'कुमारी' ने पास किया हाई स्कूल, भत्ता बढ़ा

नेपाल में जीती जागती देवी के रुप में पूजी जाने वाली एक 'कुमारी' ने हाई स्कूल की परीक्षा पास कर ली है और महँगाई के कारण उन्हें सरकार की ओर से दिया जाने वाला भत्ता बढ़ा दिया गया है.

हाई स्कूल की परीक्षा पास करने वाली वे पहली 'कुमारी' हैं.

समाचार एजेंसी रॉयटर्स से बातचीत में चनीरा बज्रचार्य (15 वर्षीया) नाम की 'कुमारी' ने बताया कि वो कॉमर्स या अकाउंटिंग पढ़ना चाहती हैं और बैंकिंग क्षेत्र में अपना करियर बनाना चाहती हैं.

नेपाल में परंपरा के अनुसार काठमांडू समेत तीन शहरों में बचपन में ही एक बच्ची को चुन लिया जाता है जो तब तक देवी रहती हैं जब तक उनका मासिक धर्म शुरु नहीं हो जाता. इन्हें नेपाल में 'कुमारी' कहा जाता है.

देवी बनने के लिए किसी भी बच्ची को कई परीक्षाओं से गुज़रना पड़ता है. एक ख़ास बौद्ध संप्रदाय से कुमारियों का चयन किया जाता है, जब उनकी उम्र दो से चार वर्ष के बीच होती है.

चनीरा बज्रचार्य उन पाँच लाख बच्चों में हैं जिन्होंने इस साल मार्च महीने में हुई हाई स्कूल की परीक्षा में भाग लिया था. परीक्षा के नतीजे शुक्रवार को घोषित किए गए.

एक शिक्षिका की मदद से उनके लिए मंदिर में ही पढ़ाई लिखाई की व्यवस्था की गई क्योंकि परंपरा के मुताबिक 'कुमारी' को बाहर के लोगों से मिलने-जुलने की इज़ाजत नहीं होती.

उनको पढ़ाने वाली शिक्षिका आभा अवाले ने बताया, "परीक्षा में उन्हें 80.12 फ़ीसदी अंक मिले हैं. ये अंक अव्वल ग्रेड की श्रेणी में हैं." परीक्षा में सफलता के बाद बज्रचार्य के सगे-संबंधी और मित्र उनके मकान के सामने इकट्ठा हुए और उनका अभिनंदन किया.

भत्ता बढ़ा

समाचार एजेंसी रॉयटर्स के हवाले से मिली जानकारी के मुताबिक कुमारी को वेतन के तौर पर मिलने वाली मासिक आर्थिक सहायता को एक चौथाई बढ़ा दिया गया है.

नेपाल में संस्कृति मंत्रालय से जुड़े अधिकारी मोद राज दोतेल ने बताया, "सरकार ने हर महीने दी जाने वाली राशि को 6000 रुपए से बढ़ाकर 7500 रुपए कर दिया है. इस बढ़ोतरी से उनके जीवन को बेहतर बनाने में मदद मिलेगी."

यह बढ़ोतरी ऐसे समय में हुई है जब नेपाल में राजनैतिक अस्थिरता की वजह से आर्थिक बदहाली है और एक चौथाई लोगों की हर रोज़ की आय एक डॉलर से भी कम है.

32 गुण जरूरी

नेपाल में कुमारी चुने जाने के लिए 32 गुण अनिवार्य माने जाते हैं. इन गुणों में हिरणों की तरह की जांघ और शंख की तरह की गर्दन शामिल है. वह रजस्वला होने तक कुमारी रह सकती है और इससे पहले दूसरी कुमारी यानी उत्तराधिकारी ढूँढ़ लेना ज़रुरी होता है.

'कुमारी' को काठमांडू घाटी के तीन प्राचीन शहरों में स्थित मंदिरों के भीतर ही रहना होता है. उसे साल में तीन या चार बार ही बाहर आने का मौक़ा मिलता है.

इस कुमारी प्रथा का विरोध भी होता रहा है. आलोचकों का कहना है कि सदियों पुरानी इस पंरपरा की वजह से वे सामान्य जीवन नहीं जी पातीं और सेवानिवृत्त होने के बाद आम जीवन की चुनौतियों से निपटने के लिए तैयार नहीं हो पाती हैं.

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