हर दिन 1000 नेपाली युवा जाते हैं विदेश

नेपाली युवा इमेज कॉपीरइट BBC World Service

जिस समय दुनिया विश्व युवा दिवस मना रही है, नेपाल के एक हज़ार सक्षम युवा रोज़गार की तलाश में विदेश जाने की तैयारी में लगे हुए हैं.

ये नेपाल में कुछ समय से एक आम प्रवृत्ति हो गई है.

उस समय जब नेपाल संघर्ष के साए से उबरने की कोशिश कर रहा है और देश एक के बाद एक राजनीतिक अस्थिरता के दौर से गुज़र रहा है, यहाँ रोज़गार के अवसर लगभग ख़त्म हो चुके हैं.

इसलिए नेपाली युवाओं में विदेशों में रोज़गार पाने का ये आकर्षण पैदा हुआ है.

श्रम एवं परिवहन मंत्रालय के प्रवक्ता पूर्णचंद्र भट्टाराई का कहना है, "सच तो ये है कि कुछ हफ़्ते पहले हर दिन देश छोड़कर जाने वाले युवाओं की संख्या 1400 तक जा पहुँची है."

अब विदेशों में काम कर रहे नेपाली युवाओं की संख्या 20 लाख पहुँच चुकी है यानी देश की कुल आबादी का लगभग दस प्रतिशत.

ग़रीबी दूर करने में सहायक

विदेश जाने वाले इन युवाओं में से 60 प्रतिशत खाड़ी देशों में जाते हैं और एक तिहाई मलेशिया.

ये युवा इन देशों में अकुशल श्रमिकों की तरह काम करते हैं जिसमें बहुत कम पैसे मिलते हैं.

लेकिन वे अपनी इस कम कमाई के बावजूद हर साल जो 2.6 अरब नेपाली रुपए अपने घरों को भेजते हैं वो एक अहम पहलू है और इसी के दम पर राजनीतिक और आर्थिक अस्थिरता के दौर में अर्थव्यवस्था टिकी हुई है.

विश्व बैंक की सहायता से देश के केंद्रीय सांख्यिकी ब्यूरो ने नेपालियों के जीवन स्तर पर जो तीसरी रिपोर्ट तैयार की है उससे भी इस तथ्य की पुष्टि होती है.

इस हफ़्ते की शुरुआत में जारी की गई इस रिपोर्ट में कहा गया है कि विदेशों में काम कर रहे युवाओं की ओर से भेजे जाने वाली राशि ही नेपालियों के जीवन में सुधार का एक महत्वपूर्ण कारण बनी हुई है.

पंद्रह वर्ष पहले जब केंद्रीय सांख्यिकी ब्यूरो ने जीवन स्तर के बारे में अपनी पहली रिपोर्ट जारी की थी, तब से अब की तुलना करें तो नेपालियों की औसत वार्षिक आय पाँच गुना बढ़ चुकी है.

रिपोर्ट में कहा गया है कि 55 प्रतिशत परिवारों के लिए विदेशों से भेजे जाने वाली रकम ही आय का प्रमुख स्रोत है.

केंद्रीय सांख्यिकी ब्यूरो के अधिकारियों का कहना है कि वे उम्मीद करते हैं कि इस रकम की वजह से ही ग़रीबी नाटकीय तरीक़े से कम हो सकती है.

ब्यूरो के महानिदेशक उत्तम नारायण मल्ला कहते हैं, "इस समय हम ग़रीबी की दर का आकलन करने में लगे हुए हैं. आरंभिक आंकड़ों से संकेत मिल रहे हैं कि अत्यंत ग़रीबी की दर मौजूदा 25 प्रतिशत से बहुत नीचे आ सकती है."

कुल विश्लेषकों का कहना है कि जब नए आंकड़े जारी किए जाएँगे तो अत्यंत ग़रीबों की संख्या में दस प्रतिशत तक की कमी दिख सकती है.

अनुत्पादक

इमेज कॉपीरइट BBC World Service
Image caption नेपाल कई सालों से अस्थिरता के माहौल में है

लेकिन बहुत से समाजशास्त्रियों ने नेपाली युवाओं के इस पलायन पर निराशा जताई है.

उनका कहना है कि युवा अपनी जवानी का महत्वपूर्व समय जिस तरह से एक दूसरे देश में, अपने परिवारों और मित्रों से दूर बिता रहे हैं उसका गहरा मनोवैज्ञानिक असर पड़ सकता है.

एक समाजशास्त्री बिनोद भंडारी का कहना है, "हमें इन युवाओं के ऐसे बौद्धिक विकास के कोई लक्षण नहीं दिख रहे हैं कि वे जब अपने देश को लौटेंगे तो नए ज्ञान और नवाचार के साथ लौटेंगे. उल्टे वे जो पैसे अपने देश में भेज रहे हैं वो बेहद अनुत्पादक और उपभोक्ता संबंधी क्षेत्रों में खर्च हो रहे हैं."

विदेश जा रहे ये युवा भी अपने भविष्य को लेकर बहुत आश्वस्त नहीं हैं.

पूर्वी नेपाल के एक युवक नगेंद्र खरेल का कहना है, "युवाओं में बहुत शक्ति है लेकिन उसका कोई रचनात्मक उपयोग नहीं हो रहा है."

यह युवक जो कह रहा है वह आधारहीन भी नहीं है.

ज़्यादातर समय राजनीतिक दल और दूसरे संगठन युवाओं का उपयोग अपने राजनीतिक फ़ायदे के लिए हथियार की तरह करते हैं. सड़कों पर होने वाले प्रदर्शनों और दंगों में इन युवाओं का जिस तरह से उपयोग होता है उससे इस बात की पुष्टि होती है कि उनका कोई रचनात्मक उपयोग नहीं हो रहा है.

संबंधित समाचार