ऑक्सफ़ैम का 'वी कैन' आंदोलन

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Image caption सुमति ने ख़ुद आगे बढ़ने का साहस दिखाया

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विकास के लिए काम करने वाली संस्था ऑक्सफ़ैम जीबी ने दक्षिण एशिया के छह देशों में स्त्रियों के ख़िलाफ़ हिंसा के विरुद्ध 'वी कैन' यानी 'हम कर सकते हैं' नामक आंदोलन छेड़ रखा है.

महिलाओं की स्थिति में सुधार के कुछ सूत्रधारों की कहानी उन्ही की ज़बानी महिला दिवस के ख़ास मौक़े पेश की जा रही हैं.

अफ़गानिस्तान, पाकिस्तान, भारत, नेपाल, बांगलादेश और श्रीलंका में चलाए जा रहे इस आंदोलन का लक्ष्य स्त्रियों के ख़िलाफ़ हिंसा को प्राप्त सामाजिक स्वीकृति को कम करना, ख़ासकर घरेलू हिंसा को कम करना रहा है.

झारखंड की 26 वर्षीय सुमति

महिलाओं पर हिंसा के केसों में मदद के लिए मुझे पुलिस, अस्पताल और स्कूल बुलाते हैं. मैं "वी कैन केंद्र" चलाती हूं जहां लोग मिलते हैं और इस आंदोलन के ज़रिए उठाए गए मुद्‌दों पर बात करते हैं. लेकिन पहले ऐसा नहीं था.

शादी के पहले दिन से मुझे एहसास हो गया था कि मैं बिल्कुल अकेली हूं. मेरे सास-ससुर मुझे शारीरिक और मानसिक रूप से कष्ट देते. पति को नशे और जुए की लत थी.

मुझे मारने और अपमानित करने के लिए उसे किसी वजह की ज़रूरत नहीं थी. घर में या बाहर, वह मुझे कहीं भी पीट देता. हमारा कोई ख़ास रिश्ता न था लेकिन वह जब चाहे, मुझे सेक्स के लए मजबूर करता. इस तरह मेरे बेटे का जन्म हुआ.

ऐसी स्थिति में मैंने एक परिचित से वी-कैन आंदोलन के बारे में सुना. मुझे लगा, वे मेरी ज़िंदगी के बारे में ही बात कर रहे हैं. मैंने तब एक चेंज मेकर के रूप में अपना नाम दर्ज करा लिया.

पहले कुछ साल कठिन थे. मुझे छिप कर मीटिंग में जाना पड़ता. ये मींटिंग्स बहुत प्रेरक होतीं. इनकी वजह से ही मैं अपना कठिन जीवन चला पा रही थी.

धीरे-धीरे मैंने और लोगों से इन मुद्दों पर बात करना शुरू किया. फिर पता नहीं कैसे, मेरे सुझावों से लोगों की समस्याएं सलझने लगीं. मुझे सिसाइ और अन्य इलाक़ों में ख़ास केसों में बातचीत और मामलात सुलझाने के लिए बुलाया जाने लगा.

पहली बार साइकिल

मुझे याद है, इसी सिलसिले में दूसरे गांव तक जाने के लिए मैंने पहली बार साइकिल चलाई.

अब मैंने निश्चय किया है कि मैं अपने ख़िलाफ़ हो रही हिंसा से निपटूंगी. शुरुआत अपने सास-ससुर से की. पहले तो कुछ असर न हुआ पर धीरे-धीरे उन्होंने मुझे सुनना शुरू किया. उनके व्यवहार में अंतर आने लगा लेकिन मेरे पति नहीं बदले.

इस दौरान मेरे पति को नज़दीकी क़स्बे में टीचर्स प्रशिक्षण कोर्स में दाख़िला मिल गया. वह बेमन से वहां गए और जब भी वहां से लौटते तो उनका मार पीट का रवैया वैसा ही रहता.

फिर भी, पति की अनुपस्थिति में हम सभी को अपने घर में हो रही हिंसा पर बातचीत करने का मौक़ा मिल गया.

मुझे आज भी घरेलू हिंसा का सामना करना पड़ता है लेकिन अब मैं डट कर सामना करती हूं और अब मेरे पति का साहस नहीं होता कि मुझ पर हाथ उठा सके. पर वह अन्य तरीक़ों से मुझे अपमानित करते रहते हैं.

अपने घर में हिंसा से निपटने के अलावा अब मैं स्थानीय समुदाय की सक्रिय सदस्य हूं. हाल ही में पुलिस के अनुरोध पर मैं घरेलू हिंसा के दो गंभीर केसों को सुलझाने में शामिल थी.

घरेलू हिंसा के ख़िलाफ़ संघर्ष एक कठिन लड़ाई है, लेकिन इस संघर्ष पर मेरा भरोसा है. मेरा विश्वास है कि यह बदलाव हमारे साथ रहेगा क्योंकि हम लोगों के रवैये और प्रचलित विश्वासों को बदल रहे हैं.

(इसी कड़ी की एक और आपबीती हम आप तक बाद में पहुँचाएँगे)

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