बांग्लादेश की सेना में एक महिला अफसर

  • 13 अप्रैल 2012
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Image caption मेजर नासिरा अफरोज कहती हैं कि उन्होने सेना में रह कर रूकावटों पर जीत हासिल करना सीखा है

बांग्लादेश की रहने वाली नासिरा अफरोज... वे सिर्फ नासिरा नहीं मेजर नासिरा अफरोज हैं.

बांग्लादेश सेना की 8वीं फील्ड रेजीमेंट आर्टिलरी में अफसर मेजर नासिरा, मिलिट्री पुलिस और सू़डान में संयुक्त राष्ट्र शांति मिशन का हिस्सा भी रह चुकी हैं.

ये आम धारणा किसी एक देश तक सीमित नहीं है कि महिलाएं सेना में शामिल होने, खासकर युद्ध क्षेत्र में जाने के लिए मानसिक मजबूती नहीं रखतीं.

लेकिन सेना में महिलाओं की कम भागीदारी, पुरूषों का वर्चस्व और इस क्षेत्र की कठिनाइयों के बावजूद नासिरा सेना में भर्ती होने के लिए प्रेरित हुईं.

बीबीसी से बात करते हुए नासिरा बताती हैं, “मुझे बांग्लादेश सेना में 2003 में कमीशन मिला. सच ये है कि मैने बचपन से सेना में जाने का सपना नहीं देखा था लेकिन मैं कुछ हटकर करना चाहती थी. 12वीं पास करने के बाद जब मुझे सेना में भर्तियों का पता चला तो मुझे लगा बस यही है जो मैं करना चाहती हूं. दरअसल मेरी मां भी चाहती थी कि मैं सेना में जाऊं.

चुनौतीपूर्ण सैन्य प्रशिक्षण

सेना में आने का फ़ैसला तो कर लिया लेकिन नासिरा का असल इम्तहान तो अब शुरू हुआ था. सैन्य अकादमी में जाने का अनुभव भी यादगार रहा.

नासिरा कहती हैं “शुरू में बांग्लादेश मिलिट्री अकादमी में जाना मुझे थोड़ा अजीब लगता था. एक अनजाना सा डर था. फिर अपनी यूनिट में आना भी मेरे लिए थोड़ा मुश्किल भरा अहसास रहा. मेरे आसपास सिर्फ पुरूष होते थे लेकिन धीरे धीरे सब ठीक हो गया. मेरी यूनिट मेरा दूसरा घर बन गई.

दिलचस्प बात ये है कि मेजर नासिरा इस वक्त जिस कमांड में अफसर हैं उसमें उनके मातहत सभी पुरूष हैं और ये बात उनके लिए कुछ और चुनौतियों का तोहफा लाई.

नासिरा बताती हैं, सैनिकों में कुछ हद तक असहजता थी. एक महिला कमांडर से आदेश लेने में उन्हें कुछ तकलीफ जरूर होती थी. पर वक्त गुजरने के साथ स्थिति सुधर गई. मुझे लगता है अब उन्होने महिला अफसर को स्वीकार कर लिया है.

जिंदगी का फलसफा

नासिरा अपने इस चुनौतीपूर्ण सफर को सफलतापूर्वक तय कर पा रही हैं तो इसका कुछ श्रेय जाता है उनके हमसफर यानी उनके पति को, जो खुद सेना में हैं.

बीबीसी से बात करते हुए नासिरा कहती हैं कि दोनों के एक ही क्षेत्र में होने से वो एक दूसरे को बेहतर समझते हैं और समझौते कर पाते हैं.

अपनी अपरंपरागत किस्म की जिदगी से मेजर नासिरा अफरोज ने अब तक क्या सीखा...

बीबीसी के इस सवाल के जवाब में नासिरा कहती हैं, “इतने साल बिताने के बाद मैंने एक बात सीखी है कि अगर आपके सामने कोई रूकावट आती है तो उसे देखकर भागो मत, बेहतर है उस पर जीत हासिल करना. मैं औरतों को यही संदेश देना चाहूंगी. दूसरी बात ये जरूर कहूंगी कि अगर औरतों को एक गौरवपूर्ण करियर की चाहत है तो बांग्लादेश में सेना से बेहतर कुछ नहीं हो सकता.”

मेजर नासिरा अफरोज जैसी महिलाएं सचमुच एक उदाहरण हैं जिनकी उड़ान, कई महिलाओं को अपने पंख खोलकर उडा़न भरने के लिए प्रेरित कर सकती है.

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