बर्मा: बॉयकॉट के बीच, बीस वर्षों बाद चुनाव

बर्मा में चुनाव
Image caption दो दशकों के बाद बर्मा में आम चुनाव के दौरान मतदान करवाए गए

बर्मा में 20 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद रविवार को आम चुनाव के लिए मतदान संपन्न हुआ.

मुख्य विपक्षी दल 'नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी' ने इस चुनाव का बहिष्कार किया है. नोबेल पुरस्कार विजेता आंग सान सू ची इस दल का नेतृत्व करती हैं.

उल्लेखनीय है कि यहाँ करीब 50 वर्षो से सैनिक शासन चला आ रहा है.

सैन्य शासकों का दावा है कि ये चुनाव देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था को मज़बूत करेगा, लेकिन आलोचकों का कहना है कि ये महज़ एक ढोंग है.

सैन्य शासकों ने आंग सान सू ची को वर्षों से क़ैद कर रखा है और उन्हें इस चुनाव में शामिल होने की इजाज़त भी नहीं दी गई है.

पर्यवेक्षकों का कहना है कि मतदान शांतिपूर्ण ढंग से हुआ जबकि विपक्षी दलों का आरोप है कि इसमें हेर-फेर किया गया.

'निष्पक्ष नहीं'

उधर भारत दौरे पर आए अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने बर्मा में हुए मतदान के बारे में कहा है कि वहाँ चुनाव जैसे भी हों उन्हें स्वतंत्र और निष्पक्ष तो नहीं कहा जा सकता है.

'शान नेशनल डेमोक्रेटिक पार्टी' के अध्यक्ष साई ए पा ओ ने बताया, "सत्ताधारियों ने लोगों से पहले वोट डलवाए और हमें प्रतिनिधियों को मतदान केंद्र पर एडवांस वोट डालने के दौरान भेजने की इजाज़त नहीं होती. "

इस चुनाव के दौरान सबसे ज़्यादा उम्मीदवार चुनाव मैदान में खड़े करने वाले दल में चौथे नंबर पर 'शान नेशनल डेमोक्रेटिक पार्टी' है.

साई ए पा ओ ने बताया, "यदि चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष होते तो हमें पूरा विश्वास है कि हम कम से कम 80 प्रतिशत सीटों पर विजयी होते."

आंग सान सू ची के दल ने 1990 में हुए चुनाव में जीत हासिल की थी लेकिन उन्हें सरकार बनाने का अवसर नहीं दिया गया था.

बर्मा में ब्रिटेन के राजदूत एंड्रू हेन का कहना है कि बर्मा ने लोकतंत्र की दिशा में एक महत्वपूर्ण अवसर खो दिया है.

सैन्य शासकों को समर्थन देने वाले उम्मीदवारों को इस चुनाव अधिकांश सीटों पर जीतने की संभावना जताई जा रही है.

विरोधी दलों का आरोप है कि लोगों को सैनिक शासन समर्थित उम्मीदवार को वोट न देने की सूरत में नौकरी से हाथ धोने की धमकी दी गई है.

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