बर्मा में मुसलमानों के ख़िलाफ़ हिंसक अभियान: एचआरडबल्यु

एचआरवल्यु रिपोर्ट इमेज कॉपीरइट hrw
Image caption एचआरवल्यु के अनुसार बर्मा की सेना चाहती तो मुसलमानों के ख़िलाफ़ हुई हिंसा को रोक सकती थी.

मानवाधिकार संगठन ह्युमन राइट्स वॉच (एचआरडबल्यु) ने कहा है कि बर्मा में जून के महीने में रोहिंग्या मुसलमानों और बौद्ध धर्म के मानने वालों के बीच हुए सांप्रदायिक दंगों में वहां की सेना ख़ामोश तमाशाई बनी रही और सेना अब भी मुसलमानों को प्रताड़ित कर रही है.

एचआरडबल्यु का कहना है कि बर्मा के सुरक्षाबलों ने रोहिंग्या मुसलमानों की हत्या की, उनकी महिलाओं के साथ बलात्कार किया और सैंकड़ों मुसलमानों को गिरफ़्तार भी किया है.

56 पन्नों पर आधारित ये रिपोर्ट पश्चिमी बर्मा के रखाइन प्रांत में रह रहे रोहिंग्या मुसलमानों की बदतरीन स्थिति को दुनिया के सामने उजागर करने और दुनिया का ध्यान उस ओर आकर्षित करने वाली पिछले 15 दिनों में ये दूसरी रिपोर्ट है.

यूएन के विशेष दूत

संयुक्त राष्ट्र ने हिंसा की जांच के लिए ख़ास दूत भेजा है जिसमें कम से कम 78 लोग मारे गए थे.

ह्यूमन राइट्स वॉच ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है, "मुसलमानों के साथ हुए दुर्व्यवहार को दूर करने के लिए अपनी गंभीरता को दर्शाने के लिए ये ज़रूरी है कि बर्मा की सरकार संयुक्त राष्ट्र के विशेष दूत टोमास क्वेंटाना को जांच करने के लिए पूरी छूट दे और इसके लिए ज़िम्मेदार लोगों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करे."

बैंकॉक स्थित बीबीसी संवाददाता जोनाह फ़िशर के मुताबिक़ जून में हुई भयानक हिंसा के बाद से बर्मा के अधिकारियों ने रखाइन राज्य के संवेदनशील इलाक़ों में पत्रकारों और राहतकर्मियों की आवाजाही पर रोक लगा दी है. इस वजह से सही जानकारी जुटा पाना बहुत मुश्किल हो गया है.

बर्मा ने इस बात से इनकार किया है कि उसके सुरक्षाकर्मी रखाइन प्रांत में मानवाधिकार हनन के दोषी हैं.

बर्मा के राष्ट्रपति के एक सलाहकार ने ह्यूमन राइट्स वॉच की रिपोर्ट के जवाब में कहा है कि सरकार ने हिंसा से निपटने के लिए जितनी जल्दी हो सकती थी कार्रवाई की.

इमेज कॉपीरइट BBC World Service
Image caption रोहिंग्या मुसलमान अपनी जान बचाकर बांग्लादेश या भारत में शरण लेने की कोशिश करते हैं.

ह्यूमन राइट्स वॉच ने अपनी ये रिपोर्ट बर्मा और पड़ोसी देश बांगलादेश में कुल 57 लोगों के बातचीत के आधार पर बनाई है.

रिपोर्ट में कहा गया है कि सुरक्षा बल हिंसा को रोकने में नाकामयाब रहे जिसकी वजह से कई घर तोड़ दिए गए और हज़ारों लोग बेघर हो गए.

'बेबुनियाद आरोप'

एचआरडबल्यु के एशिया निदेशक ब्रैड एड्म्स ने रिपोर्ट जारी करते हुए कहा, ''बर्मा के सुरक्षाकर्मी बौद्धों और रोहिंग्या मुसलमानों को आपस में लड़ने से रोकने में नाकाम रहे और उसके बाद सुरक्षाबलों ने रोहिंग्या मुसलमानों के ख़िलाफ़ हिंसक अभियान छेड़ दिया.''

एचआरडबल्यु की रिपोर्ट से पहले एमनेस्टी इंटरनेश्नल ने भी अपनी रिपोर्ट में रखाइन में रोहिंग्या मुसलमानों के ख़िलाफ़ हिंसा की बात कही थी. लेकिन बर्मा की सरकार ने उस रिपोर्ट को भी बेबुनियाद और पक्षपातपूर्ण बताते हुए ख़ारिज कर दिया था.

इसी साल जून के महीने में रोहिंग्या मुसलमानों और बौद्धों के बीच हुए सांप्रदायिक दंगों के बाद सरकार ने आपातकाल की घोषणा कर दी थी.

मई के महीने में कथित तौर पर मुसलमानों के ज़रिए एक बौद्ध महिला के बलात्कार और फिर उसकी हत्या के बाद हिंसा की शुरूआत हुई. इसके जवाब में मुसलमानों को ले जा रही एक बस पर हमला हुआ.

उसके बाद से हिंसा में बढ़ोत्तरी होती गई और हज़ारों लोग अपने घरों को छोड़कर भागने पर मजबूर हो गए.

रखाइन प्रांत में बहुसंख्यक बौद्धों और अल्पसंख्यक रोहिंग्या मुसलमानों के बीच तनाव का एक पुराना इतिहास है.

लेकिन इन सबके बीच बर्मा के राष्ट्रपति थीन सीन ने कहा है कि इसका समाधान यही है कि रोहिंग्या मुसलमानों को या तो देश से निकाल दिया जाए या उन्हें शर्णार्थी कैंपों में रखा जाए.

संबंधित समाचार