संयुक्त राष्ट्र ने कोलंबो से दूत को वापस बुलाया

विमल वीरावंसा
Image caption मंत्री वीरावंसा ने आमरण अनशन भी शुरू किया है

संयुक्त राष्ट्र ने श्रीलंका में अपने दूत को वापस बुला लिया है और राजधानी कोलंबो में अपने दफ़्तर बंद कर दिए हैं. ऐसा युद्धापराधों के मसले पर 'वहाँ हुए भीषण विरोध प्रदर्शनों' के कारण हुआ है.

संयुक्त राष्ट्र के महासचिव बान की मून ने एक बयान में कहा है कि उसे 'ये स्वीकार्य नहीं है कि श्रीलंका की सरकार देश में संयुक्त राष्ट्र के कामकाज में विघ्न पैदा होने को रोक नहीं पाई है.'

श्रीलंकाई आवास मंत्री विमल वीरावंसा पिछले दो दिनों से संयुक्त राष्ट्र कार्यालय के बाहर अपने समर्थकों के साथ प्रदर्शन कर रहे हैं और संयुक्त राष्ट्र से कथित युद्ध अपराधों की जाँच बंद करवाने की माँग कर रहे हैं.

'संयुक्त राष्ट्र समिति को वीज़ा नहीं'

बान की मून के प्रवक्ता ने बयान में कहा, "संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने श्रीलंका से अनुरोध किया है कि वह मेज़बान देश होने के नाते संयुक्त राष्ट्र के प्रति अपनी ज़िम्मेदारियाँ निभाए ताकि श्रीलंका के लोगों के हितों में संस्था के महत्वपूर्ण काम को बिना विघ्न चलाया जा सके."

प्रवक्ता का कहना था, "जिस तरह की स्थिति बन रही है, उसे देखते हुए महासचिव ने संयुक्त राष्ट्र के संयोजक नील बुहने को चर्चा के लिए न्यूयॉर्क बुलाया है. उन्होंने ये भी फ़ैसला किया है कि कोलंबो में संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम के क्षेत्रीय केंद्र को बंद किया जाए."

ग़ौरतलब है कि पिछले महीने बान की मून ने एक तीन सदस्यों की समिति का गठन किया था जो श्रीलंका की सरकार और तिमिल विद्रोहियों के बीच 25 साल की जंग के अंतिम चरणों में उत्तरदायित्व के मुद्दों पर सलाह दे.

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार इस जंग के आख़िरी पाँच महीनों में 7000 आम नागरिक मारे गए थे.

कई विदेशी सरकारों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने कहा है कि दोनों ओर से युद्ध अपराध होने के सबूत हैं और इनकी जाँच होनी चाहिए.

उधर श्रीलंका की सरकार ने इन आरोपों का खंडन किया कि उसके सैनिकों ने अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों का उल्लंघन किया. उसने संयुक्त राष्ट्र की समिति के सदस्यों को वीज़ा देने से इनकार कर दिया है.

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