IPL 2018: CSK को हराना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है...

  • 28 मई 2018
धोनी इमेज कॉपीरइट PTI

क्रिकेट की ये कहानी क़रीब दस साल पुरानी है. ललित मोदी ने क्रिकेट में तड़का लगाया और उसे इंडियन प्रीमियर लीग की शक्ल दे दी थी.

लेकिन मुक़ाबला, क्रिकेट के मैदान से पहले कॉरपोरेट दुनिया के तेज़-तर्रार दिमाग़ों और बेहद गहरी जेबों के बीच लड़ा गया.

साल 2008 में वी बी चंद्रशेखर चेन्नई सुपरकिंग्स के चीफ़ सेलेक्टर और डायरेक्टर, क्रिकेट ऑपरेशंस हुआ करते थे. खिलाड़ियों के लिए बोली लगाने का कार्यक्रम शुरू होने में अब कुछ ही घंटे बचे थे.

टीम के मालिक और इंडिया सीमेंट के बॉस एन श्रीनिवासन ने उनसे पूछा, "तुम किसे चुनने वाले हो?" चंद्रशेखर ने जवाब दिया, "धोनी!" उन्होंने अगला सवाल किया, "वीरेंद्र सहवाग क्यों नहीं?" उन्होंने अपने फ़ैसले के पक्ष में कई दलीलें दीं.

श्रीनिवासन फिर बोले, "मैं सहवाग को चुनता."

चंद्रशेखर रात भर उधेड़बुन में लगे रहे लेकिन अगली सुबह उन्हें एक और सरप्राइज़ मिलने वाला था. सवेरे श्रीनिवासन उनके पास आए और सिर्फ़ इतना कहा, "धोनी हमारी टीम में होने चाहिए."

ललित मोदी की हैकरों को चुनौती!

अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से रिटायर होकर धूम मचाने वाले वॉटसन

इमेज कॉपीरइट AFP/Getty Images
Image caption एन श्रीनिवासन

कैसे बने थे धोनी चेन्नई के?

चंद्रशेखर ने ये पूरा किस्सा एक खेल वेबसाइट को दिए इंटरव्यू में बताई थीं. लेकिन ये दिलचस्प कहानी का आधा हिस्सा भर है.

जब नीलामी शुरू हुई तो चंद्रशेखर ने तय किया कि उन्हें टीम बनाने के लिए खिलाड़ी खरीदने को 50 लाख डॉलर मिले हैं, उनमें से वो 11 लाख डॉलर तक धोनी के लिए रख सकते हैं.

लेकिन फिर ख़बर आई कि दूसरी टीमें भी धोनी को अपने पाले में करने के चक्कर में हैं. चंद्रशेखर ने अपनी बोली 14 या 15 लाख डॉलर तक बढ़ाने का फ़ैसला किया. हवा उड़ी कि माही के लिए बोली 18 लाख डॉलर तक जा सकती है.

तब चंद्रशेखर ने हाथ खड़े कर दिए. क्योंकि उन्हें अहसास हो गया था कि अगर वो इतनी बड़ी रकम अकेले धोनी पर खर्च कर देंगे तो जीतने लायक टीम ख़रीदने के लिए उनके पास कोई रकम नहीं बचेगी.

लेकिन क़िस्मत ने चंद्रशेखर के दांव और श्रीनिवासन की इच्छा का साथ दिया और साल 2008 में 15 लाख डॉलर में धोनी चेन्नई सुपरकिंग्स के हो गए. इसके बाद जो हुआ, वो इतिहास है.

इतिहास उस टीम का, जो चमकीले पीले कपड़ों में सबसे अलग चमकती है.

आईपीएल स्पॉट फ़िक्सिंग: श्रीनिवासन और अन्य की जांच को तैयार जस्टिस मुद्गल

आईपीएल: सचिन का संन्यास, श्रीनिवासन के खिलाफ हूटिंग

इमेज कॉपीरइट AFP/Getty Images

पूरे देश में क्यों पसंद की जाती है CSK?

