राष्ट्रमंडल खेल 2018 डायरी: भारतीय टीम अंतिम सेकंड में क्यों गोल खा जाती है?

  • 8 अप्रैल 2018
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गोल्डकोस्ट हाकी सेंटर पर जब भारत पाकिस्तान मैच शुरू हुआ तो लगा कि मैच ऑस्ट्रेलिया में नहीं बल्कि जालंधर या दिल्ली में खेला जा रहा हो. पूरा स्टेडियम सिर्फ़ भारतीय दर्शकों से भरा हुआ था. सारे नारे हिंदी में लग रहे थे- 'चक दे इंडिया' और 'जीतेगा भाई जीतेगा, इंडिया जीतेगा' से पूरा स्टेडियम गूंज रहा था.

ऑस्ट्रेलिया के दूर-दूर के इलाक़ों से ये मैच देखने भारतीय लोग आए थे. एक साहब विक्रम चड्ढ़ा तो ख़ासतौर से तस्मानिया से ये मैच देखने पहुंचे थे.

और तो और कड़ी सुरक्षा के बीच कुछ भारतीय स्टेडियम के अंदर ढोल तक घुसा पाने में सफल हो गए थे. जब भी भारतीय खिलाड़ी पाकिस्तानी 'डी' की तरफ़ बढ़ते ज़ोर ज़ोर से ढोल बजने लगते.

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पूरा स्टेडियम भारतीय झंडों से भरा पड़ा था. मुझे वहाँ एक भी पाकिस्तानी झंडा नहीं दिखाई दिया, हांलाकि गोल्डकोस्ट में बहुत से पाकिस्तानी रहते हैं. स्टेडियम के बाहर ऐसे कई भारतीय मिले जो टिकट न मिलने से मायूस थे, लेकिन तब भी वो इस उम्मीद से स्टेडियम पहुंचे हुए थे कि शायद कहीं से एक टिकट का जुगाड़ हो जाए.

शुरू के दो क्वॉर्टर्स में जिस तरह भारत ने पाकिस्तान पर दबदबा बना कर 2-0 की लीड ली तो लगा कि भारत टेनिस स्कोर से जीतने जा रहा है.

लेकिन तीसरे क्वार्टर में पाकिस्तान ने शानदार वापसी की और भारतीय खिलाड़ी सिर्फ़ लीड बरकरार रखने के लिए खेलने लगे. तीसरे और चौथे क्वार्टर में पाकिस्तान इस कदर हावी था कि भारतीय खिलाड़ी सिर्फ़ दो बार ही पाकिस्तानी डी के अंदर जा सके.

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एक दिलचस्प चीज़ ये दिखाई दी कि मैच के दौरान दोनों देशों के खिलाड़ी चुप नहीं रहते, बल्कि अपने साथियों से चिल्ला चिल्ला कर बातें करते रहते हैं. ख़ास कर भारतीय गोलकीपर श्रीजेश तो गोल पोस्ट से ही चीख़ चीख़ कर अपने साथियों को निर्देश देते हैं.

जैसे ही खेल शुरू हुआ मेरे बग़ल में बैठी हुई एएफ़पी की पत्रकार सेलाइन ट्रंप ने मुझसे कहा मैच के फ़ैसले के बारे में तो कोई संदेह नहीं है. यह बताइए कि भारत की जीत कितने गोलों से होगी? मैंने कहा 2-0. सेलाइन ने कहा 3-1. बहरहाल हम दोनों में से कोई सही नहीं निकला और पाकिस्तान ने 2-2 से मैच बराबर कर लिया.

आख़िरी सेकंड में जब हूटर बजा तो भारतीय टीम 2-1 से आगे थी, लेकिन तभी पाकिस्तानी टीम ने 'रेफ़रल' लिया जो उनके पक्ष में गया. पाकिस्तान के अली मुबश्शर ने गोल करने में कोई ग़लती नहीं की. मैंने मैच के बाद भारतीय कप्तान से पूछा कि भारतीय टीम अंतिम सेकंड में क्यों गोल खा जाती है?

