राष्ट्रमंडल में चमके निशानेबाज़ों का वर्ल्ड कप में फ्लॉप शो

  • 30 अप्रैल 2018
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कोरिया के चागवोन शहर में रविवार को आईएसएसएफ] वर्ल्ड कप समाप्त हुआ. निशानेबाज़ी के इस वर्ल्ड कप में राइफल, पिस्टल और शॉटगन के मुक़ाबले हुए.

भारत के निशानेबाज़ी दल में मनु भाकर जैसी युवा निशानेबाज़ थी तो अनुभवी हिना सिद्धू , मानवजीत सिंह, तेजस्विनी सावंत, संजीव राजपूत और सीमा तोमर शामिल थीं.

इसी महीने ऑस्ट्रेलिया के गोल्ड कोस्ट शहर में समाप्त हुए राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान यह सभी नाम लगातार चर्चा में थे.

कुछ अपनी कामयाबी से और कुछ अपनी नाकामी से.

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Image caption हिना सिद्धू

राष्ट्रमंडल में लगाए थे पदकों पर निशाने

राष्ट्रमंडल खेलों में भारतीय निशानेबाज़ों ने सात स्वर्ण, चार रजत और पांच कांस्य पदक सहित कुल 16 पदक जीते. यह भारत के जीते गए 66 पदकों में किसी भी खेल का सर्वाधिक योगदान था.

लेकिन विश्व कप में भारतीय निशानेबाज़ केवल एक रजत पदक ही जीत सके. यह रजत पदक शहज़ार रिज़वी ने पुरुषों की 10 मीटर एयर पिस्टल स्पर्धा में जीता.

भारत इस पदक की बदौलत पदक तालिका में 12वें स्थान पर रहा.

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चीन, रूस और अमरीका की चुनौती पड़ी भारी

चार स्वर्ण समेत सात पदकों के साथ चीन पहले स्थान पर रहा. तीन स्वर्ण पदकों के साथ पांच मेडल जीतकर रूस दूसरे और तीन पदकों (दो स्वर्ण) के साथ अमरीका तीसरे पायदान पर रहा.

भारतीय खिलाड़ियों में सबसे निराशाजनक प्रदर्शन जीतू राय और ओम प्रकाश मिथरवाल का रहा जो फाइनल के लिए क्वालिफाई तक नहीं कर सके. वहीं शहज़ार रिज़वी की कहानी बिलकुल अलग है.

राष्ट्रमंडल खेलों में जगह बनाने में नाकाम रहने के बाद नैशनल राइफल एसोसिएशन ने उन्हें चार विश्व कप खेलने की मंजूरी दे दी.

इसके बाद उन्होंने पहले विश्व कप में विश्व रिकार्ड के साथ स्वर्ण पदक जीता. और अब दूसरे विश्व कप में रजत पदक जीतकर उन्होंने भविष्य की उम्मीद जगाई है.

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मनु भाकर बेहतर करने के बावजूद नहीं जीत सकीं

दूसरी ओर युवा मनु भाकर ने 10 मीटर एयर पिस्टल मिश्रित टीम स्पर्धा में ओम प्रकाश मिथरवाल के साथ क्वालिफिकेशन राउंड में 778 अंकों के साथ विश्व रिकार्ड भी बनाया लेकिन इसके बावजूद वह चौथे स्थान पर रहे.

मनु भाकर ने राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक जीता था, और इससे पहले वह विश्व कप में भी स्वर्ण पदक जीत चुकी हैं.

राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक जीतने वाली तेजस्विनी सावंत 50 मीटर राइफल थ्री पोजीशन में फाइनल के लिए क्वालिफाई ही नहीं कर सकीं.

गोल्ड कोस्ट में गोल्ड मेडल जीतने वाले संजीव राजपूत भी 50 मीटर राइफल थ्री पोजीशन में फाइनल में जगह बनाने के बावजूद आठवें स्थान पर रहे.

तो क्या अब यह माना जाए कि राष्ट्रमंडल खेलों में चमकने वाले सितारों का कोरिया में हुए विश्व कप में फ्लॉप शो रहा और क्या अब बदले हुए नियम भारतीय खिलाड़ियों को रास नहीं आ रहे हैं.