वो टीम, जिसे उसके घर (चिदंबरम स्टेडियम, चेन्नई) में हराना नामुमकिन माना गया, और जब उसे राजनीतिक विवादों की वजह से अपना घर छोड़कर पुणे को अस्थायी घर बनाना पड़ा तो भी मुंबई इंडियंस से ज़्यादा उसे प्यार मिला.

ये वो टीम है, जिसके प्रशंसक रेलगाड़ियों में सवार होकर चेन्नई से पुणे ऐसे पहुंचते हैं, जैसे कोई मेला लगा हो. ये वो टीम है, जो झारखंड से आने वाले एक खिलाड़ी के लिए 'नम्मा थाला पेरिया अडिंगा' का नारा लगाती है. इस तमिल जुमले का मतलब है, सीटी बजाकर हमारे कप्तान धोनी का साथ दो!

आपको भी अब तक पढ़ते हुए लग रहा होगा कि ये कहानी चेन्नई सुपरकिंग्स की होने वाली थी, फिर ज़्यादातर बातें धोनी की क्यों हो रही हैं. सवाल जितना स्वाभाविक है, जवाब उतना ही आसान.

IPL FINAL: चेन्नई बनी 'आईपीएल 2018 सुपरकिंग्स'

चेन्नई सुपरकिंग्स को आईपीएल फ़ाइनल में पहुंचाने वाले शार्दुल ठाकुर

इमेज कॉपीरइट AFP/Getty Images

दरअसल, चेन्नई सुपरकिंग्स की दस साल की कुल-जमा ज़िंदगानी के हीरो महेंद्र सिंह धोनी ही हैं. CSK की मालिक कंपनी का नाम इंडिया सीमेंट है. और धोनी वो सीमेंट हैं, जिन्होंने इस क्रिकेट टीम को एक इमारत में ढाला है.

और जो जगह चेन्नई सुपरकिंग्स में धोनी की है, कमोबेश वही जगह आईपीएल में चेन्नई सुपरकिंग्स की है.

हैदराबाद के पास शायद सबसे धांसू बॉलिंग अटैक है, पंजाब के पास क्रिस गेल नाम का तूफ़ान है, बैंगलोर के पास विराट कोहली और ए बी डीविलियर्स जैसे बल्लेबाज़ हैं, मुंबई इंडियंस के पास नौजवान खिलाड़ी हैं, राजस्थान के पास रहाणे, केकेआर के पास सुनील नारायण हैं, दिल्ली के पास कभी-कभी चमकने वाले सितारे हैं, लेकिन चेन्नई के पास जीतने वाली टीम है और जिताने वाला कप्तान है.

धोनी के साथ भी, धोनी के बाद भी

धाकड़ कप्तान महेंद्र सिंह धोनी हैं क्रीज़ के राजा

इमेज कॉपीरइट AFP/Getty Images

चेन्नई को एक मुकम्मल टीम क्यों माना जाता है?

लेकिन ये टीम सिर्फ़ इसलिए आईपीएल की सबसे कामयाब टीम नहीं क्योंकि विकेटकीपर के दस्ताने और कप्तान का दिमाग ऐसे शख़्स के पास है, जिसे जीनियस कहा जाता है. बल्कि इसलिए है क्योंकि ये इस टूर्नामेंट की शायद सबसे ज़्यादा कम्पलीट टीम है, एक मुकम्मल दल.

कहानी साल 2008 से 2018 तक आ पहुंची है. लेकिन चेन्नई सुपर किंग्स की जीत की न भूख शांत हुई और न ही जीतने का हुनर कुंद पड़ा.

वर्ल्ड कप हो या फिर आईपीएल, टूर्नामेंट वो टीम जीतती है कि जो सही वक़्त पर पीक पर पहुंचे, जिसका कप्तान मैच में पिछड़ते वक़्त तक अपने दिमाग से हालात बदले, जिसके सारे खिलाड़ी हर मैच में कुछ न कुछ योगदान दें, और जब कप्तान फेल हो जाए तो वो बड़े खिलाड़ी फ्रंट फ़ुट पर आए, जो अब तक सिर्फ़ नेट्स में अच्छा खेल रहे थे.

