क्या सफल होगा जिरगा?

  • 2 जून 2010
करज़ई
Image caption करज़ई की तालेबान योजना को अमरीकी समर्थन पहले ही मिल चुका है

अफ़ग़ानिस्तान में जब अहम फ़ैसले लेने होते हैं तो वो जिरगा बुलाते हैं.

वर्ष 1747 में अफ़ग़ानिस्तान की स्थापना लोया यानी विशाल जिरगा के बाद हुई थी.

अंतरराष्ट्रीय सेना के अफ़ग़ानिस्तान आने के बाद हामिद करज़ई ने राष्ट्रपति का पद एक जिरगा के बाद ही संभाला था.

लेकिन बुधवार, दो जून से शुरु हो रही जिरगा की बैठक वैसी जिरगा नहीं है क्योंकि इसे संविधान संशोधन का अधिकार नहीं है.

इस जिरगा को 'राष्ट्रीय सलाहकार शांति जिरगा' कहा जा रहा है और इसकी भूमिका सिर्फ़ सलाहकार की है.

इसमें हिस्सा लेने के लिए देश भर से 1600 प्रतिनिधि आ चुके हैं. इसमें क़बायली नेता हैं, संसद के सदस्य हैं और समाज के दूसरे महत्वपूर्ण लोग हैं.

राष्ट्रपति हामिद करज़ई ने इस जिरगा के लिए जो एजेंडा सेट किया है वह है तालेबान से बातचीत और हथियार छोड़ने के बदले उनको दी जाने वाली सुविधाएँ.

करज़ई के एक क़रीबी अधिकारी ने बताया, "लोग अपने गाँव इस संदेश के साथ वापस लौटेंगे कि सरकार और अंतरराष्ट्रीय समुदाय वास्तव चाहते हैं कि हिंसा का अंत हो."

हो सकता है कि करज़ई का अपना एजेंडा ख़ुद अपना हाथ मज़बूत करने का हो. एक तो अमरीका के साथ,जिसे तालेबान से बातचीत को लेकर कुछ ग़लतफ़हमियाँ हैं और दूसरे ख़ुद तालेबान से रिश्तों को लेकर.

अंतरराष्ट्रीय समुदाय की राय

अंतरराष्ट्रीय नेता यह निश्चित तौर पर यह मानते हैं कि ज़्यादातर विद्रोही नेता संघर्ष का रास्ता छोड़ देंगे यदि उन्हें सही विकल्प दिया जाए.

नैटो के एक वरिष्ठ असैन्य अधिकारी मार्क सैडविल का कहना है, "बहुत से लोग इस संघर्ष से उकता चुके हैं, बहुत से राजनीतिक मुख्य धारा में शामिल होना चाहते हैं और बहुत से अपने परिवार के पास वापस लौटना चाहते हैं."

Image caption तालेबान को हथियार छोड़ने पर रोज़गार देने और राजनीतिक मुख्य धारा में शामिल होने का अवसर देने का प्रस्ताव है

लेकिन यदि यह जिरगा एक तरह का शांति सम्मेलन है तो यह एकतरफ़ा मामला है क्योंकि विद्रोही नेता इस बैठक में नहीं है. उन्हें बुलाया ही नहीं गया है.

तालेबान ने एक बयान जारी करके इस जिरगा को एक धोखा बताया है.

उनका कहना है कि यह 'हमलावरों और उनके वफ़ादार' लोगों की एक कोशिश है कि वो अमरीकी जनता का ध्यान 'मुजाहिदीन के घातक और सफल होते हमलों' से भटकाया जा सके.

चरमपंथियों की मुख्य मांग है कि अंतरराष्ट्रीय फ़ौजें अफ़ग़ानिस्तान छोड़कर जाएँ.

उनका कहना है कि जब तक ऐसा नहीं होता तालेबान अफ़ग़ानिस्तान सरकार के बातचीत शुरु नहीं करेगी. हालांकि हो सकता है कि आम तालेबान और उनके नेताओं के बीच इस बात पर मतभेद हो.

नैटो मानती है कि तीन चौथाई तालेबान अपने घर के आसपास की संघर्ष करते हैं और उसका दावा है कि स्थानीय समस्याएँ दूर करने और उनको रोज़गार देने से बहुत से तालेबान पाला बदल लेंगे.

अगर यह कारगर भी साबित होता है तो भी कुछ ऐसे आदर्शवादी तालेबान लड़ाके संघर्ष करते रहेंगे जिनसे समझौता नहीं हो सकता.

अफ़ग़ानिस्तान ऐसे कट्टरपंथी तालेबान से जूझ रही है.

इसलिए इस शांति जिरगा की सफलता उन किसानों और ग्रामीणों की प्रतिक्रिया पर निर्भर करेगी जिन्होंने नैटो के ख़िलाफ़ हथियार उठा लिए हैं.

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