#INDVsAUS क्रिकेट ड्रॉप-इन पिच क्या होती है जिस पर खेला जाएगा दूसरा टेस्ट?

  • 13 दिसंबर 2018
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जो लोग टेस्ट क्रिकेट पसंद करते हैं, वो जानते हैं कि ऑस्ट्रेलिया में मुक़ाबला हो और मैच WACA पर्थ में खेला जा रहा हो, तो इसका क्या मतलब होता है. यहां मैच होने का मतलब है तेज़ गेंदबाज़ों की चांदी और बल्लेबाज़ों के लिए तेज़ रफ़्तार लाल गेंद वाली आफ़त.

एडिलेड टेस्ट में जीतने वाली भारतीय टीम को दूसरा टेस्ट मैच पर्थ में खेलना है, लेकिन इस बार मैदान नया है. 14 दिसंबर से शुरू हो रहा है दूसरा मुक़ाबला पर्थ शहर के ऑप्टस स्टेडियम में खेला जाएगा. शहर की स्वान नदी के एक तरफ़ WACA पर्थ मैदान है और दूसरी तरफ़ ऑप्टस.

पहला टेस्ट होने की वजह से मेज़बान या मेहमान, दोनों ही टीमों को नहीं पता कि पिच क्या रंग दिखाएगी. लेकिन सभी का अंदाज़ा है कि मौसम और माहौल के हिसाब से अतीत में जिस तरह पर्थ की पिच तेज़ गेंदबाज़ों की मदद करती रही, इस बार भी वही होगा.

तेज़ गेंदबाज़ों की चांदी?

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ऑस्ट्रेलिया के कप्तान टिम पेन का कहना है कि नए मैदान में भारतीय टीम का सामना बेहद तेज़ पिच से होगा. पूर्व ऑस्ट्रेलियाई कप्तान रिकी पॉन्टिंग भी पेन से सहमत दिख रहे हैं. उन्होंने कहा, ''मुझे लगता है कि पर्थ टीम इंडिया के मुक़ाबले हमारे खिलाड़ियों की ज़्यादा मदद करेगी.''

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कंगारू टीम की तरफ़ से तेज़ गेंदबाज़ी की ज़िम्मेदारी मिशेल स्टार्क, जॉश हेज़लवुड, पैट कमिंस संभालेंगे. लेकिन भारतीय टीम भी ख़ाली हाथ नहीं है. टीम के पास अब ईशांत, बुमराह, मोहम्मद शामी और उमेश यादव/भुवनेश्वर कुमार जैसे गेंदबाज़ हैं. ऐसे में मुक़ाबला दिलचस्प होगा.

ये मैच इसलिए भी ख़ास है क्योंकि ऑप्टस मैदान में ड्रॉप-इन पिच है. लेकिन ये कौन सी पिच होती है और ड्रॉप-इन का मतलब क्या होता है?

क्या होती हैं ड्रॉप-इन पिचें?

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ये ऐसी पिच होती है, जिसे मैदान या वेन्यू से दूर कहीं बनाया जाता है और बाद में स्टेडियम में लाकर बिछा दिया जाता है. इससे एक ही मैदान को कई अलग-अलग तरह के खेलों में इस्तेमाल किया जा सकता है.

सबसे पहले पर्थ WACA के क्यूरेटर जॉन मैले ने वर्ल्ड सिरीज़ क्रिकेट के मैचों के लिए ड्रॉप-इन पिचें बनाई थीं, जो साल 1970 के दशक में ऑस्ट्रेलियाई कारोबारी केरी पैकर ने आयोजित कराई थी.

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इस सिरीज़ में ये पिच इसलिए अहम थीं क्योंकि उसका ज़्यादातर क्रिकेट डुअल पर्पज़ वेन्यू, यानी ऐसे जगह खेला गया, जहां एक से ज़्यादा खेल हो सकते थे. इसकी वजह ये थी कि टूर्नामेंट के मैच क्रिकेट के प्रभुत्व वाले इलाक़े से बाहर हुए थे.

कैसा होती है पिच का मिजाज़?

सफ़ेद बॉल, फ़्लडलाइट, हेल्मेट और रंगीन जर्सियों के अलावा ड्रॉप-इन पिचों को क्रिकेट मैचों को और दिलचस्प बनाने के लिए इस्तेमाल किया गया था.

जानकारों का कहना है कि इन पिचों पर जब पांच दिन वाला मैच खेला जाता है तो शुरुआती दो दिन असामान्य उछाल की वजह से तेज़ गेंदबाज़ और फिरकी, दोनों को मदद मिलती है, जबकि उसके बाद बल्लेबाज़ को भी पर्याप्त मौक़ा मिलता है.

एसएक्रिकेट के मुताबिक़ ड्रॉप-इन पिचों के साथ ख़ास बात ये है कि चाहने पर इन्हें मैच शुरू होने से महज़ 24 घंटे पहले फ़िट किया जा सकता है, और मैच ख़त्म होने की कुछ ही देर बाद हटाया जा सकता है. हालांकि, मेलबर्न क्रिकेट ग्राउंड के क्यरेटर ऑफ़-सीज़न होने पर इन पिचों को हटाकर रखना ज़्यादा पसंद करते हैं.

कितना वज़न होता है इनमें?

