क्यों लग रहा है ज़रदारी पर निशाना?

  • 8 अगस्त 2010
Image caption ब्रिटेन में भी ज़रदारी के ख़िलाफ़ प्रदर्शन हुए हैं.

पाकिस्तान में भीषण बाढ़ के बावजूद ब्रिटेन के दौरे पर गए राष्ट्रपति आसिफ़ अली ज़रदारी की कड़ी आलोचना के पीछे राजनीतिक खेल भी है.

राष्ट्रपति आसिफ़ अली ज़रदारी ने भारी आलोचनाओं के बीच एक राजनीतिक रैली के साथ अपना ब्रिटेन का दौरा खत्म किया.

जिस दौरान ज़रदारी पाकिस्तान से बाहर रहे हैं, वहां 1500 से ज़्यादा लोग बाढ़ में मारे गए हैं, सैंकड़ों गांव बह गए हैं, लाखों बेघर हो गए हैं.

ब्रिटेन में रह रहे पाकिस्तानियों ने उनके ख़िलाफ़ नारे लगाए और एक व्यक्ति ने तो उनपर अपना जूता भी फेंका.

ज़रदारी ने रैली में अपने समर्थकों से कहा कि उनका दौरा सफल रहा है क्योंकि उन्होंने बाढ़ पीड़ितों के लिए लाखों पाउंड जमा किए हैं.

इस्लामाबाद से बीबीसी संवाददाता मोहम्मद इलियास खान का आकलन:

अख़बारों और टेलिविज़न चैनलों ने ज़रदारी की जम कर आलोचना की है.

ग़ौरतलब है कि मीडिया ने बार बार ये भी कहा है कि बाढ़ की गंभीरता को देखते हुए सेना का रवैया भी संतोषजनक नहीं था लेकिन सैनिक कम से कम मौके पर मौजूद थे.

Image caption ज़रदारी ने ब्रिटेन का दौरा रद्द नहीं किया तो उनकी देशभक्ति पर भी सवाल उठाए जाने लगे.

ज़रदारी की आलोचना अंतरराष्ट्रीय अख़बारों में भी हुई है लेकिन पाकिस्तान में उनकी आलोचना का एक गहरा मतलब है.

ये साफ़ तौर पर सेना और सरकार के बीच के तनाव की ओर इशारा कर रहा है.

दरअसल बाढ़ के सुर्ख़ियों में आने से पहले ही ज़रदारी पर निशानेबाज़ी शुरू हो चुकी थी जब भारत के दौरे पर आए ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने पाकिस्तान पर आतंकवाद के मामले पर दोमुंही बात करने का आरोप लगाया.

ग़लत रिपोर्ट

31 जुलाई को पाकिस्तान के जियो टीवी ने रिपोर्ट दी कि ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई के प्रमुख शुजा पाशा ने कैमरन के बयान पर विरोध प्रकट करने के लिए अपना ब्रिटेन का दौरा रद्द कर दिया है लेकिन ज़रदारी फिर भी ब्रिटेन जा रहे हैं.

दूसरे चैनल भी ज़रदारी की देशभक्ति पर सवाल उठाने लगे.

लेकिन फिर एक महत्वपूर्ण घटना हुई.

प्रधानमंत्री यूसूफ़ रज़ा गिलानी ने पत्रकारों को बताया कि शुजा पाशा का ब्रिटेन का कोई दौरा तय नहीं था.

जियो टीवी ने बेनाम सूत्रों के हवाले से अपनी रिपोर्ट की थी और ग़ौरतलब है कि समाचारों पर पैनी नज़र रखनेवाली सेना की मीडिया विंग ने इसका खंडन भी नहीं किया था.

ज़रदारी पर ये भी आरोप लगा कि वो अपने बेटे बिलावल भुट्टो के राजनीतिक करियर की नींव रखने ब्रिटेन जा रहे थे. लेकिन रैली में बिलावल भुट्टो की अनुपस्थिति से वो बातें भी ग़लत निकलीं.

माना जा रहा है कि ज़रदारी ने सेना को दिखाने के लिए भी ये दौरा किया है कि उन्हें सेना की परवाह नहीं है.

प्रधानमंत्री गिलानी ने कहा, “ यदि ज़रदारी दौरे पर नहीं जाते तब भी उनकी आलोचना की जाती.”

सेना और मीडिया

दरअसल सेना और मीडिया के बीच घनिष्ठ संबंध हैं.

सेना अकसर अपने प्रभुत्व को बचाने के लिए मीडिया का इस्तेमाल करती है.

हर बड़ी ख़बर पर उनका नियंत्रण होता है और उन्होंने प्रभावशाली पत्रकारों का एक नेटवर्क तैयार कर लिया है जो मीडिया में बड़े बड़े पदों पर बैठे हुए हैं.

Image caption पाकिस्तान में बाढ़ से चालीस लाख से ज़्यादा लोग बेघर हुए हैं.

ज़रदारी के समर्थकों का कहना है कि संभव है कि आईएसआई प्रमुख के ब्रिटेन का दौरा रद्द करने की बात मनगढंत हो और मीडिया ने इसे ज़रदारी के ख़िलाफ़ अभियान चलाने के लिए पेश किया हो.

और ये अभियान और तेज़ हो गया जब बाढ़ से हुए नुकसान की ख़बरें सामने आने लगीं.

पाकिस्तान की लोकतांत्रिक सरकार इस समय हर तरफ़ से हमले झेल रही है.

सेना, न्यायपालिका और इस्लामी चरमपंथियों की मदद करने वाले राजनीतिक गुट सभी सरकार पर निशाना साध रहे हैं.

सरकार के एक वरिष्ठ सदस्य ने नाम नहीं बताने की शर्त पर कहा कि उन्हें समझ नहीं आ रहा है कि मीडिया को किस तरह से समझाया जाए.

निजी तौर पर राजनेता ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन की बात से सहमत हैं कि पाकिस्तान आतंकवाद पर दोतरफ़ा रूख अपना रहा है लेकिन उनका कहना है कि दरअसल पाकिस्तानी सेना तालिबान के मामले पर दोमुंही नीति अपना रही है.

ये वो राजनीतिज्ञ हैं जिन्हें बेसब्री से भारत और अफ़गानिस्तान से रिश्ते बेहतर होने का इंतज़ार है क्योंकि इसीके ज़रिए वो अपने मतदाताओं के लिए नौकरियां और रोज़गार के मौके पैदा कर सकते हैं.

लेकिन फ़ौज को डर है कि इससे उनका अपना साम्राज्य ख़तरे में पड़ जाएगा.

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