बैटिंग और कप्तानी तो ठीक, इस चुनौती का क्या करेंगे कोहली?

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विराट कोहली की कप्तानी में भारतीय टेस्ट टीम इन दिनों विजय रथ पर सवार दिख रही है.

बल्लेबाज़ और कप्तान के तौर पर विराट कोहली का हर दांव सटीक दिख रहा है.

इंग्लैंड के ख़िलाफ़ हाल में संपन्न हुई टेस्ट सिरीज़ में भारत ने इंग्लैंड को 4-0 से हराया और इस सिरीज़ में भारतीय टीम को कुछ नए स्टार भी मिले.

कोहली ने जो दांव चला, ज़ोरदार चला

मसलन, चेन्नई टेस्ट में करुण नायर ने तिहरा शतक बनाकर वो कारनामा कर दिखाया, जो अब तक केवल वीरेंद्र सहवाग के नाम था.

इस सिरीज़ में हरियाणा के युवा क्रिकेटर जयंत यादव ने शानदार डेब्यू करते हुए ऑलराउंड क्षमता दिखाई.

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Image caption आठ साल बाद टेस्ट टीम में लौटे पार्थिव का प्रभावी प्रदर्शन

वहीं आठ साल बाद टीम इंडिया में वापसी करने वाले पार्थिव पटेल ने भी दिखाया कि वे अभी चूके नहीं हैं.

उछाल भरी पिचों पर भारतीय स्पिनरों के सामने लगातार विकेटकीपिंग करने के बाद पार्थिक को जब ओपनिंग बल्लेबाज़ के तौर पर मौका मिला तो उन्होंने दो बार अर्धशतक जमा कर टीम इंडिया को मज़बूती दी.

इन सबको मिलाकर देखें तो ऐसी चुनौती सामने आ रही है जिससे पार पाना विराट कोहली के लिए इतना आसान नहीं होगा.

ये चुनौती है, एक ही जगह के लिए दावेदार खिलाड़ियों के विकल्प का मौजूद होना.

इंग्लैंड के ख़िलाफ़ शानदार प्रदर्शन के बावजूद पार्थिव पटेल अगला टेस्ट खेल पाएंगे, इसका दावा कोई नहीं कर सकता, क्योंकि रिद्धिमान साहा फ़िट होकर उपलब्ध होंगे.

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Image caption करुण नायर ने अपनी तीसरी टेस्ट पारी में तिहरा शतक बना दिया

यही बात करुण नायर के लिए भी कही जा सकती है, क्योंकि टीम इंडिया के मिडिल ऑर्डर में अजिंक्य रहाणे और रोहित शर्मा का विकल्प मौजूद होगा.

यही स्थिति जयंत यादव की है, हार्दिक पांड्या टीम में वापस आए तो उनका क्या होगा.

विराट कोहली की इस मुश्किल पर 21 साल तक फर्स्ट क्लास क्रिकेट में जोरदार प्रदर्शन करने वाले, पर टीम इंडिया की ओर से कभी नहीं खेलने वाले अमोल मजूमदार की अपनी राय है.

वो कहते हैं, "कई साल बाद अच्छी मुसीबत है कप्तान और कोच के सामने. किसको चुनना है, इतने दावेदारों में? भारतीय क्रिकेट का भविष्य तो अच्छा है, लेकिन इसका ख़ामियाजा किसी न किसी खिलाड़ी को उठाना पड़ सकता है."

कोहली: तीन सिरीज़, तीन दोहरे शतक...लगातार

अमोल मजूमदार रणजी ट्रॉफ़ी में सालों तक रन बटोरते रहे लेकिन भारतीय क्रिकेट टीम में कभी नहीं आ पाए.

वैसे दो दशक तक घरेलू क्रिकेट में शानदार प्रदर्शन करने के बावजूद भारतीय टीम की ओर से कभी नहीं खेल पाए स्पिन गेंदबाज़ राजिंदर गोयल का मानना है कि आज जिस तरह से मीडिया क्रिकेट खिलाड़ियों के प्रदर्शन पर रिपोर्टें करता है उसमें किसी के शानदार प्रदर्शन की उपेक्षा संभव नहीं.

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वैसे भारतीय टीम के कप्तान विराट कोहली और कोच अनिल कुंबले के सामने ये संकट केवल बल्लेबाज़ी का नहीं है.

गेंदबाज़ी में भी वही हाल है. आर अश्विन और रविंद्र जडेजा के रहते हुए अमित मिश्रा को कितना मौका मिलेगा, जयंत यादव की जगह कैसे बनेगी, ये समस्या बनी रहेगी.

तेज गेंदबाज़ी में मोहम्मद शमी जब चोट के बाद वापसी करेंगे, तो उमेश यादव की जगह कितनी सुरक्षित रहेगी? भुवनेश्वर कुमार और ईशांत शर्मा कितने मैचों में एक साथ खेलते दिखाई देंगे?

