भारत का विश्व कप हॉकी अभियान: कैसे टूटा जीत का सपना

  • 16 दिसंबर 2018
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भुवनेश्वर में हुए 2018 हॉकी विश्व कप में भारत के छठे पायदान पर रहने की व्याख्या कई नज़रिये से की जा सकती है.

ये भविष्य की उम्मीद हो सकती है. ये पिछले 23 सालों में भारत का श्रेष्ठतम प्रदर्शन था. युवा खिलाड़ियों ने साबित कर दिया कि वो इस विशाल मंच से भयभीत नहीं हैं और सबक सीखने को तैयार हैं. दूसरी ओर इसे ऐसा मौका भी कहा जा सकता है, जिसे खो दिया गया, क्योंकि मेजबानों से इस टूर्नामेंट में चमकने की उम्मीद थी.

पिछले कुछ सालों में भारत को सर्वश्रेष्ठ सुविधाएं मिली हैं. सर्वश्रेष्ठ टीमों से सामना हुआ है और उच्च स्तरीय वैज्ञानिक तथा रणनीतिक सहयोग ने उन्हें बड़ी प्रतियोगिताओं के लिए तैयार किया है.

टीम से थी बड़ी उम्मीद

भारत के लिए साल 2018 मिला-जुला रहा. गोल्ड कोस्ट में हुए राष्ट्रमंडल खेलों में ख़राब प्रदर्शन के बाद भारत चौथे स्थान पर रहा. हॉलैंड में हुई चैम्पियन्स ट्रॉफ़ी में थोड़ा सुधार हुआ और भारत रजत पदक पर कब्जा करने में कामयाब रहा. जकार्ता में हुए एशियाई खेलों में भारत को कांस्य पदक से संतोष करना पड़ा.

घरेलू मैदान पर आयोजित विश्व कप भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती और एक महत्त्वपूर्ण अवसर था. भारत ने साल 1975 में अजित पाल सिंह की अगुवाई में विश्व कप जीता था. किसी को उम्मीद नहीं थी कि मौजूदा टीम को उस तरह विजेता बनने का गौरव हासिल होगा, लेकिन खोए हुए गौरव की एक झलक देखने की उम्मीद ज़रूर थी.

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43 साल पहले बने थे विश्व विजेता

43 साल हो चुके हैं, जब भारत को विश्व कप या ओलम्पिक जैसे मंच पर सीना तानकर खड़ा होने का मौका मिला हो. साफ़-साफ़ कहा जाए तो पिछले कुछ सालों में भारतीय टीम में कुछ सुधार ज़रूर हुआ है, लेकिन सालों की कड़ी मेहनत, वैज्ञानिक सहयोग, वक्त और धन खर्च करने का नतीजा बड़ी प्रतियोगिताओं में देखने को नहीं मिला है.

घरेलू मैदान पर हुए विश्व कप में इस टीम से उम्मीद थी कि वो अतीत को भूलकर नया अध्याय शुरू करेगी.

सालों से भारत का खेल दोयम दर्जे का रहा है. इस बार मौका भुनाने की उम्मीद थी. उन्हें भीड़ का समर्थन हासिल था और घरेलू वातावरण उनके अनुकूल था. हालांकि विश्व कप से पहले कई उठापटक हुए. मशहूर सरदार सिंह ने हॉकी को अलविदा कह दिया और तजुर्बेकार एस. वी. सुनील और रुपिन्दर पाल सिंह टीम से बाहर रहे, फिर भी इस प्रतियोगिता में भारत से कुछ कर दिखाने की उम्मीद थी.

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विश्व कप का आगाज़

भारत ने विश्व कप अभियान की शुरुआत शानदार प्रदर्शन के साथ की. दक्षिण अफ्रीका को 5-0 से हराने के बाद विश्व की नम्बर 3 टीम बेल्जियम के साथ कड़े मुकाबले में 2-2 से मैच बराबरी पर छूटा. फाइनल पूल मैच में उन्होंने कनाडा को 5-1 से शिकस्त देकर सीधे क्वार्टरफ़ाइनल में प्रवेश किया.