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एक स्टील फ़्रैम में बंद और सिंगल स्लैब की तरह ट्रांसपोर्ट की जाने वाली ड्रॉप-इन पिचें क़रीब 24 मीटर लंबी होती हैं. इनकी चौड़ाई तीन मीटर, गहराई 20 सेंटीमीटर और वज़न क़रीब 30 टन होता है.

इस मशीनरी के मामले में StrathAyr Drop-In Portable Cricket Wicket टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल होती है, जो इतनी लंबी, भारी और चौड़ी होती है कि पिच को यहां से वहां ले जाया जा सके.

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इसी उद्देश्य के लिए बनाई गई कम फ़्लोटेशन वाली StrathAyr TransportAyr आउटफ़ील्ड को नुक़सान नहीं पहुंचाती. और जहां ये उपलब्ध नहीं होती, वहां क्रेन और लिफ़्टिंग फ़्रैम इस्तेमाल की जाती है.

strathayr.com के मुताबिक StrathAyr "Drop In" Portable Cricket Wicket न्यूज़ीलैंड के ईडन पार्क, ऑस्ट्रेलिया के सिडनी में एएनज़ेड स्टेडियम, मेलबर्न के कोलोनियल स्टेडियम, न्यूज़ीलैंड के डुनेडिन और वेलिंग्टन स्टेडियम, लॉर्ड और एमएसजी में इस्तेमाल की जा रही हैं या की जाएंगी.

पिच क्यूरेटर ने क्या कहा?

वरिष्ठ खेल पत्रकार धर्मेंद्र पंत ने बताया कि ड्रॉप-इन पिचों के इस्तेमाल का आइडिया दरअसल न्यूज़ीलैंड में आया था, जहां रग्बी ख़ूब खेली जाती है. ऐसे में एक ही मैदान को रग्बी और क्रिकेट, दोनों के लिए इस्तेमाल करने के लिए ड्रॉप-इन पिचों पर दांव खेला गया.

उन्होंने कहा, ''ये ऐसी पिच होती है, जिसे कहीं और बनाया जाता है लेकिन क्रिकेट मैच शुरू होने से कुछ दिन पहले पिच को मैदान में लाकर फ़िट कर दिया जाता है ताकि सामंजस्य बनाया जा सके.''

पंत ने बताया, ''पर्थ के ऑप्टस मैदान की ड्रॉप-इन पिच पर पहले वनडे हो चुका है और भारतीय टीम भी ऑकलैंड में ऐसी ही पिच पर खेल चुकी है.''

ऑप्टस मैदान के नए पिच क्यूरेटर ब्रेट सिपथोर्प का कहना है कि ये टेस्ट मैच शायद पांच दिन नहीं चल पाएगा और टॉस जीतने वाली टीम ख़ुद गेंदबाज़ी का विकल्प ही चुनेगी.

मैदान में क्या ख़ास?

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उन्होंने पर्थ नाऊ से कहा, ''इस टेस्ट सिरीज़ में गाबा में कोई मैच नहीं होगा. इसलिए ये इकलौता ग्राउंड है, जहां तेज़ और बाउंसी पिच हो सकती है.''

हालांकि, इस मैदान को इस तरह बनाया गया है कि समंदर से आने वाली हवा गेंदबाज़ों को मदद ना दे लेकिन पिच क्यूरेटर का कहना है कि ये पिच स्विंग गेंदबाज़ के लिए स्वर्ग साबित हो सकती है.

लेकिन अगर ये पिच बाहर बनी है तो फिर इसमें पिच क्यूरेटर की क्या भूमिका होती है और वो कैसे इस पर टिप्पणी कर रहे हैं, इस सवाल के जवाब में पंत ने कहा, ''पिच मैदान में बनाई जाए या बाहर, वो होती क्यूरेटर की ही देखभाल में है. साथ ही ड्रॉप-इन पिचों के मामले में भी मौसम, ख़ास तौर से बादल छाने और हवा का फ़र्क़ पड़ता है.''

जब ड्रॉप-इन पिचों का विरोध हुआ

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लेकिन ऐसा नहीं कि ड्रॉप-इन पिचों को हमेशा हाथों-हाथ लिया गया है. साल 2005 में ब्रिसबेन क्रिकेट ग्राउंड, गाबा ने ड्रॉप-इन पिचों को इस्तेमाल करने से मना कर दिया था. यहां प्रशासन का कहना था कि शहर का मौसम कुछ ऐसा है कि पिच को पारंपरिक तरीक़े से बनाना ही ज़्यादा बेहतर विकल्प है.

हालांकि, ऑस्ट्रेलिया के ही मेलबर्न क्रिकेट ग्राउंड और न्यूज़ीलैंड में ऐसी पिचें ख़ूब इस्तेमाल होती रही हैं.

इसके अलावा अमरीका में भी ड्रॉप-इन पिचों के इस्तेमाल को लेकर चर्चा होती रही है. अमरीका में एक स्टेट से दूसरे स्टेट में मिट्टी ले जाने को लेकर सख़्त नियम हैं और इस वजह से मैदान से दूर कहीं और की मिट्टी इस्तेमाल कर पिच बनाना आसान नहीं है.

क्रिकेट आयोजक न्यूयॉर्क, कैलिफ़ोर्निया और फ़्लोरिडा जैसे शहरों में मैचों का आयोजन कराना चाहते हैं लेकिन ड्रॉप-इन पिचें बनाने के लिए इन स्टेट में क़ायदे की मिट्टी मिलती नहीं है.

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