तालिबान से शांति वार्ता ख़तरे में

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Image caption रब्बानी ने 1970 के दशक में मुजाहिदीन गुट की स्थापना की

अफ़ग़ानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति बुरहानुद्दीन रब्बानी की हत्या से तालिबान के साथ शांति की संभावना पूरी तरह पटरी से तो नहीं उतरेगी मगर ये प्रक्रिया अब मुश्किल ज़रूर हो जाएगी.

तालिबान के मुख्य सशस्त्र विरोधियों नॉर्दर्न अलायंस के प्रमुख रह चुके रब्बानी का शांति परिषद के प्रमुख के रूप में चयन काफ़ी चौंकाने वाला था. वैसे तालिबान के साथ रिश्ते सुधारने में इस परिषद को कोई ख़ास सफलता मिली भी नहीं थी.

पिछले हफ़्ते अमरीकी दूतावास पर हमले के बाद इस तरह के हमले में उनकी हत्या से ये साफ़ दिख रहा है कि कुछ गुट अब भी शांति प्रक्रिया के विरोधी हैं और वे यही मानते हैं कि मसले का हल सैनिक ढंग से ही निकल सकता है.

अमरीकी अधिकारियों ने पिछले हफ़्ते दूतावास पर हुए हमले की ज़िम्मेदारी तालिबान पर नहीं डाली थी बल्कि उन्होंने इसके लिए हक़्क़ानी नेटवर्क को ज़िम्मेदार माना. ये गुट उत्तरी वज़ीरिस्तान से सक्रिय है और माना जाता है कि ये पाकिस्तानी सरकार की शह पर काम करता है.

अब ये हमला चाहे तालिबान ने कराया हो या हक़्क़ानी नेटवर्क ने दोनों ही इस बात से ख़ुश होंगे कि रब्बानी अब तस्वीर से पूरी तरह अलग हो गए हैं.

वैसे रब्बानी भले ही शांति के प्रमुख वार्ताकार की भूमिका में मारे गए हों मगर वह सक्रिय राजनीतिक जीवन में काफ़ी विभाजनकारी शख़्सियत थे.

वह 1970 के दशक में विश्वविद्यालय में लेक्चरर थे और अफ़ग़ान मुजाहिदीनों के संस्थापक के तौर पर भी देखे जाते थे.

उन्होंने 1973 में इस्लामी राजनीति के ख़िलाफ़ हुई कार्रवाई के समय देश छोड़ दिया था और वह पाकिस्तान चले गए थे. वहीं पर उनकी राजनीतिक पार्टी के छात्र सदस्यों को पाकिस्तान ने प्रशिक्षण दिया.

इसके बाद वही छात्र मुजाहिदीन आंदोलन की रीढ़ बने जिसने बाद में 1980 के दशक में रूसी फ़ौजों को हराया.

रब्बानी एक प्रमुख मुजाहिदीन गुट के नेता थे और 1992 में वह कुछ समय के लिए अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति भी रहे. रूसी सेना के हट जाने के बाद ये वह दौर था जबकि मुजाहिदीन आपस में ही लड़ रहे थे और देश में एक तरह से गृह युद्ध की स्थिति बन गई थी.

अब रब्बानी के बाद जो भी शांति परिषद का प्रमुख बनेगा उसे मध्यस्थों से मिलने को लेकर काफ़ी सतर्कता बरतनी होगी.

मगर इसके साथ ही सवाल ये भी उठेंगे कि आख़िरकार चरमपंथियों की कमान है किसके हाथ और क्या इस मसले का वार्ता के ज़रिए कोई समाधान निकल भी सकता है या नहीं.

जहाँ तक तालिबान या अन्य चरमपंथी गुटों का सवाल है तो वे अब भी शांति की अफ़ग़ानिस्तान सरकार की राह से पूरी तरह आश्वस्त नहीं दिखते.

निचले स्तर के लड़ाकुओं और कमांडरों को फिर से समाज की मुख्य धारा में वापस लाने के काम में पिछले कुछ वर्षों में कुछ हद तक सफलता मिली है मगर अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान को हराने और सत्ता से हटाने के 10 साल बाद भी शांति अभी तक दूर-दूर तक नज़र नहीं आती.

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