्यवस्था में लगी है

सुरक्षा संबंधी नहीं, यहाँ का ब्रास बैंड हर सार्क देश की धुन बजाने का अभ्यास कर रहा है.

कुछ जवान तो ऐसे भी हैं जिन्होंने ये वाद्य यंत्र पहले कभी देखे भी नहीं.

अब न केवल इस पर ये अपनी कला आजमा रहे हैं, पर कुछ महीनों से सभी राष्ट्र धुनों को बजाने का काम सीख रहे हैं.

अभी तक तो लगता है बात बन रही है.

उन्नीस वाद्य यंत्रों का इस्तेमाल हो रहा है और आठ देशों की राष्ट्र धुनें सीख ली गई हैं. हम तो कहेंगे बजाते रहो.

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