कर्नाटक का वो चंद्रा जिनके सामने डगमगाते थे रिचर्ड्स के पांव

  • 17 मई 2018
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हर तरफ़ कर्नाटक की चर्चा है. राजनीतिक घमासान के बीच बीएस येदियुरप्पा ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली है.

ऐसे माहौल में मैसूर में जन्मे बीएस चंद्रशेखर की बात कहीं से मेल नहीं खाती लेकिन इसी दिन अपना 73वां जन्मदिन मना रहे चंद्रशेखर की कहानी है बड़ी दिलचस्प.

बीएस चंद्रशेखर के योगदान को भारतीय क्रिकेट कभी नहीं भूल सकता. वे उस स्पिन चौकड़ी के सबसे मारक गेंदबाज़ थे, जिसके बूते टाइगर पटौदी ने भारत की औसत क्रिकेट टीम को मज़बूत और आक्रामक टीम में बदल डाला था.

इस चौकड़ी के हर गेंदबाज़ की अपनी खासियत थी, चाहे वो बिशन सिंह बेदी हों, या फिर इरापल्ली प्रसन्ना या फिर भागवत चंद्रशेखर हों या फिर वेंकटराघवन रहे हो. लेकिन इन चारों में सबसे मारक रिकॉर्ड चंद्रशेखर का ही रहा.

महज 58 टेस्ट मैचों में चंद्रशेखर ने 242 विकेट चटकाए थे, विकेट झटकने के स्ट्राइक रेट में वे बेदी से भी बेहतर साबित हुए थे. चंद्रा ने 16 बार पारी में पांच या उससे ज़्यादा विकेट चटकाए जबकि दो बार मैच में उन्होंने दस या उससे ज्यादा विकेट लिए.

ये तब था जब छह साल की उम्र में उनका दायां हाथ पोलियो की चपेट में आ गया था, वो हाथ इतना कमज़ोर हो चुका था कि कई बार चंद्रशेखर को उन्हें अपने बाएं हाथ से उसे पकड़कर सहारा देना होता था.

पोलियो की चपेट में आ गए थे

लेकिन उन्होंने अपनी इस मुश्किल को सबसे बड़ा हथियार बना डाला. एक पोलियो एवयरनेस से जुड़े एक वीडियो में चंद्रशेखर ने बताया है, "मैं अपना दायां हाथ उठा नहीं पाता हूं आज भी, बहुत कमजोरी महसूस करता था, लेकिन क्रिकेट का बुखार लग गया था."

अपने क्रिकेटिंग करियर की शुरुआत में ही उन्हें जल्द ही अहसास हो गया कि कमजोर हाथ के ज़रिए लेग स्पिन गेंदबाज़ ही बेहतर विकल्प है, लेकिन उन्होंने कभी सोचा नहीं था कि उन्हें इंटरनेशनल क्रिकेट में खेलने का मौक़ा मिल जाएगा.

लेकिन घरेलू क्रिकेट प्रतियोगिताओं में उनकी शानदार गेंदबाज़ी का ऐसा असर हुआ कि महज कुछ ही महीनों के अंदर वे भारत की इंटरनेशनल क्रिकेट टीम में शामिल हो गए.

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जनवरी, 1964 में उन्होंने मुंबई में इंग्लैंड के ख़िलाफ़ अपना टेस्ट करियर शुरू किया, पहले टेस्ट में उन्हें चार विकेट ही मिले, लेकिन ये साफ़ ज़ाहिर हो रहा था कि बल्लेबाज़ उनकी गेंदों को समझ नहीं पा रहे थे.

लेकिन टीम में अपना स्थान जमाने से पहले ही 1967 में चंद्रा चोटिल हो गए. पहले पांव में चोट लगी और फिर स्कूटर से एक्सीडेंट हो गया और वे चार साल तक इंटरनेशनल क्रिकेट से बाहर हो गए.

वापसी पर मुड़कर नहीं देखा

1971 में इंग्लैंड का दौरा करने वाली टीम में उनकी वापसी हुई और उसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा.

दरअसल, वे अपने दौर के सबसे अजूबे गेंदबाज़ों में एक थे, स्पिन गेंदबाज़ थे, लेकिन रन अप किसी मीडियम फास्ट गेंदबाज़ जैसा था, हालांकि धीमे क़दमों से आकर फेंकी जाने वाली उनकी गेंदें किसी भी मध्यम गति के तेज़ गेंदबाज़ से भी तेज़ होती थी. इसके अलावा वे अपनी गुगली, टॉप स्पिन और लेग ब्रेक गेंदों से विपक्षी बल्लेबाज़ों को बखूबी छकाते रहे.

इस ख़ूबी के चलते ही करीब पूरे दशक तक क्रिकेट की दुनिया में उनकी गेंदों की धूम मची रही.

उनकी गेंदबाज़ी को लेकर कोई अनुमान लगाना कितना कठिन होता था, इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कई मौकों पर वे ख़ुद ही कह चुके हैं उन्हें नहीं मालूम रहता था कि गेंद फेंकने के बाद होगा क्या.

उनकी इस ख़ूबी का फ़ायदा भारतीय क्रिकेट को भी ख़ूब मिला. चंद्रा जिन 58 टेस्ट मैचों में खेले, उनमें 14 टेस्ट मैचों में भारत को कामयाबी मिली. इन 14 टेस्ट मैचों में चंद्रा ने 98 विकेट चटकाए. इन 14 टेस्टों में आठ बार चंद्रा ने पारी में पांच विकेट चटकाए और एक बार मैच में दस या उससे ज़्यादा विकेट लिए.

