माओवादियो ने दी आम हड़ताल की चेतावनी

प्रदर्शन

नेपाल में मज़दूर दिवस के अवसर पर लाखों माओवादी समर्थकों ने प्रदर्शन किया है.

वे नेपाल में सत्तारूढ़ माधव नेपाल की गठबंधन सरकार के इस्तीफ़े की माँग कर रहे हैं और चाहते हैं कि सबसे बड़ा दल होने के नाते माओवादियों को सरकार का नेतृत्व करने दिया जाए.

माओवादियों के साथ गठबंधन में शामिल दलों की चर्चा चल रही है और वे चाहते हैं कि सर्वसम्मति से एक राष्ट्रीय सरकार का गठन हो जाए.

लेकिन माओवादियों ने घोषणा कर दी है कि अगर कोई फ़ैसला नहीं हो पाता है तो रविवार, दो मई से वे आम हड़ताल पर चले जाएँगे.

काठमांडू में बीबीसी के संवाददाता सुरेंद्र फ़ुयाल का कहना है कि यदि माओवादियों ने आम हड़ताल शुरु की तो देश भर में जीवन अस्तव्यस्त हो जाएगा.

प्रदर्शन

संविधान सभा के चुनाव के लिए हुए चुनावों में सबसे बड़े दल के रूप में उभरने के बाद माओवादियों के नेतृत्व में एक सरकार का गठन हुआ था लेकिन पिछले साल सेनाध्यक्ष को हटाने के मुद्दे पर वे सरकार से हट गए थे.

सोमवार को हुए इस प्रदर्शन के लिए कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ नेपाल (माओवादी) के हज़ारों सदस्य और माओवादी संगठन की उग्र युवा शाखा यंग कम्युनिस्ट लीग के सदस्य पिछले कुछ दिनों से राजधानी में डेरा जमाए बैठे थे.

काठमांडू में एकत्रित लाखों माओवादी समर्थक देश भर से यहाँ आए थे. प्रदर्शनकारी लाल रंग की वेशभूषा पहने लाल झंडे लिए हुए, लाठियों से लैस थे.

दिन भर के प्रदर्शन के बाद शाम को माओवादी नेता पुष्पकमल दहाल प्रचंड सहित कई नेताओं ने रैली को संबोधित किया.

उनका कहना था कि माओवादियों की पार्टी सबसे बड़ी पार्टी है और संविधान का निर्माण माओवादियों के नेतृत्व में गठित सरकार के हाथों ही होना चाहिए.

रैली को संबोधित करते हुए प्रचंड ने सरकार और पड़ोसी देश भारत दोनों को चेतावनी दी, "अगर नेपाल की सरकार और भारत की सरकार सोच रही है कि सेना माओवादियों और जनता को मारेगी तो वे ग़लती कर रहे हैं....हम भारत के नेताओं से अनुरोध करते हैं कि वे ऐसा न करें."

ग़ौरतलब है कि नेपाल में सांसदों को 28 मई की समयसीमा तक नए संविधान को शक्ल देनी है.

सहमति के प्रयास

नेपाल में सत्तारूढ़ 22 दलों के गठबंधन एकीकृत मार्क्सवादी लेनिनवादी पार्टी के चेयरमैन झालनाथ खनाल ने बीबीसी संवाददाता राजेश जोशी से हुई बातचीत में कहा कि इस बात के प्रयास चल रहे हैं कि संविधान के अनुरूप सर्वसम्मति से एक सरकार का गठन हो सके.

इस सवाल पर कि क्या किसी नई सरकार के गठन के लिए प्रधानमंत्री माधव नेपाल इस्तीफ़ा देने के लिए तैयार हैं, उन्होंने कहा, "मैंने माधव नेपाल से कहा है कि अगर सर्वसम्मति बनती है तो उन्हें पद त्यागने के लिए तैयार रहना चाहिए."

उनका कहना था कि माधव नेपाल इस्तीफ़ा तभी देंगे जब देश में कोई विकल्प तैयार होगा.

यह पूछे जाने पर कि क्या गठबंधन माओवादी नेता प्रचंड को प्रधानमंत्री के रूप में स्वीकार करने को तैयार है, उन्होंने कहा, "अगर सर्वसम्मति हुई तो प्रचंड को प्रधानमंत्री स्वीकार करने में कोई हर्ज़ नहीं है."

उनका कहना था कि वे किसी के प्रति कोई आग्रह-दुराग्रह नहीं रखते लेकिन सहमति का कोई विकल्प नहीं है.

नेपाल के मामलों के जानकार और माओवादियों के क़रीबी समझे जाने वाले आनंद स्वरूप वर्मा का कहना है कि अगर इस बातचीत में कोई सफलता नहीं मिलती है तो इसके लिए ज़िम्मेदार माधव नेपाल की सरकार ही होगी.

उनका कहना है कि उन्होंने ही माओवादियों की सरकार को हटाया और सहमति के बावजूद सेना में भर्ती का काम जारी रखा.

प्रचंड का मत

Image caption प्रचंड ने कहा है कि उनके प्रधानमंत्री बनने न बनने से सहमति का कोई ताल्लुक़ नहीं है

माओवादी नेता प्रचंड ने बीबीसी से हुई बातचीत में कहा कि माओवादी आंदोलन एक शांतिपूर्ण आंदोलन है और अगर राष्ट्रीय सहमति की सरकार नहीं बनती है तो यह आंदोलन आगे जारी रहेगा.

यह पूछे जाने पर कि उन्होंने रैली में भारत सरकार का ज़िक्र क्यों किया, उनका कहना था, "यहाँ सुनने में आता है कि नेपाल की सरकार और सेना वही करेगी जो भारत की सरकार कहेगी लेकिन हमें लगता है कि भारत के नेता ऐसा कोई भी क़दम उठाएँगे. जैसा पहले वे शांति के पक्ष में थे आगे भी वे ऐसा ही करते रहेंगे ऐसी हमें उम्मीद है."

इस सवाल पर कि एमाले के नेता कह रहे हैं कि वे राष्ट्रीय सहमति की सरकार बनाने के लिए तैयार हैं तो माओवादी पार्टी क्यों तैयार नहीं हो रही है, उन्होंने कहा, "हम एकदम तैयार हैं और पिछले दस महीनों में हमने कितनी ही बार कोशिश की है."

प्रचंड ने कहा, "यह लोगों में भ्रम है कि माओवादी पार्टी का मामला नेतृत्व को लेकर है लेकिन वे साफ़ कर देना चाहते हैं कि माओवादी पार्टी में नेतृत्व को लेकर कोई सवाल ही नहीं है."

उन्होंने कहा, "हमने यह कभी नहीं कहा कि मैं ही प्रधानमंत्री बनूँगा तभी सरकार बनेगी."

उनका कहना था कि शांति और संविधान के लिए एक राष्ट्रीय सहमति की सरकार के गठन का और कोई विकल्प ही नहीं है.

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