अब उनके सामने करो या मरो की स्थिति थी. हॉलैंड के साथ इस मुकाबले पर टीम के 18 खिलाड़ियों के अलावा देश की एक अरब से अधिक जनता की उम्मीदें टिकी थीं.

43 साल पहले हासिल किये गए मुकाम से भारतीय टीम सिर्फ़ 60 मिनट की दूरी पर थी. ये मुकाम था एक बड़ी प्रतियोगिता के सेमीफ़ाइनल में सीट पक्की करना.

लक्ष्य मुश्किल नहीं था. भारतीय डिफेंटर अभेद्य दीवार की तरह डटे रहे और युवा फॉरवर्ड परिपक्वता के साथ और ठंडे दिमाग से गोलियों की रफ़्तार का अहसास कराते रहे.

क्वार्टरफ़ाइनल से पहले कुछ डच पत्रकारों ने भारतीय टीम के अभ्यास का घंटों निरीक्षण किया और मेरे अलावा कुछ अन्य भारतीय पत्रकारों से बातचीत भी की. क्योंकि उन्हें भारतीय टीम के रूप में एक भारी ख़तरा नज़र आ रहा था.

भारतीय कप्तान मनप्रीत सिंह सारे विचार-विमर्श के केंद्र में थे. डच कोच और खिलाड़ी इस मैच को 50-50 प्रतियोगिता मान रहे थे.

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हॉलैंड ने कैसे पलटी बाजी

भारत ने क्वार्टरफ़ाइनल का अभियान उम्मीद के अनुरूप शुरू किया. लगभग सभी विभागों में वो हॉलैंड के साथ बराबरी पर थी और कुछ मामलों में उनसे बेहतर थी. आश्चर्य से भरे डच सोच रहे थे कि क्या आज की रात भारत एक नया इतिहास रचने वाला है?

कलिंगा स्टेडियम में मौजूद 15000 दर्शकों का उत्साह पहले आधे घंटे तक देखने लायक था. आकाशदीप सिंह ने 12वें मिनट में ही भारत को बढ़त दिला दी, जब उन्होंने एक ताकतवर रिवर्स शॉट को गोल में तब्दील कर दिया. लेकिन तीन मिनट बाद ही थेरी ब्रिंकमैन ने हॉलैंड को बराबरी पर ला खड़ा किया. फिर भी बढ़त भारत के पक्ष में दिख रहा था.

लेकिन आधे समय के बाद मैच का रंग बिलकुल बदल गया. डच टीम ने भारत को शिकस्त देने का नुस्खा ढूढ़ निकाला. सेंटर में जगह निकालना और भारतीय रफ़्तार के सामने टिक पाना उनके लिए नामुमकिन था. ऐसे में हॉलैंड के कोच और एक चतुर रणनीतिकार मैक्स काल्डास ने अपने खिलाड़ियों से कहा कि वो भारत की रफ़्तार धीमी करें और बॉल को अपने पास अधिक समय तक रखें.

भारत को तेज़ रफ़्तार से आगे बढ़ने का मौका देने के बजाय डच कोच ने अपने खिलाड़ियों को ज़्यादा से ज़्यादा पास देने की रणनीति अपनाने को कहा. उन्हें भरोसा था कि ऐसे में भारत टीम ज़रूर ग़लतियां करेगी.

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रणनीतिक चूक

इस रणनीति के सामने भारत टीम चूक गई. मैच की तीसरी चौथाई तक वो डच टीम का किसी तरह सामना करती रही, जब खिलाड़ी एक-दूसरे को गेंद पास कर रहे थे और भारतीय खिलाड़ी बॉल के पीछे अंधाधुंध भाग रहे थे. लेकिन मैच की अंतिम चौथाई में उनसे चूक हो ही गई.

जिस वक्त भारत को पूरा ज़ोर लगा देना था, टीम में तजुर्बे का अभाव और कोचिंग दल के पास विचारों की कमी घातक साबित हुई. 15 मिनट में ही मैच हाथ से निकल गया.