फरवरी महीने में जब भारतीय टीम घरेलू मैदान पर बांग्लादेश के ख़िलाफ़ टेस्ट सिरीज़ खेलने उतरेगी तो देखना दिलचस्प होगा कि विराट कोहली और अनिल कुंबले किस तरह से इस चुनौती का सामना करते हैं.

वैसे उनकी इस समस्या पर क्या कहते हैं घरले क्रिकेट के सबसे कामयाब खिलाड़ी, पढ़िए.

राजिंदर गोयल, बाएं हाथ के लेग स्पिनर-

(रणजी ट्रॉफ़ी में रिकॉर्ड 640 विकेट झटकने के बाद भी गोयल को कभी भारत की ओर से खेलने का मौका नहीं मिला.)

"मेरी किस्मत ही ऐसी थी कि मुझे मौका नहीं मिला. उस वक्त बिशन सिंह बेदी भारतीय क्रिकेट में छाए हुए थे, वे बहुत अच्छे गेंदबाज़ थे.

लेकिन मैं भी अच्छा कर रहा था, मुझे भी चांस दे सकते थे. टीम में एक साथ दो ऑफ़ स्पिनर वेंकटराघवन और प्रसन्ना खेल ही रहे थे. लेकिन मुझे चांस नहीं मिला.

वेस्टइंडीज़ के ख़िलाफ़ 1972-73 में एक टेस्ट में बिशन सिंह बेदी को ड्रॉप करके मुझे टीम में लिया था, लेकिन उस टर्निंग विकेट पर भी मुझे प्लेइंग इलेवन में खेलने का मौका नहीं मिला.

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तो कई बार मैं कहता भी हूं कि मैं ग़लत समय में पैदा हो गया. बैड लक रहा मेरा, और क्या कह सकते हैं.

लेकिन विराट कोहली की मौजूदा टीम की बात दूसरी है. इंग्लैंड के ख़िलाफ़ सिरीज़ में टीम को नए स्टार मिले हैं. जयंत यादव के रूप में अच्छा स्पिनर भी मिला है.

अमित मिश्रा, आर अश्विन और रविंद्र जडेजा जैसे स्पिनर भी हैं. कोई नया स्पिनर भी टीम में जगह बना सकता है क्योंकि आजकल मीडिया बहुत पॉवरफ़ुल हो गया.

किसी खिलाड़ी के लगातार बेहतर प्रदर्शन की चयनकर्ता उपेक्षा नहीं कर सकते.

हमारे समय में ऐसा नहीं था. एक और बात है, अब तरह तरह के टूर्नामेंट भी होते हैं, जो खिलाड़ियों को अपनी प्रतिभा निखारने का मौका देता है."

अमोल मजूमदार, दाएं हाथ के बल्लेबाज़-

(रणजी ट्रॉफ़ी में सबसे ज़्यादा रन बनाने वालों में 9202 रन के साथ दूसरे स्थान पर मौजूद मजूमदार को भारत की ओर से खेलने का मौका नहीं मिला.)

"उस ज़माने में बात अलग थी. राहुल द्रविड़, सचिन तेंदुलकर, वीवीएस लक्ष्मण और सौरव गांगुली जैसे दिग्गज टीम में थे. उन्हें टीम से हटा नहीं सकते थे. लगातार इन लोगों ने एक साथ 125 टेस्ट खेले.

तो आप इससे अंदाज़ा लगा सकते हैं कि दूसरे किसी बल्लेबाज़ के सामने कितनी बड़ी मुश्किल रही होगी. इन चार बल्लेबाज़ों के साथ वीरेंद्र सहवाग को भी जोड़ दीजिए. तो जगह थी ही नहीं.

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Image caption सचिन तेंदुलकर के साथ अमोल मज़ूमदार

एक क्रिकेटर के तौर पर मेरे ख़्याल से किसी क्रिकेटर का करियर अगर 15 साल का है तो तीन चार साल का समय ऐसा होता है, जब वो अपनी पीक पर होता है. उस वक्त अगर उसे मौका मिलता है, तो वह ख़ुद को स्थापित कर सकता है.

इसके बाद दस ग्यारह साल तक कोई क्रिकेटर टीम में जगह बनाए रख सकता है. मेरा जब पीक आया, तब मुझे मौका ही नहीं मिला.

अगर उन तीन चार सालों में स्थापित नहीं हो पाए, तो क्रिकेट में एक नई जेनरेशन आ जाती है. हमारा घरेलू ढांचा भी काफ़ी व्यवस्थित हो गया तो क्रिकेट प्रतिभाएं सामने आती रहती हैं. अंडर-19 से अंडर-23 या फिर रणजी ट्रॉफ़ी से आपको लगातार क्रिकेटर मिलते रहेंगे.

इसलिए मैं तो कहता हूं कि जिस किसी को मौका मिले, उसे कभी छोड़ना नहीं चाहिए."

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