बर्मा: कई प्रभावशाली क़ैदियों की रिहाई

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Image caption अंतरराष्ट्रीय समुदाय बर्मा में क़ैद किए गए सरकार विरोधियों को रिहा करने की मांग करता रहा है

एक ऐतिहासिक क़दम के रुप बर्मा की सरकार ने जेलों में बंद कई प्रभावशाली राजनीतिक शख्सियतों और लोकतंत्र के पैरोकारों को रिहा कर दिया है.

बीबीसी की दक्षिण एशिया के संवाददाता रैशल हार्वे के मुताबिक़ रिहा किए गए लोगों में कई नामी-गिरामी राजनीतिक शख्सियतें, छात्र नेता और सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हैं. इस क़दम को राजनीतिक सुधारों और लोकतंत्र की दिशा में एक महत्वपूर्ण क़दम माना जा रहा है.

रिहा किए गए क़ैदियों में मिन को नाइंग शामिल हैं जो 1988 में हुए लोकतांत्रिक आंदोलन के प्रमुख नेताओं में से एक थे. बर्मा के पूर्व प्रधानमंत्री खिन न्यूंत जिन्हें 2004 में नज़रबंद किया गया था उन्हें भी रिहा कर दिया गया है.

बर्मा के सरकारी मीडिया ने घोषणा की थी कि राष्ट्रपति की ओर से मानवीय आधार पर दी गई इस माफ़ी के तहत 651 क़ैदियों को रिहा किया जाएगा. हालांकि यह नहीं बताया गया था कि उनमें राजनीतिक क़ैदी भी शामिल होंगे या नही.

अंतरराष्ट्रीय समुदाय लगातार बर्मा में क़ैद किए गए सरकार विरोधियों को रिहा करने की मांग करता रहा है.

सेना की पकड़ अब भी सख़्त

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Image caption मिन को नाइंग को लोकतांत्रिक अधिकारों की मांग और सरकार के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने को लेकर कई बार क़ैद किया जा चुका है

शांति का नोबेल पुरस्कार जीत चुकीं और लोकतंत्र समर्थक नेता ऑन्ग सॉन सू ची की पार्टी नेशनल लीग फ़ॉर डेमोक्रेसी ने इसे एक सकारात्मक संकेत बताया है.

मानवाधिकार संगठन ह्यूमन राइट्स ने भी इस क़दम का स्वागत किया है हालांकि यह कहा है कि अब भी बर्मा में सरकार विरोधी क़ैद हैं और अंतरराष्ट्रीय निगरानी दलों को इन जेलों में प्रवेश का अनुमति मिलनी चाहिए.

बीबीसी संवाददाता रैशल हार्वे के मुताबिक रिहा किए गए लोगों की सूची देखकर यह कहा जा सकता है कि बर्मा में सुधार लागू करने की दिशा में यह मील का पत्थर साबित होगा.

हालांकि बर्मा से निर्वासित और लोकतंत्र के लिए आंदोलन कर रहे संगठनों का कहना है कि सरकार की निष्पक्षता और प्रतिबद्धा की असली परीक्षा इस बात से होगी कि रिहा किए गए लोगों अपनी आवाज़ बुलंद करने और लोकतंत्र की पैरवी करने की कितनी आज़ादी मिलती है.

बीबीसी संवाददाता के मुताबिक बर्मा की सरकार अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों को हटाने के लिए तेज़ी से सुधारवादी क़दम उठा रही है लेकिन सरकार पर सेना की पकड़ अब भी सख्त है.

शुक्रवार को ही बर्मा की सरकार ने 60 सालों के संघर्ष को विराम देते हुए करेन विद्रोहियों के साथ संघर्ष-विराम समझौते पर हस्ताक्षर किए थे.

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