साल 2018 का आईपीएल भी इसलिए याद रहेगा. खिताबी मुकाबले में चेन्नई सुपरकिंग्स के सामने सनराइज़र्स हैदराबाद थी. उसकी बाग़डोर एक दूसरे कैप्टन कूल (केन विलियम्सन) के हाथों में थी. लेकिन सिर्फ़ कप्तान मैच नहीं जिताता.

धोनी ने दिखाया कि आज भी वही हैं बॉस!

धोनी सीट खाली करो कि दिनेश कार्तिक आते हैं...

इमेज कॉपीरइट AFP/Getty Images
Image caption केन विलियम्सन

फ़ाइनल में चेन्नई को अकेले दम पर उस बल्लेबाज़ ने मैच जिताया जो चोट से जूझ रहा था. जिसे खाता खोलने में 10 गेंद लगी. लेकिन जब मैच ख़त्म हुआ तो बड़े मैच के बड़े प्लेयर, शेन वॉटसन का स्कोर था 57 गेंद में 117 रन.

लीग मैचों में टेबल टॉप करने वाली सनराइज़र्स हैदराबाद ने एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा दिया, लेकिन चेन्नई सुपरकिंग्स से पार नहीं पा सके. आईपीएल 2018 में चेन्नई ने चार मैचों में हैदराबाद को चार दफ़ा हराया.

बड़े मैच, बड़े खिलाड़ी

वॉटसन ने फ़ाइनल में सारा काम ख़ुद संभाला और जीत तक ले गए. उन्होंने धोनी को ज़रा भी टेंशन नहीं लेने दी. धोनी का काम था ड्रेसिंग रूम में घूमते रहना. और मैदान के बीचोंबीच बॉल वॉटसन तक आ रही थी और फिर तेज़ी से घूमते हुए मैदान के बाहर जा रही थी.

इससे पहले प्लेऑफ़ में सनराइज़र्स हैदराबाद और जीत के बीच फ़ेफ़ डुप्लेसी खड़े हो गए थे. जब शायद चेन्नई की टीम ने ख़ुद भी हार मान ली होगी, वहां से प्लेसी मैच जिता ले गए.

चेन्नई सुपरकिंग्स के शेरों की ज़ोरदार दहाड़

गेल से तेज़ चेन्नई की वाटसन मेल, रॉयल्स चित

इमेज कॉपीरइट PTI
Image caption शेन वॉटसन

पावर हिटिंग और नौजवान फ़ुर्ती को तरज़ीह देने वाले आईपीएल में चेन्नई सुपरकिंग्स की टीम कम्पोजिशन और उसकी औसत उम्र, दोनों हैरान करती है.

धोनी ने भी माना था कि टीम के खिलाड़ियों की उम्र चिंता का विषय है और उन्हें फ़िट रखना ज़रूरी हो जाता है. धोनी ने कहा था, "हमें इस बात का ख़्याल रखना था कि जब टूर्नामेंट अपने सबसे अहम दौर में दाख़िल हो, तो सभी बढ़िया खिलाड़ी सेलेक्शन के लिए उपलब्ध रहें."

और फ़ाइनल में वॉटसन का चयन और उनकी पारी, धोनी की इसी चतुराई पर मुहर लगाती है. 37 साल के वॉटसन, 36 के धोनी, 37 के हरभजन सिंह, 32 के रायूडु, 34 के ब्रावो और 31 के रैना जैसे खिलाड़ियों से सजी CSK की औसत उम्र 34 साल से ज़्यादा है.

लेकिन उम्र कभी अक़्लमंदी के आड़े नहीं आती. दस साल में चेन्नई अगर सबसे कामयाब टीम बनी है, तो उसके चयन में धोनी का चातुर्य भी दिखता है. और इस समझदारी का असर जीत में नज़र आता है.

रिकॉर्ड सातवीं बार आईपीएल के फ़ाइनल में चेन्नई

इतनी जल्दी थक गया क्रिकेट का स्पाइडरमैन डिविलियर्स

2008 से 2018 तक

साल 2008 के पहले आईपीएल में वो फ़ाइनल तक पहुंची लेकिन बेहद करीबी मुक़ाबले में हारकार खिताब से दूर रह गई. लेकिन इस टीम की तारीफ़ ख़ूब हुई.

