बुमराह-शमी-ईशांत: ये हैं वर्ल्ड क्रिकेट का नंबर वन तूफ़ान

  • 31 दिसंबर 2018
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मेलबर्न टेस्ट में भारत की ज़ोरदार जीत के साथ बहुत कुछ ऐसा हुआ है जो इससे पहले भारतीय क्रिकेट में कभी नहीं हुआ था.

पहली बार भारत बाक्सिंग डे पर शुरू हुए टेस्ट में ऑस्ट्रेलिया को हराने में कामयाब रहा. भारत ने पहली बार ऑस्ट्रेलियाई जमीं पर किसी सिरीज़ में दो टेस्ट जीतकर सिरीज़ में बढ़त बनाई है. इससे पहले 1977-78 में भारत ने दो टेस्ट ज़रूर जीते थे, लेकिन पहले दो टेस्ट मैचों में हार झेलने के बाद टीम बराबरी पर पहुंच थी.

टेस्ट मैचों में भारत की 150वीं जीत, व्यक्तिगत रिकॉर्ड के मामले में जसप्रीत बुमराह, ऋषभ पंत और विराट कोहली के लिए भी बेहद ख़ास साबित हुई. अभी इस सिरीज़ का फ़ैसला होना है लेकिन मेलबर्न में जीत के साथ ये साफ़ हो चुका है कि भारत यहां से सिरीज़ हारेगा नहीं.

लेकिन ये सिरीज़ भारतीय क्रिकेट में केवल इन रिकॉर्ड्स के लिए नहीं याद की जाएगी. ये सिरीज़ या कहें पूरा साल ही टेस्ट क्रिकेट में भारतीय तेज़ गेंदबाज़ों का साल साबित हुआ है. मेलबर्न में भारत की जीत की हीरो भले जसप्रीत बुमराह रहे हों लेकिन ये भी देखना होगा कि मोहम्मद शमी और ईशांत शर्मा के साथ ने उनकी गेंदबाज़ी को कहीं ज्यादा मारक बना दिया.

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तिकड़ी ने तोड़ा 34 साल पुराना रिकॉर्ड

जसप्रीत बुमराह, मोहम्मद शमी और ईशांत शर्मा केवल इस सिरीज़ के हीरो नहीं रहे हैं बल्कि आप 2018 के पूरे साल में इनका प्रदर्शन देख लीजिए- जसप्रीत बुमराह ने नौ टेस्ट में इस साल 48 विकेट लिए हैं, इकॉनमी महज 2.65 रही है, वहीं मोहम्मद शमी ने 12 टेस्ट मैचों में 47 विकेट चटकाए जबकि इन दोनों से कहीं ज़यादा अनुभवी ईशांत शर्मा ने 11 टेस्ट मैचों में 41 विकेट चटकाए हैं.

यानी इन तीनों गेंदबाज़ ने इस साल 136 टेस्ट विकेट चटकाए. टेस्ट क्रिकेट में इससे पहले तेज़ गेंदबाज़ों की तिकड़ी का ऐसा ख़ौफ़ पहले कभी नहीं देखा गया, कम से कम भारतीय गेंदबाज़ों के लिए ये सपने सरीखा था.

अब इसकी अहमयित समझनी हो तो साल 1984 में जाना होगा, जब वेस्टइंडीज़ के गेंदबाज़ जोएल गॉरनर, माइकल होल्डिंग और मैल्कम मार्शल का जलवा पूरी दुनिया में छाया था. इन तीनों गेंदबाज़ ने 1984 में 130 विकेट चटकाए थे. उनके इस रिकॉर्ड के करीब 2008 में दक्षिण अफ्रीका के मॉर्नी मोर्कल, मखाया एनटिनी और डेल स्टेन ही पुहंच पाए थे, तब इन तीनों ने एक साल में 123 विकेट हासिल किए थे.

जसप्रीत बुमराह, मोहम्मद शमी और ईशांत शर्मा के इस साल के प्रदर्शन ने इन दिग्गज गेंदबाज़ों को पीछे छोड़ दिया है. भारतीय क्रिकेट में इन गेंदबाज़ों के योगदान के बारे में मेलबर्न टेस्ट में जीत के बाद विराट कोहली ने जो कहा वो भी ध्यान देने लायक है. कोहली ने कहा, "गेंदबाज़ों की मीटिंग में मैं चुपचाप बैठा रहता हूं और सुनता रहता हूं."

कोहली ने ये भी कहा है कि इन मीटिंग को 'हमारे गेंदबाज़ डिक्टेट करते रहते हैं और वे बताते हैं कि हम किस तरह से टेस्ट मैच जीत सकते हैं और इस साल के नतीजे में आप ये सब देख सकते हैं.'

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इंडिया के सुपर सिक्स

भारतीय गेंदबाज़ों और वो भी तेज़ गेंदबाज़ों की ऐसी हैसियत होगी, ये शायद ही किसी ने सोचा होगा. वैसे इस वक्त भारतीय क्रिकेट के पास केवल जसप्रीत बुमराह, मोहम्मद शमी और ईशांत शर्मा भर नहीं हैं. इन तीनों को बराबरी का टक्कर देने वाले उमेश यादव और भुवनेश्वर कुमार भी मौजूद हैं. इनके अलावा मिले मौकों पर गति के मामले में हार्दिक पांड्या भी इनसे होड़ लेते नज़र आते हैं.

