जब फ़ाइनल में भिड़ीं सायना नेहवाल और पीवी सिंधु

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कॉमनवेल्थ खेलों के इतिहास में ऐसा पहली बार था कि बैडमिंटन का फ़ाइनल मुकाबला सायना नेहवाल और पीवी सिंधु- दो भारतीय महिलाओं के बीच हुआ. ये किसी सुपर संडे से कम नहीं रहा.

गोल्ड कोस्ट कॉमनवेल्थ खेलों के 11वें दिन भारत की सायना नेहवाल ने बैडमिंटन का गोल्ड मेडल जीत लिया. उन्होंने फ़ाइनल मुक़ाबले में पीवी सिंधु को हराया.

एक ही कोच से शुरुआत करने वाली सायना और सिंधु, गोपीचंद अकादमी में कोर्ट पर एक दूसरे के साथ ट्रेनिंग करने वाली सायना और सिंधु का सफ़र कई मायनों में एक जैसा और कई मायनों में अलग रहा है.

28 साल की सायना और 22 साल की पीवी सिंधु कई बार भिड़ चुकी हैं और इससे पहले तक चार मुकाबलों में सायना ही 3-1 से भारी पड़ी थीं. अब ये आंकड़ा 4-1 का हो गया है.

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आमने- सामने

2018 - गोल्ड कोस्ट कॉमनवेल्थ गेम्स, सायना की जीत

2018 - इंडोनेशिया मास्टर्स,सायना ने सिंधु को हराया

2017- नेशनल चैंपियनशिप में सायना ने बाज़ी मारी

2017 - इंडिया ओपन में सिंधु ने मात दी

2014- इंडिया ग्रां प्री में सायना जीती

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साना का सफ़र

17 मार्च 1990 को जन्मी सायना पहली बार तब सुर्खियों में आई जब 2003 में उन्होंने चेक ओपन में जूनियर टाइटल जीता.

15 साल के उम्र में जब उन्होंने 9 बार की चैंपियन अपर्णा पोपट को हराया तो लोगों को लगा कि ये कौन नई खिलाड़ी है. फिर 2006 में साइना अंडर-19 चैंपियन बनीं.

यहाँ से उन्होंने जो उड़ान ली वो अब तक जारी है हालांकि बहुत से उतार-चढ़ाव इस सफ़र में आए.

सायना के नाम कई फ़र्स्ट दर्ज हैं. बैडमिंटन में ओलंपिक पदक जीतने वाली वो पहली भारतीय बनीं.

साल 2015 में बैडमिंटन में दुनिया की नंबर वन रैंकिंग हासिल करने वाली वो पहली भारतीय महिला खिलाड़ी रहीं.

सुपरसीरिज़ जीतने वाली वो पहली भारतीय महिला खिलाड़ी भी बनीं.

2010 में दिल्ली के सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम में देखा कॉमनवेल्थ का वो फ़ाइनल मैच मुझे आज भी याद है.

कॉमनवेल्थ गेम्स का वो आख़िरी दिन था और भारत 99 मेडल जीत चुका था.

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100वां मेडल दिलाने और गोल्ड जीतने का दवाब सायना पर था. ज़बरदस्त मैच में सायना ने 19-21, 23-21, 21-13 से फ़ाइनल जीता था.

फिर 2012 में लंदन में ओलपिंक पदक जीता और 10 सुपर सीरिज़ अपने नाम की. तकनीकी रूप से दक्ष और मानसिक रूप से मज़बूत- ये सायना की ख़ूबियाँ रही हैं.

ये उनका जलवा ही था कि 2012 में किसी ग़ैर क्रिकेटर खिलाड़ी के साथ किसी कंपनी ने करीब 74 लाख डॉलर की बड़ी मार्केटिंग डील साइन की.

लेकिन कई बार बड़े मैचों में मिली हार के बाद उनकी क्षमता पर सवाल भी उठे और वो अपने कोच गोपीचंद से अलग हो गईं.

2016 में रियो ओलंपिक में सायना को गंभीर चोट लगी. ये उनके लिए बड़ा झटका था.

इसके बाद से उन्होंने धीमी लेकिन अच्छी वापसी की है और साथ ही वापसी हुई है गुरु-शिष्य की पुरानी जोड़ी की. कॉमनवेल्थ मेडल उनकी उपलब्धियों में एक और इज़ाफ़ा है.

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सिंधु का सफ़र

5 जुलाई 1995 को तेलंगाना में जन्मी 22 साल की पीवी सिंधु का सितारा इन दिनों काफ़ी बुलंद चल रहा है और विश्व रैंकिंग में वो तीसरे नंबर पर है.

सायना नेहवाल की तरह सिंधु को तराशने और संवारने का काम भी उनके कोच गोपीचंद ने किया है .

सायना की ही तरह कम उम्र से ही सिंधु की जीत का सिलसिला शुरु हो गया था- अंडर 10, अंडर 13 जैसे मुकाबले वो लगातार जीतने लगी.

2013 और 2014 में उन्होंने लगातार दो साल वर्ल्ड चैंपियनशिप मेडल जीते. बैडमिंडन में किसी भारतीय महिला ने ऐसा पहली बार किया था.

ये वो समय था जब सायना नेहवाल भी टॉप फॉर्म में चल रही थीं और दोनों के बीच कॉम्पीटीशन शुरु हो चुका था.

2016 के ओलंपिक में सिंधु फ़ाइनल में पहुँचने वाली पहली भारतीय महिला बनीं. फ़ाइनल में वो हार ज़रूर गईं लेकिन रजत पदक जीतना उनके लिए बड़ी उपलब्धि थी.

जबकि सायना चोट लगने के बाद ओलपिंक से बाहर हो गई थीं.

करीब 5 फुट 11 इंच लम्बी पीवी सिंधु के पिता पीवी रमन्ना और मां पी विजया वॉलीबाल खिलाड़ी रह चुके है.

पूर्व एशियन चैंपियन दिनेश खन्ना ने बीबीसी से बातचीत एक बार कहा था कि सिंधु हमेशा बड़े खिलाड़ियों के लिए ख़तरा पैदा करती है लेकिन जैसे ही उनका सामना कम रैंकिंग या कमज़ोर खिलाड़ी से होता है उनका खेल भी कमज़ोर पड जाता है.

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सिंधु बनाम साना

फ़िलहाल साइना और सिंधु दोनों एक ही गुरु गोपीचंद की शिष्य हैं, एक ही जगह ट्रेनिंग लेती हैं और ऐसी ही फॉर्म चलती रही तो उनका सामना दोबारा भी हो सकता है.

महिला बैडमिंटन में एक तरह की क्रांति की जो शुरुआत सायना ने की है सिंधु उसी को आगे बढ़ा रही हैं.

अंग्रेज़ी में एक कहावत है 'मोर द मेरियर' यानी जितना ज़्यादा हो उतना अच्छा है..और भारत के लिए ये प्रतिदंद्विता अच्छी ख़बर है.

22 साल की सिंधु का सपना है कि जो गोल्ड वो रियो ओलंपिक में न जीत सकीं वो टोक्यो ओलंपिक में जीतें.

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