क्रिकेट को लेकर कितने गंभीर रहे गौतम गंभीर?

  • 5 दिसंबर 2018
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आख़िर वो दिन आ ही गया जब गौतम गंभीर को यह निर्णय लेना पड़ा. वो व्यक्ति जिसने अपनी टीम और देश के लिए बेहद ग़ुरूर और पूरी तन्मयता के साथ निडर होकर खेला, उसने संन्यास लेने का फ़ैसला किया है.

वक़्त का तक़ाज़ा है और यह गौतम गंभीर को भी पता है, लिहाज़ा उन्होंने क्रिकेट के सभी प्रारूपों से सन्यास लेने की घोषणा कर दी है.

आज वो पीछे मुड़ कर गर्व के साथ अपनी उपलब्धियों को देख सकते हैं. उनकी बल्लेबाज़ी, पिच पर होने के दौरान अपने ऑफ़ स्टंप्स की स्थिति का पता होना, वो प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता जिसमें कोई कोना अछूता न रहे, सर्वश्रेष्ठ बने रहने की चाहत जो वो हर समय हो सकते थे, और मज़बूत बल्लेबाज़ी क्रम में बने रहने के लिए उनकी ख़ुद की क्षमता उन्हें वो खिलाड़ी बनाती है जो वो ख़ुद थे - विस्फोटक, ताक़तवर और शानदार.

वीरेंद्र सहवाग के साथ उनकी ज़ोरदार ओपनिंग साझेदारी, जिसे अक्सर वीरू-गौती शो कहा जाता था, को लगातार रन बनाने के लिए याद किया जाएगा.

सहवाग का ओपनिंग पार्टनर होने को उन्होंने जिस तरह लिया वो सराहनीय था.

जब एक तरफ़ सहवाग हों तो दूसरी तरफ़ यह आसान नहीं होता कि आप अपने आक्रामक रुख़ को रोक कर पिच पर खड़े रहें, लेकिन बिना पलक झपकाए वो ऐसा करने में कामयाब रहे.

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वर्ल्ड कप के हीरो

आईसीसी वर्ल्ड टी20 2007 और आईसीसी क्रिकेट वर्ल्ड कप 2011 के फ़ाइनल में सर्वाधिक व्यक्तिगत रन बनाकर उन्होंने बड़े मैच में बड़ा स्कोर करने वाले बल्लेबाज़ की प्रतिष्ठा हासिल की.

पाकिस्तान के ख़िलाफ़ जोहान्सबर्ग में 75 और श्रीलंका के ख़िलाफ़ मुंबई में उनकी 97 रनों की पारी ने दूसरे छोर से बल्लेबाज़ों को खुलकर अपने हाथ आज़माने का मौक़ा दिया.

इतना ही नहीं, भारतीय टेस्ट टीम में भी उन्होंने अपनी जगह पक्की कर रखी थी, ख़ास कर 2008 से 2012 के दरम्यान. लेकिन 2006 और 2007 के दौरान वो टेस्ट टीम से बाहर रहे और सीबी सिरीज़ में जोरदार प्रदर्शन कर एक बार फिर अंतिम ग्यारह में वापसी की.

उस एकदिवसीय सिरीज़ में उन्होंने श्रीलंका और ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ शतक जड़े और जिस आत्मविश्वास के साथ बल्लेबाज़ी की उसने चयनकर्ताओं को उन्हें टीम में वापस लेने के लिए मजबूर कर दिया.

ऑस्ट्रेलिया को बेस्ट ऑफ़ थ्री फ़ाइनल में 2-0 से हराने के बाद टीम के भारत लौटने के दौरान मेलबर्न हवाईअड्डे पर मेरी उनसे बात हुई. मैंने उनसे टेस्ट टीम में चुने जाने को लेकर पूछा. उन्होंने आश्चर्य से मेरी तरफ़ देखे और कहा, "आप मानते हैं?"

बैक टू बैक सेंचुरी

ईमानदारी से कहूं तो जब दक्षिण अफ़्रीका के ख़िलाफ़ घरेलू सिरीज़ के लिए उन्हें नज़रअंदाज़ किया गया तो उनका मज़ाक़ नहीं उड़ाया गया. इसके बजाय, उन्होंने आईपीएल टूर्नामेंट में दिल्ली डेयरडेविल्स की ओर से खेलने पर अपना ध्यान लगाया. जहां अपने प्रदर्शन से उन्होंने चयनकर्ताओं को दिखा दिया कि वो ज़बरदस्त फ़ॉर्म में हैं. आख़िर, उन्हें दुनिया की सर्वश्रेष्ठ टीम ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ मौक़ा मिल ही गया.

गंभीर ने यहां भी अपनी छाप छोड़ी. बहुत कम ही क्रिकेटर्स ने ब्रेट ली, मिशेल जॉनसन, शेन वॉटसन और पीटर सिडेल जैसे गेंदबाज़ से सजी टीम के ख़िलाफ़ लगातार टेस्ट में शतक जड़ने का कारनामा किया है.

