क्या छोटे क़द ने मीराबाई चानू को दिलाया सोने का तमगा?

  • सूर्यांशी पाण्डेय
  • बीबीसी संवाददाता
मीराबाई चानू

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राष्ट्रमंडल खेलों में वेटलिफ़्टिंग में महिलाओं के 48 वर्ग के फ़ाइनल में प्रदर्शन करतीं मीराबाई चानू

5 अप्रैल को सोने का मेडल गले में लटकाए 4 फुट 11 इंच की मीराबाई चानू पोडियम पर खड़ीं थी.

अब तक तो आपको पता भी चल गया है कि 23 साल की चानू ने राष्ट्रमंडल खेलों में भारत को पहला गोल्ड मेडल दिलाया है.

ये भी कि वेटलिफ़्टिंग खेल के महिलाओं के 48 किलो वर्ग में कुल 196 किलो ( स्नैच में 86 और क्लीन एंड जर्क में 110 किलो) का वज़न उठाया.

लेकिन ऐसे बड़े-बड़े कारनामे कर दिखाने वाली चानू के क़द पर गौर किया?

दरअसल जीत के बाद बीबीसी से ख़ास बातचीत के दौरान मीराबाई चानू ने एक ऐसी बात कही जिसने हमे उनके क़द पर गौर करने को मजबूर कर दिया.

बीबीसी संवाददाता रेहान फ़जल ने जब मीराबाई चानू से पूछा कि 'आप क़द में इतनी छोटी हैं तो खेल में आपको दिक़्कत नहीं होती?'

जिसके जवाब में उन्होंने कहा कि छोटे क़द का तो उन्हे अपने खेल में नुकसान नहीं बल्कि फ़ायदा मिलता है.

अमूमन जितने भी खेल होते हैं उसमें खिलाड़ी का बड़ा क़द उसको खेल में आगे बढ़ने में काफ़ी मदद करता है लेकिन वेटलिफ़्टिंग में इसका उल्टा है.

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1988 सियोल ओलंपिक में वेटलिफ़्टिंग के पुरुष वर्ग के 60 किलो स्पर्धा में भाग लेते नईम सुलेमानोग्लू (स्नैच प्रतियोगिता)

जो जितना छोटा, इस खेल में उतना ऊंचा!

जब वेटलिफ़्टिंग के खेल में छोटे क़द और ऊंचे पद की बात होती है तो तुर्की में राष्ट्रीय हीरो का दर्जा प्राप्त वेटलिफ़्टर स्वर्गीय नईम सुलेमानोग्लू का ज़िक्र ज़रूर होता है.

नब्बे के दशक में वेटलिफ़्टिंग के खेल में सबसे लोकप्रिय रहे नईम सुलेमानोग्लू का क़द केवल 4 फुट, 10 इंच था. लेकिन क्लीन एंड जर्क की प्रतिस्पर्धा में एकमात्र ऐसे खिलाड़ी थे जिन्होंने अपने वज़न से 3 गुना अधिक भार उठाया था.

उन्होंने 1988, 1992 और 1996 में आयोजित हुए ओलंपिक के खेलों में लगातार 3 गोल्ड मेडल जीते थे.

वह अपने क़द और अच्छे प्रदर्शन के कारण लोगों में 'द पॉकेट हरक्यूलिस' के नाम से प्रसिद्ध थे. 18 नवंबर 2017 में उनका देहांत हो गया था.

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1988 के सियोल ओलंपिक खेलों में नईम सुलेमानोग्लू स्वर्ण पदक के साथ

छोटे क़द के फ़ायदे

अब ज़रा मीराबाई चानू पर वापस आते हैं और आपको समझाते हैं कि आखिर ये क़द का चक्कर है क्या?

मीराबाई चानू के कोच, विजय शर्मा ने बीबीसी से बातचीत के दौरान इसके पीछे के विज्ञान को समझाया.

उनके मुताबिक़, छोटा क़द होने से इस खेल में मूल रूप से दो फ़ायदे होते हैं :

1. छोटे क़द के खिलाड़ी को भार उठाते समय गुरुत्वाकर्षण बल कम महसूस होता है.

सरल भाषा में कहें तो वज़न को उठाने की प्रक्रिया में धरती के विरुद्ध लगने वाला बल कम लगाना पड़ता है.

2. इस खेल में बॉडी वेट को संतुलित रखना सबसे ज़्यादा ज़रूरी है. छोटे क़द के खिलाड़ी को बॉडी वेट संतुलित करने में ख़ासा परेशानी नहीं होती

इसके अलावा वरिष्ठ खेल पत्रकार राजेश राय का कहना है कि मांसपेशियों में इस खेल से खींचतान ज़्यादा होती है और वज़न उठाते समय मांसपेशियों का फटना सबसे ज़्यादा आम है. ऐसे में बड़े क़द के खिलाड़ी छोटे क़द के खिलाड़ी की अपेक्षा इस समस्या से ज़्यादा जूझते है.

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स्वर्ण पदक के साथ भारत की स्वर्ण परी मीराबाई चानू

मीराबाई चानू ने जीत के बाद और क्या कहा...

तो अब आपको समझ आया कि क्यों मीराबाई चानू छोटा पैकेट बड़ा धमाका हैं.

उनके कौशल और प्रतिभा को जितना उनके कोच ने ट्रेनिंग के द्वारा निखारा है उतना ही साथ उनको अपनी प्राकृतिक बनावट से भी मिला है.

रेहान फ़जल से बात करते दौरान उन्होंने इस बात का ज़िक्र भी किया कि वो इस जीत के बाद और प्रोत्साहित हैं और भविष्य में होने वाले एशियन गेम्स में कुल 200 किलो से ज़्यादा वज़न उठाकर दिखाएंगी.

यही नहीं उन्होंने 2020 टोक्यो ओलंपिक में गोल्ड मेडल जीतने की भी मंशा जताई.

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राष्ट्रमंडल खेलों के पहले दिन वेटलिफ़्टिंग में महिलाओं के 48 किलो वर्ग की प्रतियोगिता के निर्णय के बाद की तस्वीर

क्या है मीराबाई चानू की निजी पसंद

राष्ट्रमंडल खेल और इस जीत से आगे बढ़ते हुए जब उनसे ये पूछा गया कि उनको किस तरह का खाना पसंद है, किस तरह का संगीत वह सुनती हैं, तो इन प्रश्नों का एक मासूम सी मुस्कान के साथ उन्होंने उत्तर दिया.

उन्होंने बताया कि मणिपुर में उनके गांव में एक चटनी मिलती है- इरोम्बा, जो उन्हे बेहद पसंद है.

खाने के साथ-साथ गाना सुनना पसंद करती हैं मीराबाई चानू. नेहा कक्कड़ की आवाज़ की दीवानी हैं.

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