'पहले लगा जिहाद था, अब धंधा है'

  • 24 फरवरी 2011
कश्मीर में कर्फ़्यू

कश्मीरी राजनीति के दलदल में जिन लोगों ने 'आज़ाद कश्मीर' के लिए हथियार उठाए थे उन्हें कुचल दिया गया है. बीबीसी संवाददाता एम इलियास ख़ान उन कश्मीरी लड़ाकों के बारे में बता रहे हैं जो न तो भारत और न ही पाकिस्तान के साथ जाना चाहते हैं.

इस्मत करीम ‘टॉर्चर सेल’ में बिताए 20 ख़ौफ़नाक दिनों का ब्यौरा दे रहे हैं.

करीम बताते हैं कि उन्हें दो अन्य लोगों के साथ पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में हिरासत में रखा गया था और उनके साथ हर शाम आधे घंटे तक ‘सज़ा और पूछताछ' का सिलसिला चलता था.

करीम ने बताया, “वे हमें कोड़े मारते और एक ऐसे व्यक्ति का पता पूछते जिसका नाम तक हमने कभी नहीं सुना था. ”

करीम और उसके साथियों को उनकी गिरफ़्तारी का कोई कारण नहीं बताया गया था.

करीम 'यूनाइटेड कश्मीर पीपल्स नेशनल पार्टी' के एक भावुक लेकिन आक्रामक कार्यकर्ता थे. ये दल एक 'स्वतंत्र कश्मीर' का हिमायती है जो भारत और पाकिस्तान दोनों से ही आज़ाद होना चाहता है.

करीम बताते हैं कि उन्हें पाकिस्तान की ख़ुफ़िया एजेंसी इंटर सर्विसेज़ इंटेलिजेंस यानि आईएसआई ने पकड़ा था.

पाकिस्तानी सेना के प्रवक्ता अथर अब्बास ने बीबीसी को बताया ऐसे इल्ज़ाम सच नहीं हैं. लेकिन करीम ने अब डर के मारे राजनीति से ही संन्यास ले लिया है.

आज़ादी की उम्मीद

भारत और पाकिस्तान कश्मीर के मुद्दे पर 1948 में युद्ध लड़ चुके हैं. संयुक्त राष्ट्र के हस्तक्षेप के कारण हुए युद्धविराम के बाद आख़िरी समझौता होने तक ये क्षेत्र दो देशों के बीच बंट गया.

हालांकि शुरूआत में इस क्षेत्र में अधिकतर लोग पाकिस्तान के पक्ष में थे लेकिन पिछले कुछ दशकों से कई आज़ादी के हिमायती गुट सामने आए हैं.

पाकिस्तान का सुरक्षा तंत्र इन गुटों को शक की नज़र से देखता है.

अब्दुल मजीद ऐसे ही एक व्यक्ति हैं.

कई साल पहले जब मजीद एक छात्र थे उन्हें 47 अलग-अलग आपराधिक मामलों में नामज़द किया गया था.

मजीद कहते हैं, “तीन महीने तक मैं पुलिस 'लॉक-अप' में था. जब अदालत मुझे एक केस में बरी कर देती तो वे मुझपर दूसरा केस थोप देते. ”

आख़िर में एक वरिष्ठ क़ानून अधिकारी ने मजीद को अपने दफ़्तर में बुलाया और कहा कि अगर वे छात्र राजनीति से हट जाते हैं तो उनके ख़िलाफ़ सारे मुकदमें वापस ले लिए जाएंगे.

मजीद ने कहा, “मैंने उन्हें छात्र राजनीति छोड़ने का भरोसा दिलाया. तीन दिन बाद मुझे छोड़ दिया गया. कई सालों तक मैं राजनीति से दूर रहा.”

कई पूर्व कश्मीरी लड़ाके भी दवाब में हैं.

कश्मीरी चरमपंथ

हथियारबंद लड़ाई का रास्ता छोड़ने वाला पहला गुट ‘जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ़्रंट’ यानि जेकेएलएफ़ था. सेक्यूलर और आज़ादी के हिमायती इस गुट ने 1989 में भारत प्रशासित कश्मीर में सबसे पहले हथियार उठाए थे.

पाकिस्तान सरकार कश्मीरी लड़ाकों का साथ देने से हमेशा से ही इनकार करती रही है लेकिन कुछ सूत्रों के अनुसार आईएसआई के कुछ तत्व कश्मीरी लड़ाकों से जुड़े हुए हैं.

जेकेएलएफ़ के नेताओं के अनुसार उन्हें शुरूआत में पाकिस्तान का साथ मिला था और उन्हें पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में प्रशिक्षण भी दिया गया था.