चेन्नई ने उस सीज़न में धोनी के अलावा सबसे बड़े सितारों को अपने पाले में किया था. बल्ला हो या फिर गेंद, दोनों के बड़े सितारे चेन्नई के डगआउट में बैठा करते थे.

ऑस्ट्रेलिया के मैथ्यू हैडन, स्टीफ़न फ़्लेमिंग सरीखे बल्लेबाज़ तो मुथैया मुरलीधरण जैसे गेंदबाज़. और साथ में मैच का रुख़ पलटने का दम रखने वाले माइकल हसी.

अगले साल 2009 में उसकी क़िस्मत ने उसका साथ नहीं दिया. टीम ने सबसे महंगे खिलाड़ी के रूप में इंग्लैंड के एंड्रयू फ़िल्ंटॉफ़ को ख़रीदा था लेकिन वो चोट की वजह से सिर्फ़ तीन मैच खेल पाए. माइकल हसी भी एशेज़ की वजह से जल्द लौट गए.

चेन्नई सुपरकिंग्स और राजस्थान रॉयल्स की वापसी

इमेज कॉपीरइट AFP/Getty Images
Image caption एंड्रयू फ़िल्ंटॉफ़

टूर्नामेंट में सबसे ज़्यादा रन बनाए हैडन ने, लेकिन वो चेन्नई को खिताब तक नहीं ले जा सके.

लेकिन इसके बाद उसने वो कर दिखाया, जो किसी टीम ने नहीं किया था. साल 2010 में धोनी की अगुवाई में टीम पूरे टूर्नामेंट में चैम्पियन की तरह खेली और खिताब अपने नाम किया.

कभी देसी, कभी विदेशी

विदेशी खिलाड़ियों के बाद बारी थी देसी नौजवानों के नाम कमाने की. और सुरेश रैना-मुरली विजय ने मौका नहीं गंवाया. शुरुआती सात में से दो मैच जीतना फिर अगले पांच में से चार जीतकर टूर्नामेंट की शक्लोसूरत बदलना, चेन्नई ने सबकुछ किया.

इसके बाद बड़े मुकाबले में कभी रैना का बल्ला चला तो कभी डग बॉलिंजर की गेंदों ने कहर बरपाया. फ़ाइनल में अश्विन और मुरली की जोड़ी ने जीत झोली में डाली.

आईपीएल: जब 41 साल के तांबे ने किया था IPL डेब्यू

इमेज कॉपीरइट AFP/Getty Images
Image caption सुरेश रैना

अगले साल 2011 की कहानी भी कुछ ऐसी ही रही. चेन्नई में एल्बी मॉर्कल और बद्रीनाथ जैसे नए नाम जुड़े, कुछ पुराने साथ ही बने रहे और साथ ही बनी रही उसकी जीत की कहानी. ये लगातार दूसरे साल कप जीतने का पहला मामला था.

इसके बाद साल 2012, तो आईपीएल में जिस टीम को सभी हराना चाहते थे, वो चेन्नई थी. लेकिन वो फ़ाइनल से पहले नहीं हारी और रनर्स-अप रही. साल 2013 में भी ठीक यही किस्सा दोहराया गया.

साल 2014 में एक बार फिर नीलामी हुई. चेन्नई ने धोनी, रैना, अश्विन, जडेजा और ब्रावो के रिटेन करने का फ़ैसला किया और ब्रैंडन मैक्कलम, डुप्लेसी, नेहरा और मोहित शर्मा टीम में शामिल हुए.

इस बार भी उसका प्रदर्शन झूले जैसे रहा. कभी लगातार हार और फिर लगातार जीत. लेकिन वो सबसे अहम मुकाबला हारी पंजाब के हाथों, जहां उसके सामने 225 से ज़्यादा लक्ष्य रख दिया गया.

