भारत-बर्मा: दूरियां घटाने की कोशिश

  • 26 मई 2012
 भारत - बर्मा सीमा
Image caption प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की बर्मा यात्रा दोनों देशों के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है

क़रीब ढाई दशक साल बाद कोई भारतीय प्रधानमंत्री बर्मा जा रहा है. बर्मा में लोकतांत्रिक सुधार आने के बाद ये किसी भारतीय प्रधानमंत्री की पहली यात्रा है.

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की रविवार से हो रही बर्मा की तीन दिन की यात्रा कई मायनों में महत्वपूर्ण है. वैसे बर्मा भारत की ‘लुक ईस्ट’ नीति का एक ज़रूरी हिस्सा है जिसके तहत भारत दक्षिण-पूर्व एशिया में अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता है, साथ ही इस क्षेत्र में चीन के साथ उसकी प्रतिस्पर्धा का एक नमूना भी देखने को मिलता है.

आखिर भारत बर्मा पर कितनी आर्थिक और कूटनीतिक प्रभाव डाल पाएगा?

खुली सीमाएं

भारत और बर्मा के संबंधों पर एक नज़र डालने के लिए मैं पहुंची मणिपुर के मोरे शहर – जो बर्मा की सीमा से सटा हुआ है. यहां भारत और बर्मा के बीच का मुख्य चेकप्वांइट मौजूद है. इसके एक तरफ़ भारतीय सेना पहरा देती है तो दूसरी तरफ़ बर्मा के सैनिक.

सरहद के दरवाज़े रोज़ सुबह सात बजे खुलते हैं और दोनों तरफ़ से लोग खुलकर व्यापार करने के लिए आते-जाते हैं.

बर्मा से महिलाएं अपने चेहरे पर पारंपरिक चंदन जैसा लेप किए सब्ज़ियों, फलों और मछलियों की पेटियां भारत लाती हैं और यहां उनकी ख़ूब बिक्री होती है. लेकिन ये नज़ारा था आधिकारिक चेक प्वाइंट का.

चेक प्वाइंट से थोड़ी ही दूर कच्चे रास्तों से सरहद के आर-पार कई लोग ऐसे ही आ-जा रहे थे. एक सिपाही ने हमसे कहा, ‘आप देख ही सकते हैं कि सरहद के आर-पार जाना कितना आसान है.’

मोरे का शहर भारत और बर्मा के बीच बढ़ते व्यापार का प्रतीक है. भारत अब इस व्यापार और कूटनीतिक संबंध को इससे कई कदम और आगे ले जाना चाहता है.

भारत पढ़ने आते बर्मा के स्कूल बच्चे

बर्मा में भारत के राजदूत रहे राजीव भाटिया कहते हैं, "भारतीय उत्पादकों को बर्मा में निर्यात बढ़ाने की सोचनी चाहिए. इसके साथ वहां निवेश बढ़ाना भी ज़रूरी है."

अपनी यात्रा के दौरान मनमोहन सिंह मणिपुर की राजधानी इम्फ़ाल से बर्मा के मंडले शहर तक एक बस सेवा शुरु करने की घोषणा कर सकते हैं ताकि व्यापार में और मदद हो.

मिसाल के तौर पर मोरे में सबसे ज़्यादा दिलचस्प चीज़ जो मुझे देखने को मिली वो था स्कूली बच्चों को बर्मा से भारत आते देखना. नीले रंग की युनिफ़ार्म पहनकर ये बच्चे मोरे के ईसटर्न शाइन स्कूल के छात्र हैं.

स्कूल पहुंचकर मैंने स्कूल के प्रधानाचार्य से बात की तो उन्होंने कहा, "ये बच्चे बर्मा से भारत अंग्रेज़ी भाषा सीखने के लिए आते हैं क्योंकि वहां के स्कूलों में अंग्रेज़ी नहीं पढ़ाई जाती. अंग्रेज़ी सीखने के लिए इतनी ललक इसलिए क्योंकि ये बच्चे आगे चलकर सिंगापुर, हांग-कांग जैसे शहरों में व्यापार करना चाहते हैं और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापार करने के लिए अंग्रेज़ी सीखना ज़रूरी है."

ख़ास बात ये है कि सरहद के दोनों तरफ़ क़रीब 16 किलोमीटर तक आने-जाने में दोनों ही देशों के नागरिकों के लिए कोई प्रतिबंध नहीं है. किसी तरह के वीज़ा की ज़रूरत नहीं.

चीन का चक्कर

सरहद के उस पार यानि बर्मा की ज़मीन पर मैंने भी क़दम रखा.

वहां एक छोटा लेकिन भीड़ से भरा नम्फ़ालौंग नाम का बाज़ार लगा था. वहां सब्ज़ियों और कपड़ों के साथ-साथ चीन में बने सस्ते बिजली के यंत्र भी मौजूद थे जिनकी ख़ूब बिक्री हो रही थी. देखने से प्रतीत होता है कि चीन की बर्मा पर काफी मजबूत पकड़ है. यही पकड़ भारत के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती बन गई है.

वैसे चीन का बर्मा में भले ही कितना दबदबा हो, भारत के संबंध भी बर्मा से काफ़ी गहरे रहे हैं. लेकिन भारत की बर्मा में दिलचस्पी सिर्फ़ अर्थव्यवस्था तक ही सीमित नहीं. भारत बर्मा पर राजनीतिक और सामरिक दृष्टि से भी प्रभाव बढ़ाना चाहता है.

1990 के दशक तक भारत बर्मा में लोकतंत्र के पक्ष में था और आंग सांग सू ची का बड़ा समर्थक था. वर्ष 1988 में सत्ताधारी सेना के खिलाफ़ मुहिम चलने के बाद बर्मा से कई शर्णार्थी भारत आए थे.

भारत ने बदली नीति

ऐसे ही क़रीब 10 हजार शर्णार्थियों में से एक हैं डॉक्टर थूरा जिनसे मैं मणिपुर के चुरचानपुर शहर में मिली.

वो कहते हैं, "हमें भारतीय दूतावास ने भारत आने में मदद की. लेकिन उसके बाद हमें अगले तीन साल के लिए एक शर्णार्थी शिविर में डाल दिया गया और हमें बाहर जाने की इजाज़त नहीं मिली."

दरअसल भारत बर्मा के प्रति अपनी नीति में बदलाव कर चुका था. बर्मा और आसपास के क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव को देखकर भारत ने भी बर्मा की ओर अपना हाथ बढ़ाना शुरु किया.

लेकिन चीन की अर्थव्यवस्था भारत से कहीं बड़ी है और वहां बनने वाला सस्ता माल उसकी सबसे बड़ी ताकत. यही देखकर कई समीक्षक मानते हैं कि भारत को बर्मा और बर्मा के ज़रिए बाक़ि दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों पर अपना प्रभाव बनाने में बहुत समय लगेगा.

लेकिन जो भी हो भारत और चीन की क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा का नमूना अब बर्मा में भी देखने को मिलेगा.

संबंधित समाचार