पूर्व आईएसआई अधिकारी की हत्या

ख़ालिद ख़्वाजा
Image caption ख़ालिद ख़्वाजा का शव वज़ीरिस्ताव के शहर मीन अली में एक पहाड़ी के पास मिला

पाकिस्तान में अधिकारियों का कहना है कि हिंसाग्रस्त क़बायली इलाक़े उत्तर वज़ीरिस्तान में अपहरणकर्ताओं ने पाकिस्तानी ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई के पूर्व वरिष्ठ अधिकारी ख़ालिद ख़्वाजा की गोली मार कर हत्या कर दी है.

स्थानीय प्रशासन के एक अधिकारी ने बीबीसी को बताया कि शुक्रवार को उनका शव वज़ीरिस्ताव के शहर मीन अली के दक्षिण में सात किलोमीटर दूर एक पहाड़ी के पास मिला है.

उनके मुताबिक ख़ालिद ख़्वाजा को सिर और सीने में गोलियाँ मार कर उनकी हत्या कर दी गई. उन्होंने कहा कि शव के घावों को देख कर पता चलता है कि उन्हें थोड़ी देर पहले ही मारा गया था.

स्थानीय प्रशासन के अनुसार ख़ालिद ख़्वाजा के शव के साथ एक पत्र भी मिला है जिस पर लिखा हुआ है कि वे अमरीका के एजेंट थे इसलिए उन्हें मारा गया है.

पत्र में ख़बरदार किया गया है कि अगर कोई भी अमरीका के लिए जासूसी करेगा उन्हें इसी तरह मार दिया जाएगा.

एशियन टाइगर्स नामक एक गुट ने मीडिया को भेजे अपने संदेश में इस हत्या की ज़िम्मेदारी क़बूल की है.

इस संस्था ने अपने संदेश में कहा है कि सरकार और ख़ुफिया एजेंसी आईएसआई ने उनकी मांगों को गंभीरता से नहीं लिया इसलिए वे ऐसे क़दम उठाने पर विवश हुए.

अपहरण

Image caption ख़ालिद ख़्वाजा के परिवार का कहना है वे तालेबान की इजाज़त से वहां गए थे

ख़ालिद ख़्वाजा के परिवार का कहना है कि वे क़बायली इलाक़ो में तालेबान विद्रोहियों पर एक फ़िल्म बनाने के लिए वज़ीरिस्तान गए थे.

उनकी पत्नी ने बीबीसी को बताया कि वे नहीं समझती कि तालेबान विद्रोहियों ने उनका अपहरण किया है क्योंकि वे तालेबान की अनुमति से ही वहाँ गए थे.

ग़ौरतलब है कि 26 मार्च को ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई के एक और पूर्व अधिकारी कर्नल इमाम का क़बायली इलाक़ों की ओर जाते हुए अपहरण हुआ था.

एशियन टाइगर्स नामक इस संस्था ने मीडिया को ईमेल संदेश भेज कर इस अपहरण की ज़िम्मेदारी स्वीकार की थी. उसने वरिष्ठ तालेबान नेता मुल्ला बिरादर जैसे अहम अफ़ग़ान तालेबान नेताओं की रिहाई की मांग की थी.

55 वर्षीय ख़ालिद ख़्वाजा के अपहरण पर कई लोगों ने आश्चर्य व्यक्त किया था क्योंकि स्पष्ट रूप से वे तालेबान के समर्थक थे.

लेकिन अपहरण के कुछ दिनों बाद एक वीडियो में उन्होंने स्वीकार किया था कि इस्लामाबाद की लाल मस्जिद घटनाक्रम के दौरान उन्होंने ख़ुफ़िया एजेंसियों के लिए काम किया था.

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