मोहम्मद यूनुस के ग्रामीण बैंक की जाँच

नॉर्वे का कहना है कि वो उन रिपोर्टों की जांच कर रहा है जिनमें कहा गया है कि बांग्लादेश के अर्थशास्त्री और नोबेल पुरस्कार विजेता मुहम्मद यूनुस ने ग़रीबों की मदद के लिए स्थापित किए गए बैंक में कथित तौर करोड़ों डॉलर की हेराफेरी की गई है.

ये घोषणा डेनमार्क में एक डॉक्युमेंटरी निर्माता के ये आरोप लगाए जाने के बाद की गई है कि ये पैसा ग्रामीण बैंक से मोहम्मद यूनुस के ग्रामीण नेटवर्क से जुड़े दूसरे संस्थानों में इस्तेमाल किया गया.

हालांकि बैंक ने एक बयान जारी करके इन आरोपों का खंडन किया है और इन्हें ग़लत बताया है.

‘कॉट इन माइक्रो डेब्ट’ नामक डॉक्युमेंटरी फ़िल्म नॉर्वे के राष्ट्रीय टेलीविज़न पर इस हफ़्ते की शुरुआत में दिखाई गई थी और उसके बाद ही बांग्लादेश के ग्रामीण बैंक की ओर से इस बारे में खंडन आया है.

ग्रामीण बैंक की स्थापना प्रोफेसर यूनुस ने क़रीब तीन दशक पहले ग़रीबों को छोटे ऋण देने के लिए की थी.

उनके इस विचार को काफ़ी सराहना मिली और दूरदराज़ के देशों ने इस विचार को आर्थिक मदद दी. इन देशों में 1990 के मध्य में नॉर्वे भी शामिल था.

डॉक्युमेंटरी में आरोप लगाया गया है कि नॉर्वे की सहायता राशि में से क़रीब एक अरब डॉलर ग्रामीण बैंक से किसी और कंपनी में स्थानांतरित कर दिए गए जो कि ग्रामीण परिवार की ही संस्था है लेकिन ऋण देने में इसकी कोई भूमिका नहीं है.

डॉक्युमेंटरी के मुताबिक नॉर्वे के आपत्ति जताने के बाद क़रीब तीन करोड़ डॉलर ग्रामीण बैंक में तत्काल वापस कर दिए गए.

अब नॉर्वे के अधिकारियों का कहना है कि इसमें कोई संदेह नहीं कि इस मामले में ग्रामीण बैंक में धोखाधड़ी या भ्रष्टाचार किया गया है. हालांकि नॉर्वे के अंतरराष्ट्रीय विकास मंत्री एरिक सोल्हाइम का कहना है कि उनके अधिकारी इस मामले की जांच करेंगे.

एरिक सोल्हाइम का कहना था, ''ऐसा लगता है कि पैसे का इस्तेमाल जहां होना चाहिए था, वहां नहीं हुआ और ये बर्दाश्त नहीं किया जा सकता. यदि नॉर्वे संतरे के रस के लिए पैसा दे रहा है तो आप इसे सेब ख़रीदने पर ख़र्च नहीं कर सकते. हालांकि सेब भी एक अच्छा खाद्य पदार्थ है.''

ग्रामीण बैंक का कहना है कि इस मामले में और जानकारी पूरे विवरण के साथ सुविधानुसार जल्द से जल्द उपलब्ध करा दी जाएगी.

नॉर्वे ने ये क़दम उस वक़्त उठाया है जबकि दुनिया भर में लघु ऋण या माइक्रोक्रेडिट की साख़ काफ़ी ख़राब हो चुकी है.

कुछ विकासशील देशों में जो संगठन छोटे कर्ज उपलब्ध कराते हैं, उन पर ये आरोप लगते रहे हैं कि वे बैंकरों के बराबर या फिर उनसे भी ज़्यादा दर पर ब्याज वसूल करते हैं.

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