लेकिन जब विद्रोह लोकप्रिय हो गया तो पाकिस्तान ने जेकेएलएफ़ को छोड़कर पाकिस्तान-हिमायती धड़े का साथ देने का फ़ैसला किया.

विश्लेषकों के अनुसार 1990 के दशक में हिज़बुल मुजाहिदीन को भारत और जेकेएलएफ़ दोनों से लड़ने के लिए तैयार किया गया था.

इसी वजह से कई जेकेएलएफ़ लड़ाकों ने हथियार डाल दिए थे.

अबदुल वदूद ऐसे ही एक लड़ाके हैं.

एक ज़माने में बारामुला क्षेत्र में जेकेएलएफ़ के कमांडर रहे वदूद अब मुज़फ़्फ़राबाद में अपनी पत्नी और दो बच्चों के साथ एक टेंट में रहते हैं.

'ये सिर्फ़ धंधा है'

अब्दुल वदूद कहते हैं, “मेरा भविष्य तो तबाह है ही मेरे बच्चों का भविष्य भी दांव पर है. ये एक दुखदायी जीवन है. ”

1990 के दशक के मध्य से हिज़बुल मुजाहिदीन में भी धीरे-धीरे निराशा फैलने लगी थी क्योंकि लड़ाई से कुछ हासिल नहीं हो रहा था और स्थानीय लोग इस लड़ाई के कारण बुरी तरह से प्रभावित हो रहे थे.

Image caption प्रदर्शन में हिस्सा लेते कश्मीरी युवक

हिज़बुल का एक पूर्व लड़ाका अब्दुल राउफ़ बताता है, “जिस समस्या के हल के लिए हमने घर छोड़ा था वो वहीं की वहीं थी. थोड़ी देर के लिए हमने सोचा ये एक जिहाद है, अब लगता है ये सिर्फ़ धंधा है.”

सोपोर के एक व्यापारी परिवार से संबंध रखने वाले राउफ़ इन दिनों मुज़फ़्फ़राबाद में एक मज़दूर हैं.

विश्लेषक बताते हैं कि जैसे-जैसे कश्मीरी लड़ाकों का मोहभंग होने लगा पाकिस्तानी सुरक्षा तंत्र ने लश्कर-ए-तैबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे पाकिस्तान गुटों को खड़ा करना शुरू कर दिया.

कश्मीरी स्वतंत्रता के हिमायती और वकील फ़ज़ल मेहमूद बेग़ ने बताया कि पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में अब भी इन गुटों के दफ़्तर और कैंप मौजूद हैं.

फ़ज़ल बेग़ कहते हैं, “ये गुट जिहाद का प्रसार करते हैं और जो लोग इनका विरोध करते हैं उन्हें डराया-धमकाया जाता है और गिरफ़्तार भी किया जाता है. ”

ग़ुमशुदा ‘योद्धा’

वर्ष 2004 में कुछ पूर्व कश्मीरी लड़ाकों ने एक ‘रियल वॉरियर्स’ नाम के गुट के गठन करने की कोशिश की जो पाकिस्तान के पक्षधर धड़ों का विरोध करने वाला था.

लेकिन जल्द ही ये गुट निष्क्रिय हो गया क्योंकि इसके कुछ नेताओं को आईएसआई ने उठा लिया और कुछ को जेल में ठूंसने की धमकी दे डाली.

फ़ज़ल बेग़ कहते हैं कि कश्मीरी स्वतंत्रता के सैंकड़ो हिमायती कार्यकर्ता और लड़ाके इस वक़्त ग़ुमशुदा है और ऐसा माना जाता है कि वे आईएसआई की हिरासत में है.

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Image caption कश्मीर में कई लोग लापता हैं.

मुज़फ़्फ़राबाद में अधिकारी इस संभावना ने इनकार तो नहीं करते लेकिन ये ज़रूर कहते हैं कि स्थानीय क़ानून ‘स्वतंत्र कश्मीर’ की राजनीति की अनुमति नहीं देते.

पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर के प्रधानमंत्री सरदार अतीक़ ख़ान कहते हैं, “इन गिरफ़्तार लोगों में कुछ मासूम लोग भी हो सकते हैं. ख़ुफ़िया अधिकारियों से ग़लतियां हुई होंगी...लेकिन कई बार राष्ट्र की सुरक्षा के लिए ऐसा किया जाना ज़रूरी होता है. ”

कश्मीर में बढ़ते असंतोष के बीच एक ‘स्वतंत्र कश्मीर’ के ख़्वाहिश रखने वाले कार्यकर्ताओं के पास लगता है अब ना तो आवाज़ ही है और ना बंदूक.

(इस लेख में कुछ नाम बदले गए हैं)

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