'पिस्टल किंग' जीतू राय कभी नेपाल में बकरियां चराते थे

  • 9 अप्रैल 2018
जीतू राय, कॉमनवेल्थ गेम्स 2018, गोल्ड कोस्ट 2018, राष्ट्रमंडल खेल 2018 इमेज कॉपीरइट Getty Images
Image caption जीतू राय

भारतीय निशानेबाज़ जीतू राय ने ऑस्ट्रेलिया के गोल्ड कोस्ट में 10 मीटर एयर पिस्टल स्पर्धा में नए गेम्स रिकॉर्ड के साथ गोल्ड मेडल पर निशाना साधा है.

जीतू ने 235.1 अंकों के साथ पहला स्थान हासिल किया और भारत को स्वर्ण पदक दिलाया.

भारत के ही ओम मिठरवाल ने 214.3 अंकों के साथ कांस्य पदक जीता. इस स्पर्धा का रजत पदक ऑस्ट्रेलिया के कैरी बेल ने जीता.

जीतू राय की कहानी

जिस जीतू राय को आज दुनिया पिस्टल किंग कहती है, जिन हाथों ने निशानेबाज़ी में बड़े-बड़े मेडल जीते हैं, 12 साल पहले तक वो हाथ नेपाल में एक छोटे से गाँव में मक्के और आलू की फ़सल बोते थे.

जीतू का शूटिंग से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं था. घर के पास तबेले में भैंस और बकरियों के साथ उनका वक़्त बीतता था.

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भारतीय सेना ने चमकाई जीतू की किस्मत

नेपाल के संखुवासभा गाँव में जन्मे जीतू के पिता भारतीय फ़ौज में थे जिन्होंने चीन और पाकिस्तान के ख़िलाफ़ जंग में हिस्सा लिया था.

20 की उम्र में जीतू भी भारतीय सेना में भर्ती हुए, या कहें कि किस्मत उन्हें यहाँ ले लाई.

जन्म से नेपाली जीतू ब्रितानी फ़ौज में भर्ती होना चाहते थे.

दरअसल, बरसों से रियावत रही है कि गोरखा रेजीमेंट के लिए ब्रितानी फ़ौज भर्ती के लिए हर साल नेपाल आती है.

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ब्रिटिश आर्मी में जाना चाहते थे जीतू

बात 2006-07 की है. जब जीतू ब्रितानी फ़ौज में भर्ती होने के लिए गए तो वहाँ भारतीय सेना के कैंप में पंजीकरण चालू था जबकि ब्रितानी फ़ौज के रजिस्ट्रेशन में अभी समय था.

लगे हाथ जीतू ने भारतीय सेना में अर्जी दे दी और इससे पहले कि ब्रितानी फ़ौज में बात आगे बढ़ती भारतीय फ़ौज में जीतू का चयन हो गया.

एक संधि के तहत गोरखा रेजिमेंट में गोरखा सैनिक भारतीय सेना में भर्ती किए जाते हैं.

लेकिन लखनऊ में सैन्य अड्डे पर रहते हुए जीतू को शूटिंग कतई पंसद नहीं थी हालांकि उनका निशाना अच्छा था.

ये देख उनके सैन्य अफ़सरों ने जीतू को मऊ के आर्मी मार्कमेन यूनिट में भेजा. लेकिन लगातार दो साल नायब सूबेदार जीतू राय को फेल कर वापस भेज दिया गया.

यहीं से जीतू की कहानी में ट्विस्ट आया. उन्होंने निशानेबाज़ी में कड़ी मेहनत करनी शुरू की.

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शुरू हुआ जीतू का अंतरराष्ट्रीय सफ़र

भारतीय सेना में रहते हुए 2013 में जीतू अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने लगे और एक साल के अंदर अंदर वो दुनिया भर में छा गए.

लखनऊ को अपना बेस बनाने वाले जीतू ने 2014 में कॉमनवेल्थ गेम्स में 50 मीटर पिस्टल वर्ग में गोल्ड मेडल जीता. 2014 के एशियन गेम्स में भी भारत को पहला गोल्ड जीतू ने ही दिलाया था.

2014 में ही जीतू ने शूटिंग में नौ दिन के अंदर तीन वर्ल्ड कप मेडल जीतकर रिकॉर्ड बना दिया था. जिसमें 10 मीटर एयर पिस्टल में गोल्ड और 50 मीटर एयर पिस्टल में रजत शामिल है.

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ओलंपिक पदक जीतू का सपना

लेकिन सब कुछ हमेशा आसान नहीं था. 2016 में ओलंपिक में पदक न जीत पाना उनके करियर का लो पॉइंट रहा क्योंकि ओलंपिक में मेडल जीतना जीतू का सपना था.

लेकिन जीतू ने 2018 में अच्छी वापसी की है. इस साल मेक्सिको में हुए वर्ल्ड कप में जीतू ने कांस्य जीता है.

वैसे कई सालों तक तो जीतू के घरवालों को पता भी नहीं था कि उनका बेटा दुनिया भर में मेडल जीत रहा है.

जब जीतू को अर्जुन पुरस्कार मिला और माँ दिल्ली आई तो उन्हें एहसास हुआ कि जीतू कितना बड़ा खिलाड़ी बन गया है.

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गांव में पैदल ही जाना पड़ता है जीतू को

कभी-कभार जब जीतू अपने घर जाते थे तो अपने गाँव पहुँचने के लिए जीतू को कई दिन का वक़्त लग जाता था.

पहले दार्जिलिंग में बागडोगरा तक वे ट्रेन से जाते. गाँव तक पहुँचने के लिए करीब दो दिन तक का वक़्त लगता है. लेकिन अब जीतू फ्लाइट लेकर पहुँच जाते हैं हालांकि गाँव में अब भी चलकर जाना पड़ता है.

कोई चार साल पहले ही उनके गाँव में बिजली आई है. इससे पहले गाँव में रोशनी किसी ने नहीं देखी थी, लेकिन हाँ गाँव के बेटे ने ज़रूर दुनिया भर में उनका नाम रोशन किया है.

शूटिंग से परे जीतू आज भी बचपन की तरह वॉलीबॉल खेलना पसंद है और साथ ही पसंद है आमिर ख़ान की फ़िल्में.

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