विद्रोह के बाद मालदीव के राष्ट्रपति का इस्तीफ़ा

  • 7 फरवरी 2012
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Image caption राष्ट्रपति मोहम्मद नाशीद ने वर्ष 2008 में चुनाव जीतने के बाद पद संभाला था

हिंद महासागर में स्थित द्वीपीय देश मालदीव में अशांति और विद्रोह के बीच राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद ने अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया है.

सरकारी टेलीविज़न पर दिए एक संदेश में उन्होंने कहा कि 'देश में जो परिस्थितियाँ हैं, उसमें बेहतर होगा' अगर वे इस्तीफ़ा दे दें.

राष्ट्रपति के नज़दीकी एक सूत्र ने कहा कि ये 'पूर्ववर्ती सत्तारुढ़ दल की ओर से किया गया तख़्तापलट' है.

इससे पहले विद्रोही पुलिस अधिकारियों ने राजधानी माले में सरकारी टेलीविज़न पर कब्ज़ा कर लिया था और पूर्व राष्ट्रपति मौमून अब्दुल गयूम के समर्थन में संदेश प्रसारित करना शुरु कर दिया था.

वहाँ कई पत्रकारों को भी रोककर रखा गया है.

उधर पूर्व राष्ट्रपति मौमून अब्दुल गयूम के प्रदर्शनकारियों पर नियंत्रण के लिए सेना ने आँसू गैस छोड़े हैं.

मालदीव में तनाव की शुरुआत तब हुई थी जब पिछले महीने सेना ने एक वरिष्ठ न्यायाधीश को गिरफ़्तार कर लिया था. इसके बाद सड़कों पर प्रदर्शन का सिलसिला शुरु हो गया था.

सत्ता का संघर्ष

राष्ट्रपति नशीद ने अपने इस्तीफ़े की घोषणा सरकारी टेलीविज़न पर की है.

उन्होंने कहा, "ये देश के लिए बेहतर होगा यदि वर्तमान परिस्थितियों में मैं अपने पद से इस्तीफ़ा दे दूं. मैं ज़्यादतियाँ करके सरकार नहीं चलाना चाहता. मैं इस्तीफ़ा दे रहा हूँ. "

समझा जा रहा है कि वे उपराष्ट्रपति मोहम्मद वहीद हसन को प्रभार सौंपेंगे.

राष्ट्रपति नशीद के कार्यालय के सूत्रों ने बीबीसी को बताया कि मंगलवार को जो प्रदर्शन हुए हैं सैन्य मुख्यालय के सामने हुए हैं जहाँ बहुत ज़्यादा सुरक्षा होती है.

राष्ट्रपति कार्यालय ने एक बयान जारी करके कहा है, "माले में स्थिति पर काबू पाने के लिए जो कुछ भी ज़रुरी है, किया गया है."

सोमवार को 50 पुलिसकर्मियों ने प्रदर्शनकारियों का साथ देने की घोषणा कर दी थी और सरकार के आदेश मानने से इनकार कर दिया था.

आरोप था कि इसके बाद सेना ने इन पुलिसकर्मियों पर रबर की गोलियाँ दागीं. लेकिन राष्ट्रपति कार्यालय ने इन आरोपों का खंडन किया है.

बीबीसी संवाददाता का कहना है कि ये तनाव पूर्व राष्ट्रपति गयूम और वर्तमान राष्ट्रपति नशीद के बीच सत्ता की लड़ाई की वजह से है.

राष्ट्रपति गयूम ने 30 साल तक देश पर शासन किया, जिसके बारे में कहा जाता है कि वह मुख्य रुप से तानाशाही की तरह ही था.

राष्ट्रपति नशीद ने वर्ष 2008 में सत्ता संभाली थी और उन्हें देश में पहली बार लोकतांत्रिक ढंग से चुनी गई सरकार चलाने का श्रेय दिया जाता है.

न्यायाधीश की गिरफ़्तारी

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Image caption एक वरिष्ठ न्यायाधीश की गिरफ़्तारी के बाद से तनाव बढ़ा है

सेना ने पिछले महीने एक वरिष्ठ न्यायाधीश अब्दुल्ला मोहम्मद को गिरफ़्तार कर लिया था.

सरकार का आरोप है कि हिरासत में लिए गए विपक्षी राजनीतिक कार्यकर्ताओं की रिहाई का उनका फ़ैसला राजनीति से प्रेरित था.

सरकार का कहना है कि न्यायाधीश का मामला कोई इकलौता मामला नहीं है बल्कि यह एक ऐसी समस्या का हिस्सा है जिसकी जड़ें न्यायपालिका में बहुत गहरी हैं. सरकार का कहना है कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता के लिए संतुलन बनाए रखना बहुत ज़रुरी है.

बीबीसी संवाददाता चार्ल्स हैविलैंड का कहना है कि जब से पूर्व मानवाधिकार कार्यकर्ता मोहम्मद नशीद ने सत्ता संभाली है, एक तरह का संवैधानिक ठहराव आ गया है क्योंकि जो राजनीतिक दल नशीद का विरोध करते हैं वो संसद में बहुमत में हैं.

बड़ा सवाल

बीबीसी संवाददाता जिल मैकगिवरिंग के अनुसार मालदीव में ये एक ऐसा संकट है जिसकी भूमिका पिछले कुछ समय से तैयार हो रही थी.

एक वरिष्ठ न्यायाधीश को जब ये कहकर हटाया गया कि वे विपक्ष के प्रति वफ़ादार हैं तब नशीद के लिए असली परेशानी शुरु हुई.

पहले तो मानवाधिकार कार्यकर्ता इसके ख़िलाफ़ सामने आ गए. फिर ये विवाद इतना गरमा गया कि संयुक्त राष्ट्र से दखल देने की मांग होने लगी.

लेकिन इसकी जड़ में दरअसल राष्ट्रपति नशीद और पूर्व राष्ट्रपति गयूम के बीच की राजनीतिक खींचतान है.

चार साल पहले चुनाव जीतने के बाद ही नशीद पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन के मु्द्दों पर एक मुखर स्वर बनकर उभरे थे.

लेकिन वे गयूम के समर्थकों का निरंतर विरोध झेलते रहे और धार्मिक कट्टरपंथियों का भी, जो उन पर इस्लाम विरोधी होने का आरोप लगाते हैं.

इस घटनाक्रम ने अगले वर्ष चुनाव की संभावना तो पैदा कर दी है लेकिन बड़ा सवाल ये है कि इस घटनाक्रम का आने वाले चुनावों पर क्या असर होगा और क्या इसका मालदीव में लोकतंत्र की परिवक्वता पर क्या असर होगा?

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