गंभीर ने ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ मोहाली की दूसरी पारी में 104 रन बना कर जीत में अहम भूमिका निभाई फिर फ़िरोज़ शाह कोटला में 206 रन बना डाले.

ये पारियां टेस्ट क्रिकेट में उनके कौशल और आत्मविश्वास का बेहतरीन परिचायक बनीं.

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Image caption नेपियर टेस्ट के दौरान गौतम गंभीर

नेपियर का ड्रॉ

बेशक, नेपियर में जब भारत को एक अदद ड्रॉ के लिए अंतिम दो दिनों संघर्ष करना था तब उन्होंने जो बेमिसाल पारी खेली उसे लंबे समय तक याद किया जाता रहेगा.

इस पारी के दौरान वो पिच पर क़रीब 13 घंटे तक डटे रहे, 137 रनों की पारी खेली और राहुल द्रविड़, सचिन तेंदुलकर और वीवीएस लक्ष्मण जैसे खिलाड़ियों के साथ अहम साझीदारी की.

फ़िरोज़ शाह कोटला में बनाया गया शतक, गौतम गंभीर की वो बेहतरीन पारी है जो मुझे काफ़ी पसंद है. 90 के व्यक्तिगत स्कोर पर वो शेन वॉटसन की गेंदबाज़ी पर बल्लेबाज़ी कर रहे थे.

वॉटसन उन्हें छकाने की पूरी कोशिश कर रहे थे. एक हद तक वो गौतम को छकाने में कामबाय भी हो गए थे. वॉटसन के इसी ओवर में गेंद गौतम के बल्ले के बाहरी किनारे से लगी और थर्ड मैन बाउंड्री पर चली गई.

लेकिन गौतम गंभीर ने वॉटसन के अगले ओवर में अपना इरादा बयां कर दिया. तब गौती 99 पर बल्लेबाज़ी कर रहे थे, वॉटसन की गेंद पर वो क्रीज़ से बाहर निकले और गेंद को स्ट्रेट ड्राइव करते हुए छक्का जड़ते हुए उसी अंदाज़ में अपना शतक पूरा किया जिसे करने में सहवाग को भी बहुत अभिमान होता.

इसके बाद रिकी पोन्टिंग ने वॉटसन को बॉलिंग से हटा लिया और फिर अगले दिन तक उन्हें दोबारा गेंद नहीं थमाई.

अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से दूर रहते हुए गौतम गंभीर घरेलू क्रिकेट में भी उतनी ही शिद्दत के साथ बल्लेबाज़ी करते रहे, चाहे यह रणजी ट्रॉफ़ी हो या दलीप ट्रॉफ़ी या फिर आईपीएल जहां बतौर कोलकाता नाइट राइडर्स के कप्तान - वो बेहद सफल रहे. उन्हें 2008 रणजी ट्रॉफ़ी में दिल्ली की टीम को बतौर कप्तान विजेता बनाने के लिए याद किया जाएगा. फ़ाइनल में उन्होंने जो शतक जड़ा उसकी बदौलत ही वो टेस्ट टीम में वापसी करने में कामयाब रहे.

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Image caption वर्ल्ड टी20 2007 के दौरान गौतम गंभीर

युवा वर्ल्ड कप में नहीं चुने गए तो...

सोचा जाए कि अगर, श्रीलंका में खेले गए आईसीसी युवा वर्ल्ड कप 1999-2000 में नहीं चुने जाने पर उन्होंने खेलना छोड़ दिया होता तो क्या अंतरराष्ट्रीय या घरेलू क्रिकेट में उनकी इन बेहतरीन पारियों को क्रिकेट के चाहने वाले उनका देख पाते.

अनदेखा किए जाने से वो इतने दुखी थे कि उन्होंने क्रिकेट को छोड़ कर शैक्षिक और व्यावसायिक गतिविधियों पर फ़ोकस करने का फ़ैसला कर लिया था.

यह सोचते हुए कि न्यूज़पेपर में चयन को लेकर एक ख़बर से फ़र्क़ पड़ेगा, उनकी मां और मामा ने एक पत्रकार से बात की. उस पत्रकार को अच्छे से पता था कि अख़बार में न्यूज़ छपने मात्र से उनके चयन पर फ़र्क़ नहीं पड़ेगा. उन्होंने युवा गौतम से बात की और क्रिकेट के बड़े प्लेटफ़ॉर्म पर खेलने को अपना लक्ष्य बनाने के बारे में सोचने के लिए उन्हें राज़ी किया.

और अब अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के तीनों प्रारूपों में 10,324 रनों से साथ एक सफल और संतोषजनक करियर पूरा करने के बाद उन्होंने रिटायर होने का फ़ैसला किया है.

गौती इस खेल के बेहद वफ़ादार खिलाड़ी रहे हैं और मैदान में उतरते वक़्त जुनून और देशभक्ति से लबरेज़ उनकी नज़र हमेशा लक्ष्य पर होती थी. अब वो अपने क्रिकेट करियर को बेहद संतुष्टि और पूरे गौरव के साथ देख सकते हैं.

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