भारतीय अर्थव्यवस्था के उतार चढ़ाव
 
 
 
 
 
सहकारिता आंदोलन
 
 
 
 
 
 
भारतीय अर्थव्यवस्था के उतार चढ़ाव

भारतीय अर्थव्यवस्था के उतार चढ़ाव

 

सहकारिता आंदोलन

दुनिया का कोई ऐसा देश नहीं है जिसका सहकारिता आंदोलन भारत जितना मज़बूत होगा. भारत में लगभग पाँच लाख सहकारी समितियाँ सक्रिय हैं.

भारत में अनेक क्षेत्रों में सहकारिता आंदोलन चल रहा है लेकिन इनकी कृषि, उर्वरक और दूध उत्पादन में अधिक भागीदारी है.

देश की लगभग 50 फ़ीसदी चीनी उत्पादन में सहकारी समितियों योगदान देती हैं.

दरअसल, विभिन्न पंचवर्षीय योजनाओं में सहकारी समितियों को सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के बीच संतुलन की ज़िम्मेदारी सौंपी गई थी.

सन् 1963 में केंद्रीय आपूर्ति और सहकारिता मंत्रालय ने राष्ट्रीय सहकारिता विकास निगम का गठन किया था ताकि वह सहकारिता आंदोलन को बढ़ा सके.

दूध के क्षेत्र में खेड़ा सहकारी दु्ग्ध उत्पादन संघ (अमूल) की सफलता को देश के अन्य हिस्सों में दोहराने के लिए 1965 में राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड का गठन किया गया. अब मदर डेयरी जैसे संगठन इसका हिस्सा हैं.

अमूल ने तो सफलता के झंडे गाड़ दिए हैं और इसकी 'श्वेत क्रांति' में अहम भूमिका रही है.

बाहर हज़ार से अधिक गाँवों के 26 लाख से अधिक किसानों की सदस्यता वाली इस संस्था ने सहकारिता के क्षेत्र में दुग्ध उत्पाद में इतिहास रचा है.
 
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