युद्ध अपराधों की जांच के लिए तैयार हुआ श्रीलंका

श्रीलंका में लड़ाई के बाद का एक दृश्य

श्रीलंका की सरकार ने अपने पुराने फ़ैसले से हटते हुए संयुक्तराष्ट्र की एक जाँच समिति को देश में आने की अनुमति दे दी है.

ख़ुद संयुक्तराष्ट्र महासचिव बान की मून ने जून में तीन सदस्यीय समिति का गठन किया था. इसे लड़ाई के अंतिम महीनों में श्रीलंका में मानवाधिकारों के उल्लंघन और युद्धापराधों के आरोपों की जाँच का काम सौंपा गया है.

श्रीलंका की सरकार अभी तक न सिर्फ़ ये कहती रही है कि उसकी सेना ने अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार क़ानून का उल्लंघन नहीं किया है, बल्कि उसका ये भी कहना है कि देश में पिछले साल की लड़ाई में तमिल छापामारों ने मानवाधिकारों का उल्लंघन किया था.

सरकार की इस लाईन से अलग बोलने वालों पर देशद्रोही का लेबल चिपका दिया जाता है.

इस पृष्ठभूमि में संयुक्तराष्ट्र की समिति को श्रीलंका आने देने का फ़ैसला निश्चय ही सरकार के रुख़ में बदलाव का सबूत है.

घरेलू जाँच आयोग

समिति के सदस्यों में से एक इंडोनेशिया का, दूसरा अमरीका का और तीसरा दक्षिण अफ़्रीका का है.

Image caption जाँच समिति के गठन के विरोध में आवास मंत्री वीरावंसा संयुक्तराष्ट्र के कोलंबो परिसर में भूख हड़ताल पर बैठे थे

यहाँ ये उल्लेखनीय है कि श्रीलंकाई विदेश मंत्री ने छह महीने पहले संयुक्तराष्ट्र की समिति के सदस्यों को वीज़ा नहीं देने की घोषणा करते हुए समिति के गठन को श्रीलंका के आंतरिक मामलों में दखलअंदाज़ी की संज्ञा दी थी.

अपना विरोध जताने के लिए सरकार के आवास मंत्री विमल वीरावंसा कोलंबो में संयुक्तराष्ट्र के कार्यालय परिसर में भूख हड़ताल पर बैठ गए थे. सरकार के फ़ैसले के बाद भी वीरावंसा अपनी पुरानी दलील पर क़ायम हैं कि संयुक्तराष्ट्र की समिति को श्रीलंका आने देने से देश के शत्रुओं को फ़ायदा पहुँचेगा.

समिति के श्रीलंका आने की तारीख़ अभी तय नहीं हुई है. श्रीलंका पहुँचने पर समिति के सदस्य अपना जाँच कार्य कैसे करेंगे, ये भी स्पष्ट नहीं है.

हालाँकि विदेश मंत्रालय का कहना है कि संयुक्तराष्ट्र की समिति को श्रीलंका सरकार गठित उस आयोग के सामने अपनी बात रखने का मौक़ा दिया जाएगा, जो कि लड़ाई के अंतिम दिनों में हुई घटनाओं की जाँच कर रहा है.

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