राजपक्षे के साथ तमिलों के मुद्दे पर बातचीत होगी

राजपक्षे

श्रीलंका के राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे की बुधवार को भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ प्रतिनिधि स्तर की बातचीत होगी.

इस दौरान विस्थापित तमिलों के पुनर्वास का मामला प्रमुखता से उठने की उम्मीद है.

इधर तमिलनाडु में राजपक्षे की यात्रा का विरोध हुआ है. चेन्नई में कई स्थानों पर महिंदा राजपक्षे के पुतले भी जलाए गए.

मंगलवार को तमिलनाडु में श्रीलंका के राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे की भारत यात्रा का विरोध कर रहे सैकड़ों तमिल प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया. इनमें एमडीएमके नेता वाइको भी शामिल थे.

वाइको ने आरोप लगाया कि पिछले वर्ष श्रीलंका में सेना और एलटीटीई के बीच लड़ाई के अंतिम दौर में हज़ारों तमिल अल्पसंख्यकों को मार डाला गया.

वाइको ने कहा," राजपक्षे अनेक निर्दोष तमिलों की मौत के ज़िम्मेदार हैं. उनके स्वागत के लिए लाल कालीन बिछाना तमिलों के घावों पर नमक छिड़कने के जैसा है."

तमिलों का सवाल

श्रीलंका के राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे मंगलवार की शाम दिल्ली पहुँचे. हवाई अड्डे पर उनकी आगवानी विदेश राज्यमंत्री परनीत कौर ने की.

तमिल विद्रोहियों की हार और दोबारा राष्ट्रपति बनने के बाद महिंदा राजपक्षे की ये पहली भारत यात्रा है.

बीबीसी संवाददाता का कहना है कि भारत-श्रीलंका के बीच पारंपरिक रूप से नजदीकी संबंध रहे हैं. लेकिन भारत चाहता है कि राष्ट्रपति राजपक्षे तमिलों को स्वायत्तता के संबंध में कुछ क़दम उठाए.

हालांकि श्रीलंका में तमिल विद्रोहियों के ख़िलाफ़ सैन्य कार्रवाई पर भारत ने कोई सवाल नहीं उठाए थे.

अपनी यात्रा से ठीक पहले श्रीलंका के राष्ट्रपति राजपक्षे ने संघर्ष विराम के बाद पहली बार विपक्षी तमिल नेताओं से मुलाक़ात की है.

संवाददाता का कहना है कि बातचीत का माहौल अच्छा था लेकिन इसमें कोई ठोस प्रगति नहीं हुई.

मानवाधिकार हनन पर प्रश्न

ग़ौरतलब है कि अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्थाओं का आरोप है कि श्रीलंका में गृह युद्ध के अंतिम चरण में आम तमिल आम नागरिक मारे गए थे.

श्रीलंका सरकार आम नागरिकों को निशाना बनाए जाने की बात से साफ़ इनकार करती आई है.

मई, 2009 में श्रीलंका सेना तमिल विद्रोही संगठन को परास्त करने में सफल रही थी.

इससे पहले सेना और एलटीटीई के लड़ाकों के बीच देश के उत्तर में लंबा संघर्ष चला था. इस दौरान हज़ारों नागरिक भी युद्ध क्षेत्र में फंसे रहे.

युद्ध प्रभावित क्षेत्र में संघर्ष की क़ीमत वहाँ फंसे तमिल नागरिकों ने भी चुकाई.

इस दौरान अंतरराष्ट्रीय समुदाय की ओर से श्रीलंका सरकार के ऊपर इस बात को लेकर भी दबाव बनाया गया कि संघर्ष के दौरान बड़े हथियारों का इस्तेमाल न किया जाए ताकि आम लोगों को नुक़सान न पहुँचे.

श्रीलंका सरकार ने संघर्ष के दौरान ऐसे हथियारों के इस्तेमाल न करने की वादा किया पर कुछ अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं का आरोप है कि सेना ने ज़मीनी तौर पर ऐसा नहीं किया और बड़े हथियारों की वजह से आम लोग भी निशाना बने.

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