श्रीलंका सरकार ने हज़ारों नागरिकों को मारा: संयुक्त राष्ट्र

संयुक्त राष्ट्र ने कहा है कि वर्ष 2009 में तमिल विद्रोहियों के ख़िलाफ़ लड़ाई के अंतिम महीनों में जिन हज़ारों नागरिकों की मौत हुई उनमें से ज़्यादातर को श्रीलंका सरकार के सैनिकों ने मारा था.

अपनी रिपोर्ट में संयुक्त राष्ट्र ने तमिल विद्रोहियों पर भी आरोप लगाया है कि उन्होंने नागरिकों को मानव ढाल की तरह इस्तेमाल किया.

वहीं संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मून ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि वो इन कथित युद्ध अपराधों के ख़िलाफ़ श्रीलंका या संयुक्त राष्ट्र के अन्य सदस्यों की सहमति के बग़ैर अंतरराष्ट्रीय जाँच की घोषणा नहीं करेंगे.

बीबीसी संवाददाता के मुताबिक श्रीलंका सरकार इस जाँच के लिए तैयार नहीं होगी और न ही संयुक्त राष्ट्र के अन्य सदस्य तैयार होंगे जो श्रीलंका के सहयोगी हैं.

हालांकि महासचिव ने कहा है कि उनका कार्यालय श्रीलंका सरकार की जाँच पर नज़र रखेगा और कथित उल्लंघनों के मामले पर और जानकारी इकट्ठा करेगा.

प्रताड़ना के मामले

बान की मून ने एक विशेष समिति का गठन किया था जो उन्हें श्रीलंकाई गृह युद्ध के दौरान हुई कथित ज़्यादतियों से निपटने के तरीकों पर सलाह दे सके. इसी समिति ने अब अपनी रिपोर्ट सौंपी है.

इस पैनल का कहना है कि कि श्रीलंका सरकार और विद्रोहियों दोनों ने अत्याचार किया और इसकी अंतरराष्ट्रीय जाँच होनी चाहिए.

जाँच की माँग

श्रीलंका सरकार ने संयुक्त राष्ट्र से कहा था कि वो अपनी रिपोर्ट न छापे. श्रीलंका सरकार लगातार इन आरोपों का खंडन करती रही है कि उसने नागरिकों को निशाना बनाया. उसका कहना है कि रिपोर्ट पक्षपातपूर्ण और ग़लत है.

संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में श्रीलंका में गृह युद्ध के अंतिम महीनों की यानी जनवरी से मई 2009 के बीच के समय की क्रूर तस्वीर पेश की गई है

रिपोर्ट के मुताबिक संयुक्त राष्ट्र के चिकित्सा केंद्र और रेड क्रॉस के जहाज़ों को जानबूझकर निशाना बनाया गया.

ये भी लिखा गया है कि कै़दियों को सर में गोली मारी गई और महिलाओं का बलात्कार किया गया.

जबकि तमिल विद्रोहियों पर आरोप लगाया गया है कि उन्होंने तीन लाख तीस हज़ार नागरिकों को मानव ढाल की तरह इस्तेमाल किया और जिन लोगों ने भागने की कोशिश की उन्हें मार दिया.

संयुक्त राष्ट्र की समिति ने श्रीलंका सरकार से आग्रह किया है कि वो नागरिकों की मौत में अपनी भूमिका को स्वीकार करते हुए एक औपचारिक घोषणा करे.

साथ ही ये भी अनुशंसा की गई है कि श्रीलंका सरकार इन गंभीर आरोपों के जवाब में एक ऐसी प्रक्रिया शुरु करे जिसमें जवाबदेही तय हो और जाँच शुरु हो.

रिपोर्ट में संयुक्त राष्ट्र अधिकारियों की भी आलोचना की गई है कि उन्होंने श्रीलंका सरकार पर ज़रूरी दवाब नहीं डाला ताकि वो संयम बरते और न इतनी बड़ी संख्या में लोगों के मारे जाने की बात सार्वजनिक की ताकि श्रीलंका सरकार पर और दवाब पड़ता.

ये विवादित दस्तावेज़ तैयार करने में 10 महीनों का समय लगा है. इस दौरान सबूत इकट्ठा किए गए. इस रिपोर्ट को प्रकाशित किया जाना बार-बार टलता रहा क्योंकि श्रीलंका ने बान की मून से आग्रह किया था कि ये रिपोर्ट छापी न जाए.

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