शांति प्रक्रिया नहीं रुकेगी: अफ़ग़ान सरकार

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अफ़ग़ानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति और शांति परिषद के प्रमुख बुरहानुद्दीन रब्बानी की हत्या के बाद सैकंड़ों की संख्या में अफ़ग़ान लोग उन्हें श्रद्धांजलि देने और हत्या का विरोध करने के लिए सड़कों पर उतरे.

वहीं अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करज़ई न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र की अपनी यात्रा में कटौती करके काबुल लौट आए हैं. अफ़ग़ान सरकार ने कहा है कि तालिबान के साथ बातचीत के मुख्य वार्ताकार रब्बानी की हत्या के बावजूद शांति प्रक्रिया नहीं रुकेगी.

मंगलवार शाम को घर पर हुए बम हमले में बुरहानुद्दीन रब्बानी की मौत हो गई थी. ये बम पगड़ी में छिपाया गया था. काबुल में रब्बानी के घर के पास की सड़कों पर आवाजाही बंद कर दी गई है.

बीबीसी संवाददाता डेविड लॉयन ने बताया है कि उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए पहुंचने वालों में कई पूर्व लड़ाके शामिल हैं. पुलिस हर आने वाले की तलाशी ले रही है.

काला पटका पहने सैकड़ों लोग सड़कों पर रब्बानी की तस्वीर लेकर निकले.

ऐसे ही एक अफ़ग़ान नागरिक हयातुल्लाह ने रॉयटर्स को बताया, “हम शांति और स्थायित्व के दुश्मनों के प्रति अपना विरोध जताने आए हैं. हम अपने नेता की हत्या की निंदा करते हैं.”

वहीं एपी से बातचीत में काबुल निवासी मिर्ज़ा मोहम्मद ने कहा, “रब्बानी अफ़ग़ानिस्तान में शांति चाहते थे और इसी राह पर चलते हुए उन्होंने अपनी जान दे दी.”

'तालिबान से विशेष संदेश लाए थे'

अब तक किसी गुट ने हमले की ज़िम्मेदारी नहीं ली है. हमले के समय 71 वर्षीय रब्बानी तालिबान कमांडरों से मुलाक़ात कर रहे थे. वे कुछ दिन पहले ही बातचीत के लिए विदेश से लौटे थे.

शांति परिषद के सदस्य फ़ज़ल करीम ने बताया है कि मंगलवार को जो दो लोग रब्बानी से मिलने आए थे उन्होंने कहा था कि वे तालिबान की ओर से ‘विशेष संदेश’ लाए हैं और उन्हें काफ़ी ‘भरोसेमंद’ समझा जाता था.

फ़ज़ल करीम के मुताबिक, “मिलने आए दो लोगों में से एक व्यक्ति ने रब्बानी के कंधे पर अपना सर रखा और अपनी पगड़ी में छिपाए विस्फोटकों को उड़ा दिया.”

बीबीसी संवाददाता के मुताबिक अंतरराष्ट्रीय समुदाय चाहेगा कि हामिद करज़ई जल्द से जल्द शांति परिषद का नया प्रमुख नियुक्त कर दें जो काम जारी रखे.

संवाददाता का ये भी कहना है कि तालिबान विरोधी नार्दन एलायंस के पूर्व सदस्यों को इस हत्या से राजनीतिक बल मिलेगा. ये लोग कहते रहे हैं कि शांति वार्ता कभी कारगर नहीं हो सकती.

रब्बानी की भूमिका

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शांति परिषद अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान के साथ बातचीत की कोशिशों की अगुआई कर रहा है.

जब 2010 में इस परिषद का गठन हुआ था तो हामिद करज़ई ने कहा था कि ये अफ़ग़ान लोगों के लिए उम्मीद की सबसे बड़ी किरण है. करज़ई ने तालिबान से भी अपील की थी कि वे इस मौके को न गवाँए

लेकिन इस परिषद के ज़्यादातर सदस्य पूर्व लड़ाके हैं जिन्होंने तालिबान के ख़िलाफ़ लड़ाई की थी. उनके शामिल किए जाने के बाद से शक जताया जाता रहा है कि शांति स्थापना का काम कितना सफल हो पाएगा.

बीबीसी संवाददाता का कहना है कि रब्बानी को शांति परिषद का प्रमुख बनाए जाने पर उस समय काफ़ी हैरानी जताई गई थी.

कुछ लोगों ने ये भी कहा था कि मुजाहिद्दीन के साथ अपना संबंधों के दौरान रब्बानी के ख़िलाफ़ युद्ध अपराधों का मामला चलाया जाना चाहिए.

70 के दशक में रब्बानी ने ही कई गुटों का गठन किया था जो बाद में अफ़ग़ान मुजाहिद्दीन बने और सोवियत सेना के ख़िलाफ़ लड़े.

बहुत से लोग रब्बानी और उनके सहयोगियों को अफ़ग़ान गृह युद्ध के दौरान हुई तबाही के लिए दोषी मानते हैं.

1996 में तालिबान ने रब्बानी को राष्ट्रपति पद से हटा दिया था. इसके बाद वे नार्दन एलायंस के प्रमुख बन गए.

2001 में अमरीका की मदद से ताबिलान के खदेड़े जाने के बाद संयुक्त राष्ट्र ने रब्बानी को ही आधिकारिक राष्ट्रपति के तौर पर मान्यता दी थी.

पिछले कुछ महीनों में अफ़ग़ानिस्तान में कई बड़ी हस्तियों की हत्या की जा चुकी है. इस साल जुलाई में अफ़ग़ान राष्ट्रपति हामिद करज़ई के एक वरिष्ठ सलाहकार जान मोहम्मद ख़ान की काबुल में गोली मार कर हत्या कर दी गई थी.

जुलाई में ही हामिद करज़ई के सौतेले भाई अहमद वली करज़ई को उनके अपने ही सुरक्षा प्रमुख ने गोली मार दी थी जिसमें उनकी मौत हो गई थी.

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