वो मौके जब 'कैप्टन कूल' को आया गुस्सा

टी-20 टीम में रैना की वापसी, युवराज नहीं चुने गए

इमेज कॉपीरइट AFP/Getty Images

कैसा रहा अब तक सफ़र?

साल 2015 में टीम ने कुछ खिलाड़ियों को चलता किया, कुछ नए खिलाड़ी ख़रीदे भी. लेकिन उसके प्रदर्शन में कोई गिरावट नहीं आई. वो फ़ाइनल में पहुंची लेकिन मुंबई से हारी.

धोनी के अलावा चेन्नई के साथ एक और ख़ास बात ये रही कि उसके कुछ खिलाड़ी पक्के रहे, कुछ साल दर साल बदलते रहे. लेकिन आने वाले नए खिलाड़ियों ने तेज़ी से टीम के मुताबिक ख़ुद को ढाला और धोनी के काम करने के अंदाज़ के साथ रम गए.

ये वो टीम है, जिसके पास हर साल कोई न कोई विस्फोटक बल्लेबाज़ रहा, कोई मध्यक्रम संभालने वाला शांत दिमाग वाला खिलाड़ी, धोनी फ़िनिशर के तौर पर हर साल उपलब्ध रहे और साथ ही टीम के पास रहे बेहद सधे टी20 गेंदबाज़.

क्रिकेट में पुरानी कहावत है कि बल्लेबाज़ मैच जितवाते हैं, गेंदबाज़ टूर्नामेंट. लेकिन नए दौर ने कहावत बदल डाली है. टी20 ऑलराउंडर जितवाते हैं, और चेन्नई के पास कभी अच्छे हरफ़नमौला खिलाड़ियों की कमी नहीं रही.

एल्बी मॉर्कल पहले हुआ करते थे, अब वॉटसन हैं. अश्विन पहले थे, अब जडेजा हैं. ड्वेन ब्रावो पहले भी थे और अब भी हैं. धोनी हमेशा से चेन्नई में थे और आज भी हैं. लेकिन क्रिकेट के हुनर से अलहदा वजहों से इस टीम बुरा दौर भी देखा है.

साल 2015 के बाद आए दो साल चेन्नई सुपर किंग्स के लिए बेहद बुरे गुज़रे.

इमेज कॉपीरइट AFP/Getty Images

वो बुरा दौर टीम का

भ्रष्टाचार, मैच फ़िक्सिंग के जाल में टीम ऐसी फंसी कि आख़िरकार दो साल के लिए टूर्नामेंट से ही बेदख़ल कर दी गई. टीम के सारे खिलाड़ी बिखर गए और अलग-अलग टीमों का हिस्सा हो गए.

एक नई टीम बनी और धोनी उसके हिस्से में चले गए. चेन्नई के कुछ और खिलाड़ियों को भी पुणे ने ख़रीदा. लेकिन वो बात नहीं रही. ऐसा लगा जैसे धोनी की जर्सी का रंग बदलते ही उनका रंग फीका पड़ गया.

वो टीम कहीं खो सी गई, जो हारे हुए मैच जीता करती थी. जिस टीम में धोनी के अलावा ऐसे कई खिलाड़ी थे, जो अकेले दम पर मैच का रुख़ पलट दिया करते थे.

इमेज कॉपीरइट AFP/Getty Images

लेकिन फिर कहानी बदली. चेन्नई को अपना पुराना कप्तान मिला और कुछ पुराने खिलाड़ी भी. साथ ही मिला वो डगआउट, जिसने अलग-अलग देशों के खिलाड़ियों को एक सूत्र में पिरोने का काम किया.

जहां ऑस्ट्रेलिया के वॉटसन वेस्टइंडीज़ के ब्रावो से मज़ाक किया करते हैं और रैना, हरभजन की खिंचाई करते हैं. लेकिन इन सभी के बीच कैप्टन कूल जीत की स्कीम बनाते हैं.

ये 2008 नहीं 2018 है. तब चेन्नई सुपर किंग्स बनी थी, अब बिखरकर दोबारा बनी है, पीली जर्सी में धोनी लौटे हैं और आख़िरकार जीत भी लौट आई है!

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए

मिलते-जुलते मुद्दे