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उन्होंने कहा कि नहीं ऐसी बात नहीं हैं. आप मुझे उदाहरण दीजिए कि पिछले छह महीनों में हमने आख़िरी सेकंडों में कोई गोल खाया है. और अगर खाया भी है तो आख़िरी सेकंडों में हमने गोल भी किए हैं. ये मैच ड्रॉ ज़रूर रहा, लेकिन 0-2 से पिछड़ने के बाद जिस तरह से पाकिस्तान ने अपने से कहीं तगड़ी टीम के ख़िलाफ़ मैच बराबर किया, नैतिक जीत उन्हीं की रही.

भारतीय कोच बने पाकिस्तानी हॉकी टीम का कोच

जब मैं करारा हॉकी सेंटर में घुस रहा था तो देखा एक जाना पहचाना सा चेहरा पाकिस्तान की हॉकी टीम को अभ्यास करा रहा है. दिमाग़ पर ज़ोर देने पर याद आया कि ये तो हॉलैंड के रोएलांट ओल्टमांस हैं जो कुछ महीनों पहले तक भारतीय हॉकी टीम के कोच हुआ करते थे.

मैच के बाद मैंने उनसे पूछा कि आपको तो भारतीय खिलाड़ियों के प्लस और माइनस पॉइंट्स के बारे में सब कुछ पता होगा.

शायद इसी वजह से पाकिस्तान की टीम ने हारा हुआ मैच ड्रॉ करा लिया? ओल्टमांस मुस्करा कर बोले ये सही हो सकता है, लेकिन इससे मैच के परिणाम पर असर नहीं पड़ता, क्योंकि भारतीय टीम को भी पता है कि मैं किस तरह से सोचता हूँ.

उनके पास ज़रूर इसकी काट होगी. दिलचस्प बात ये है कि ओल्टमांस भारत का कोच बनने से पहले भी पाकिस्तान के कोच हुआ करते थे.

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जब बस ड्राइवर प्रतियोगियों को उनके गंतव्य स्थान से 98 किलोमीटर दूर ले गया

ये मत समझिए कि इस तरह की ग़लती भारत में ही हो सकती है. ऑस्ट्रेलिया जैसा विकसित देश भी इसका अपवाद नहीं है. ग्रेनेडा की महिला बीच वॉलीबॉल टीम का मैच कूलंगाता बीच पर स्कॉटलैंड के साथ होना था. लेकिन उनकी बस का ड्राइवर उन्हें वहाँ से 98 किलोमीटर दूर मियर्स वेलोड्रोम ले गया.

ये ग़लती इसलिए हुई क्योंकि ड्राइवर वो 'सैट नेविगेंटिंग डिवाइस' इस्तेमाल कर रहा था जिसे राष्ट्रमंडल खेलों के प्रबंधकों ने मंज़ूरी नहीं दी थी. जब इस ग़लती का पता चला तो ग्रेनेडा की टीम को आनन-फानन में पुलिस की निगरानी में उनके असली गंतव्य स्थान पर भेजा गया.

इसका नतीजा ये हुआ कि ग्रेनेडा की टीम 12 बज कर 45 मिनट पर होने वाले अपने अपने मैच के लिए देर से पहुंची. वो ये मैच सीदे सेटों में स्कॉटलैंड से हार गईं. बाद में उन्होंने कहा कि उनका हार का कारण था, 'वॉर्म अप' के लिए पर्याप्त समय न मिल पाना.

राष्ट्रमंडल खेलों की यातायात व्यवस्था पर कई शिकायतें मिल रही हैं. उद्घाटन समारोह के दिन भी ख़राब बस व्यवस्था के कारण हज़ारों दर्शक करारा स्टेडियम में रात दो बजे तक फंसे रह गए थे.

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