तमिलनाडु की राजनीति

  • 12 मई 2011
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तमिलनाडु राजनीतिक चेतना से भरा और बड़े सामाजिक पहलकदमी करने वाला राज्य है.

देश के पहले कुछ क्षेत्रीय दलों में से एक का गठन वहाँ हुआ था. वर्ष 1916 में. और जब उत्तर भारत में जातीय राजनीतिक की सुगबुगाहट शुरु नहीं हुई थी तब तमिलनाडु में दलित और पिछड़ी जातियों को लेकर राजनीतिक आंदोलन अपना रंग जमा चुका था.

वहाँ 1916 में टीएम नायर और राव बहादुर त्यागराज चेट्टी ने पहला ग़ैर-ब्राह्मण घोषणापत्र जारी किया था. 1921 में जस्टिस पार्टी ने स्थानीय चुनाव जीता था.

वर्ष 1944 में ईवी रामास्वामी यानी पेरियार ने जस्टिस पार्टी का नाम बदलकर 'द्रविड़ कड़गम' कर दिया. ये एक ग़ैर राजनीतिक पार्टी थी जिसने पहली बार द्रविड़नाडु (द्रविड़ों का देश) बनाने की मांग रखी थी.

आज़ादी के बाद मद्रास रेसीडेंसी नाम के राज्य के पहले मुख्यमंत्री बने कांग्रेस के सी राजगोपालाचारी. बाद में यही मद्रास राज्य बन गया.

क्षेत्रीय दलों का वर्चस्व

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Image caption डीएमके और एआईएडीएमके बारी-बारी से सरकार बनाते रहे हैं

वर्ष 1953 में रायससीमा और तटीय क्षेत्रों को मिलाकर आंध्र प्रदेश का गठन कर दिया गया. वर्ष 1968 में इसी मद्रास राज्य का नाम तमिलनाडु कर दिया गया.

इस बीच पेरियार और सीएन अन्नादुरई के बीच मतभेद हो गए और पार्टी टूट गई. अन्नादुरई ने द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) का गठन किया. डीएमके ने 1956 में राजनीति में प्रवेश करने का मन बनाया.

साठ के दशक में हिंदी के ख़िलाफ़ हुए आंदोलन ने डीएमके को ताक़त दी और 1967 में डीएमके ने राज्य से कांग्रेस का सफ़ाया कर दिया.

सीएन अन्नादुरई डीएमके के पहले मुख्यमंत्री बने. लेकिन 1967 में उनकी मृत्यु हो गई और एम करुणानिधि मुख्यमंत्री बने.

अभी करुणानिधि को मुख्यमंत्री बने बहुत समय नहीं हुआ था कि वर्ष 1969 में उनके नेतत्व को एमजी रामचंद्रन (एमजीआर) ने चुनौती दी.

1972 में डीएमके का विभाजन हो गया और एमजीआर ने ऑल इंडिया द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (एआईएडीएमके) का गठन किया.

एमजीआर ने 1977 में पहली बार चुनाव जीता और 1987 में अपनी मृत्यु से पहले उन्होंने तीन बार, 1977, 1980 और 1984 में सरकार बनाई.

एमजीआर के निधन ने एआईएडीएमके में भी बँटवारा कर दिया. एक धड़ा उनकी पत्नी जानकी रामचंद्रन के साथ था और दूसरा जे जयललिता के साथ.

लेकिन 1989 में एआईएडीएमके की हार के बाद दोनों धड़े फिर एक हो गए.

गठबंधनों का दौर

इसके बाद भी डीएमके और एआईएडीएमके में छोटी-मोटी टूट-फूट होती रही लेकिन यही दोनों दल बारी-बारी से सत्ता संभालते रहे.

एमजीआर के निधन के बाद किसी भी एक दल को लगातार दूसरी बार सत्ता नहीं मिली.

1989 में डीएमके को सत्ता मिली तो 1991 में एआईएडीएमके ने अपना मुख्यमंत्री बनाया.

वर्ष 1996 में डीएमके और सहयोगी दलों की सरकार बनी तो वर्ष 2001 में एआईएडीएमके और सहयोगी दलों की और वर्ष 2006 में हुए चुनाव में एक बार फिर डीएमके और सहयोगी दल सत्ता में लौट आए.

डीएमके और एआईएडीएम के अलावा छोटे-छोटे दलों का उदय हुआ 1990 के दशक में जातीय राजनीति के उभार के बाद.

टीएमसी, पीएमके, वीसीके, एमडीएमके और केएमपी जैसे दलों ने तमिलनाडु के अलग-अलग इलाक़ों में अपना वर्चस्व कायम किया और फिर वे डीएमके और एआईएडीएमके साथ गठबंधन बनाते रहे.

डीएमके और एआईएडीएमके दोनों बारी-बारी से केंद्र सरकार के गठन में अहम भूमिका निभाते रहे.

समय डीएमके कांग्रेस के नेतृत्व में गठित यूपीए में शामिल है और केंद्र सरकार का हिस्सा है. राज्य में करुणानिधि के नतृत्व में डीएमके और कांग्रेस की सरकार और एक बार फिर दोनों मिलकर चुनाव लड़ रहे हैं.

एआईएडीएमके और दूसरे छोटे दल अपना गठबंधन बनाकर चुनाव मैदान में हैं.

दूरसंचार घोटाले में ए राजा के फँसने के बाद डीएमके के लिए दिक़्कतें पैदा हुई हैं लेकिन इससे पहले एआईएडीएमके पर भी भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे हैं.

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