ख़ास बात ये है कि इन 14 टेस्ट मैचों में पांच विदेशी मैदानों पर मिली जीत शामिल है, ये बात इसलिए भी जाननी ज़रूरी है क्योंकि वो दौर ऐसा था जब भारतीय क्रिकेट टीम टेस्ट जीतों के लिए सालों इंतज़ार किया करती थी.

विदेशी मैदान पर जीत की शुरुआत

आज भी विदेशी मैदानों पर भारत की टेस्ट जीत की बात होती है, तो इंग्लैंड के ख़िलाफ़ 1971 का ओवल टेस्ट लोगों के जेहन में कौंधने लगता है.

सिरीज़ के निर्णायक ओवल टेस्ट की दूसरी पारी में चंद्रशेखर ने महज 38 रन देकर छह विकेट चटका कर मेजबान इंग्लैंड की पारी को 101 रनों पर समेट दिया था, इसके बाद पहली पारी में पिछड़ी भारतीय टीम ने जीत के लिए ज़रूरी 176 रन बनाकर मैच चार विकेट से जीत लिया. ये इंग्लैंड में भारत की पहली टेस्ट जीत थी, जिसके चलते भारत सिरीज़ जीतने में भी कामयाब रहा.

उनकी इस गेंदबाज़ी को साल 2002 में विजडन ने शताब्दी का सबसे बेहतरीन गेंदबाज़ी प्रदर्शन आंका था.

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1976 में वेस्टइंडीज़ के ख़िलाफ़ पोर्ट ऑफ़ स्पेन में भारतीय बल्लेबाज़ों ने चौथी पारी में 406 रन बनाकर जीत हासिल की थी, उसमें भी चंद्रा ने आठ विकेट चटकाए थे.

सुनील गावसकर की कप्तानी में भारत को 1976 में ऑकलैंड में पहली विदेशी जीत दिलाने में भी चंद्रा का अहम योगदान रहा था.

उनके कमाल की बदौलत ही भारत ने ऑस्ट्रेलिया को पहली बार उसके मैदान पर हराया. 1977-78 के मेलबर्न टेस्ट की दोनों पारियों में चंद्रा ने छह-छह विकेट चटकाए थे. इसके बाद सिडनी टेस्ट में टीम को जीत दिलाने में चंद्रा की अहम भूमिका रही.

गायक मुकेश से कनेक्शन

चंद्रा किस तरह के गेंदबाज़ थे, इसका अंदाज़ा लगाने के लिए एक दिलचस्प उदाहरण भी क्रिकेट इतिहास में मौजूद है. ये उदाहरण क्रिकेट इतिहास के सबसे विस्फोटक बल्लेबाज़ों में एक विवियन रिचर्ड्स से जुड़ा है.

रिचर्ड्स ने भारत के ख़िलाफ़ 1974 में बेंगलुरु टेस्ट से अपना डेब्यू किया था, टेस्ट की दोनों पारियों में चंद्रा ने रिचर्ड्स को पांव टिकाने का मौका नहीं दिया, पहली पारी में वे चार रन बना पाए, दूसरी पारी में तीन.

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दिल्ली में होने वाले सिरीज़ के दूसरे टेस्ट में भारतीय चयनकर्ताओं ने फ़ैसला लिया कि टीम तीन स्पिनर के साथ खेलेगी और चंद्रा को मौका नहीं मिला. इस टेस्ट में विवियन रिचर्ड्स को एक ही पारी में बल्लेबाज़ी करने का मौका मिला और उन्होंने बेदी, प्रसन्ना और वेंकटराघवन के सामने नाबाद 192 रन ठोक दिए, 20 चौकों और छह छक्कों के साथ.

इसके बाद चंद्रा टीम में वापस लौटे तो अगले तीन टेस्ट में विवियन रिचर्ड्स की लय फिर गड़बड़ा गई, वे महज एक बार 50 रन तक पहुंच पाए. रिचर्ड्स के पांव अपने पूरे करियर में किसी दूसरे गेंदबाज़ के सामने इस तरह नहीं डगमगाया.

चंद्रा को लेकर उनके साथी बिशन सिंह बेदी ने एक बार कहा है कि उन्हें चंद्रा में साक्षात ईश्वर नज़र आते थे. अपने साथियों से ऐसा सम्मान हर किसी को नहीं मिलता.

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हालांकि उनके करियर के साथ एक ऐसा रिकॉर्ड भी जुड़ा है जो शायद ही कोई क्रिकेटर अपने नाम चाहेगा. 58 टेस्ट में उन्होंने महज 167 रन बनाए थे, 242 विकेटों से भी कम.

क्रिकेटिंग काबिलियत से इतर चंद्रा को गायकी का बड़ा शौक रहा है और वे मुकेश को बहुत पसंद करते थे. उनके गानों को चंद्रा ना केवल गुनगुनाते थे बल्कि साथियों को सुनाना भी उन्हें बेहद पसंद था. 'ये मेरा दीवानापन है' चंद्रा का सबसे फेवरिट गीत रहा है.

उनके कप्तान रहे सुनील गावसकर कई बार उनका मनोबल बढ़ाने के लिए मुकेश के गाने गुनगुनाने लगते थे.

ऐसे शानदार क्रिकेटर का मुश्किलों ने रिटायरमेंट के बाद भी पीछा नहीं छोड़ा. 1991 में वे सड़क दुर्घटना की चपेट में आ गए और तीन महीने उन्हें अस्पताल में बिताने पड़े. लेकिन मुश्किलों से लड़कर हार जाने वालों में चंद्रशेखर कभी नहीं रहे.

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