आज़ाद भारत:मुख्य पड़ाव
सफ़रनामा
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
आज़ाद भारत के मुख्य पड़ाव

आज़ाद भारत के मुख्य पड़ाव

 

आज़ादी मिलने के बाद के भारत के छह दशकों का सफ़रनामा कई सुखद-दुखद घटनाओं का संयोग रहा है. इन 60 वर्षों में जहाँ भारतीय लोकतंत्र की जड़ें मज़बूत हुईं, वहीं राजनीति में कई तरह की विकृतियाँ भी घर कर गईं.

आज़ादी से पहले और उसके ठीक बाद की स्वच्छ और जनता के लिए समर्पित राजनीति की तुलना अगर अस्सी और नब्बे के दशक की कुछ गतिविधियों जैसे, दल-बदल, विधायी संस्थाओं में रिश्वत लेकर वोट देने और मंत्रियों के भ्रष्टाचार में लिप्त होने के मामलों से की जाए तो कहीं न कहीं ऐसा लगता है कि राजनीति सत्ता केंद्रित हो गई है.

अंग्रेज़ों से 'राजनीतिक' आज़ादी मिले 60 वर्ष बीत गए लेकिन आर्थिक-सामाजिक आज़ादी का बापू का सपना अभी भी अधूरा है. लगभग 25 फ़ीसदी आबादी ग़रीबी रेखा से नीचे गुजर-बसर कर रही है और तमाम क़ानूनों के बावजूद छूआछूत, सर पर मैला ढोने की प्रथा जैसी सामाजिक कुरीतियाँ बदस्तूर कायम हैं.

साथ ही धर्म के नाम पर राजनीति की रोटी सेंकने की कोशिश में देश कई दंगों का दंश झेल चुका है. समाज और सरकार को समरसता और नागरिकों के गरिमापूर्ण जीवन-यापन के नैसर्गिक अधिकार को सुरक्षित रखने के लिए लगातार प्रयास करने की ज़रूरत है.

इन चुनौतियों के बावजूद पिछले साठ वर्षों के दौरान सेना, कूटनीति, तकनीक और आर्थिक क्षेत्र में भारत ने लंबी छलांग लगाई है.

आइए, एक नज़र डालते हैं आज़ादी के बाद के मुख्य पड़ावों पर.

प्रस्तुति: आलोक कुमार
 
^^ पन्ने पर ऊपर जाने के लिए क्लिक करें