ऐसे समय में कोच हरेंद्र सिंह को नई योजना बनाकर लागू करनी चाहिए थी, लेकिन योजना के अभाव में खिलाड़ी दबाव में आ गए.

हॉलैंड के दूसरा गोल दागने के बाद अमित रोहिदास को पीले कार्ड दिखा दिया गया और मैदान में सिर्फ़ 10 खिलाड़ी रह गए. दूसरी ओर हॉलैंड लगातार दबाव बनाए रहा और मैच पर उसका कब्जा हो गया. एक बड़ी प्रतियोगिता में जीत हासिल करने का भारत सपना एक बार फिर सपना रह गया.

जहां तक युवा खिलाड़ियों का सवाल है तो उन्होंने जी-जान लगा दी और बेहतरीन खेल का प्रदर्शन किया. लेकिन तजुर्बे का अभाव और दबाव में बेवजह की गई ग़लतियां टीम पर भारी पड़ गईं.

इस मुकाम पर भारतीय कोचिंग टीम - उत्कृष्ट नतीजे देने वाले निदेशक डेविड जॉन, कोच हरेंद्र सिंह, आकलन कोच क्रिस सीरेलो, वैज्ञानिक सलाहकार रोबिन आर्केल तथा अन्य लोगों को दखल देने की ज़रूरत थी. उन्हें तय करना था कि भारत को दूर होते पोडियम को नजदीक लाने के लिए क्या उपाय किये जा सकते हैं.

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Image caption भारतीय हॉकी टीम, कप्तान मनप्रीत सिंह, कोच हरेंद्र सिंह

क्या कहते हैं कोच?

कोच हरेंद्र सिंह ने कहा कि वो खिलाड़ियों के प्रदर्शन से संतुष्ट हैं लेकिन विश्व कप मैच में "भारत की उम्मीदों पर पानी फेरने के लिए" उन्होंने अम्पायरों को दोषी ठहराया.

"हमारे पास मौका था. हमारे पास कुछेक बेहतरीन मौके थे." हरेन्द्र सिंह ने कहा. "हमने मौका गंवाया और हॉलैंड ने भी. क्योंकि दोनों टीम भारी दबाव में खेल रही थीं. कभी आप सही जगह पर नहीं होते थे तो कभी आपका स्टिक सही जगह पर नहीं होता था. जिस प्रकार लड़कों ने बिना गोलकीपर के प्रदर्शन किया, जो आपने भी देखा, मैं अपने खिलाड़ियों को सलाम करता हूं."

जहां तक अम्पायरों का सवाल है, तो रोहिदास को पीला कार्ड देने के लिए कोच ने उन्हें दोषी ठहराया. उनके हिसाब से ये सज़ा ज़रूरत से ज़्यादा थी. लेकिन इस समय भारतीय रणनीतिकारों के लिए बेहतर होगा कि वो अपनी खामियों पर ध्यान केंद्रित करें, फॉरवर्ड से बेहतर नतीजे पाने और भविष्य की योजना बनाने में ध्यान लगाएं.

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सकारात्मक बातें

सच्चाई ये है कि विश्व रैंकिंग में पांचवां स्थान होने के बावजूद भारत को अब भी हॉलैंड, बेल्जियम, ऑस्ट्रेलिया और जर्मनी के मुकाबले उतना महत्त्व नहीं दिया जाता. उन्हें बड़े मैच जीतने और लगातार नतीजे देने की ज़रूरत है.

वास्तव में, भारत ने विश्व कप में बेहतरीन खेल की चिनगारी दिखाई, लेकिन ये देखना महत्त्वपूर्ण है कि इस चिनगारी को 2020 के टोक्यो ओलम्पिक में आग में कैसे बदला जा सकता है.

विश्व कप में कई सकारात्मक बातें देखने को मिलीं, लेकिन कई खामियां भी दिखीं, जिन्हें दूर करना ज़रूरी है.

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