दरअसल अब फाइनल में दोबारा से अंक मिलते हैं. जबकि पहले पुराने अंक भी मायने रखते थे. और सबसे बड़ा सवाल कि क्या अब अनुभवी निशानेबाज़ों का समय बीत चुका है और भविष्य मनु भाकर जैसे युवा निशानेबाज़ों का है.

विश्व कप की तुलना राष्ट्रमंडल खेलों से नहीं

पूर्व निशानेबाज़ और राजीव गांधी खेल रत्न से सम्मानित हो चुकीं अंजलि भागवत पिछले दिनों राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान बतौर एक्सपर्ट एक खेल चैनल पर थीं.

बीबीसी ने उनसे यही सवाल पूछा तो अंजलि भागवत ने कहा कि यह भारतीय निशानेबाज़ों का फ्लॉप शो नहीं था क्योंकि विश्व कप में सारी दुनिया के निशानेबाज़ थे. जबकि राष्ट्रमंडल खेलों में ऐसा नहीं था.

विश्व कप में चीन, जर्मनी, अमरीका, रूस, इटली और कोरिया के रहते भारत हर बार पदक की उम्मीद नहीं कर सकता.

अंजलि मानती हैं कि मनु भाकर, हिना सिद्धू, तेजस्विनी सावंत बहुत कम अंतर से फाइनल में जगह बनाने से चूक गईं. कुछ खिलाड़ी फाइनल में भी पहुंचे.

दरअसल विश्व चैंपियनशिप से पहले चार विश्व कप होते हैं, और अंजलि कहती हैं कि स्कोर की नज़र से भारतीय खिलाड़ियों के प्रदर्शन को कम नहीं आंका जा सकता.

अंजलि शहज़ार रिज़वी से निशानों से बेहद खुश हैं. उनका मानना है कि शुरुआत में ही पहले विश्व कप में स्वर्ण और दूसरे में रजत पदक मिलना बेहद शानदार है.

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Image caption मनु भाकर

सभी देशों के अव्वल खिलाड़ी आते हैं विश्व कप में

विश्व कप में दमदार चुनौती की वजह अंजलि को सभी देशों की 'ए' टीम का आना मानती हैं.

उन्हें उम्मीद है कि अगले विश्व कप और विश्व चैंपियनशिप से भारत के कुछ खिलाड़ियों को ओलंपिक का कोटा मिल सकता है. वो कहती हैं कि पदक का मिलना उस दिन खिलाड़ी के प्रदर्शन पर निर्भर करता है.

नए नियमों को लेकर अंजलि भागवत ने कहा, "अब क्वालिफिकेशन राउंड में विश्व रिकॉर्ड का कोई महत्व नहीं है. फाइनल में ज़ीरो पोइंट से सब कुछ शुरू होता है. शायद इसलिए अब कोई भी निशानेबाज़ लम्बे समय तक नम्बर एक भी नहीं रह सकता."

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नए नियम बने नई बाधा

वो कहती हैं, "महज़ एक या दो पॉइंट से कोई भी खिलाड़ी चार-पांच पायदान नीचे खिसक सकता है."

वैसे अंजलि इस बात से सहमत हैं कि अब आने वाला समय मनु भाकर जैसे युवा निशानेबाज़ों का है.

इसकी सबसे बड़ी वजह वो नए नियम और बढ़ते दबाव और निशानेबाज़ी के दौरान तेज़ी से बदलते स्कोर को मानती है.

वो कहती हैं, "तेज़ नज़र, सटीक निशाना वह भी कम समय में आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है. वहीं पुराने निशानेबाज़ों को पुराने नियमों की आदत पड़ चुकी है. ऐसे में अब तेज़ रफ्तार से नए नियमों के तहत निशाने लगाना मुश्किल लग रहा है. यहां तक कि जूनियर निशानेबाज़ भी सीनियर निशानेबाज़ों से बहुत बेहतर कर रहे हैं."

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Image caption अंजलि भागवत

अनुभव सही पर समय युवाओं का

इसके बावजूद अंजलि भागवत अनुभव को भी कम नहीं आंकती. उनका मानना है कि हिना सिद्धू ने अपने अनुभव के दम पर ही राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक जीता.

अब देखना है कि राष्ट्रमंडल खेलों की कामयाबी की खुमारी और दूसरे विश्व कप की नाकामी से निकलकर भारतीय निशानेबाज़ आगामी एशियाई खेलों के लिए अपनी तैयारी पर कितना ध्यान देते हैं.

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