यानी इस समय में कम से कम छह गेंदबाज़ हैं, जो एक दूसरे को रिप्लेस करने का दमखम रखते हैं. इसलिए दुनिया भर के क्रिकेट विश्लेषक भारतीय तेज़ गेंदबाज़ों के आक्रमण को सर्वश्रेष्ठ बता रहे हैं. 2018 में औसत स्पीड के लिहाज से भी भारतीय गेंदबाज़ नंबर एक साबित हुए हैं, भारत के गेंदबाज़ों ने पूरे साल 136 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ़्तार से कहीं तेज़ गेंदबाज़ी की है.

इसे आप भारतीय क्रिकेट का सबसे सुनहरा दौर कह सकते हैं. नहीं तो 1932 में टेस्ट क्रिकेट में शुरुआत करने के बाद भी भारतीय टेस्ट टीम मैच जिताने वाले तेज़ गेंदबाज़ों का रोना रोती रही थी. 1932 में भारत के पहले टेस्ट मैच में मोहम्मद निसार के रूप में भारत को तेज़ गेंदबाज़ ज़रूर मिला था, लेकिन जो महज छह टेस्ट मैच खेल पाए.

जब अकेले लड़ते थे कपिल

इसके बाद भारतीय क्रिकेट में कपिल देव के तौर पर तेज़ गेंदबाज़ रूपी झोंका आते आते तक कैलेंडर में साल 1978 आ चुका था. हालांकि बीच में भारतीय क्रिकेट को मदन लाल ज़रूर मिल गए थे, लेकिन वो तेज़ गेंदबाज़ नहीं थे.

1983 के वर्ल्ड कप में कपिल देव की अगुवाई में मदन लाल, रोजर बिन्न, मोहिंदर अमरनाथ और बलविंदर संधू जैसे गेंदबाज़ों का जादू ज़रूर चला लेकिन इन सबमें कपिल इकलौते तेज़ गेंदबाज़ थे, जो भारतीय पिचों पर पसीना बहाते बहाते थोड़ी जल्दी ही अपनी ढलान की ओर बढ़ रहे थे.

इस बीच 1982-83 में तबके मद्रास से निकले टीए शेखर में लोगों ने थोड़ी उम्मीद देखी थी पर वे दो टेस्ट और चार वनडे से आगे नहीं बढ़ पाए. 1984 में चेतन शर्मा और मनोज प्रभाकर के तौर पर ज़रूर दो तेज़ गेंदबाज़ों ने भारतीय क्रिकेट में दस्तक दी लेकिन इन दोनों में से कोई कपिल की जगह भरने वाला साबित नहीं हो पाए.

फिर 90 के दशक में तो भारतीय क्रिकेट में तेज़ गेंदबाज़ झोंके की भांति आते गए और ग़ायब होते रहे. एक तो अभी के गेंदबाज़ी कोच भरत अरुण ही रहे, फिर बाएं हाथ के तेज़ गेंदबाज़ राशीद पटेल भी आए जो अपने एक टेस्ट के लिए कम और घरेलू क्रिकेट में रमन लांबा के साथ मारपीट के लिए ज़्यादा चर्चित हुए.

संजीव शर्मा, विवेक राजदान, सलिल अंकोला, अतुल वासन, सुब्रतो बनर्जी, ये सब आए भी और गए और कपिल देव इन सबके बीच खुद को घसीटते रहे. लेकिन 1991 में भारतीय क्रिकेट को जवागल श्रीनाथ मिले जो कपिल देव की जगह भरने में काफी हद तक कामयाब रहे.

तेज़ गेंदबाज़ों की बढ़ती संख्या की एक वजह ये भी थी कि चेन्नई में एमआरएफ़ पेस फाउंडशेन बन चुका था और भारतीय युवाओं को तेज़ गेंदबाज़ी के गुर सिखाने के लिए डेनिस लिली जैसा दमदार गेंदबाज़ भी भारत आ चुका था.

भारत में तेज़ गेंदबाज़ों की पौध खड़ी करने में इस फाउंडेशन का योगदान इतना अहम है कि यहां से निकले 18 तेज़ गेंदबाज़ टीम इंडिया के दरवाजे तक पहुंचे हैं. इनमें श्रीनाथ, वेंकटेश प्रसाद, ज़हीर ख़ान, इरफ़ान पठान, मुनाफ़ पटेल और श्रीसंत शामिल हैं.

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कुंबले से भी धीमे थे कई तेज़ गेंदबाज़

एमआरएफ़ फाउंडेशन से इतर भी भारत में तेज़ गेंदबाज़ों को प्रमोट करने की तमाम कोशिशें शुरू हुईं हालांकि इन कोशिशों पर भारतीय की बेजान पिचें पानी फेरती रहीं.

कपिल ने 1994 में 434 विकेटों के शिखर पर जब संन्यास लिया तब जवागल श्रीनाथ तैयार हो चुके थे. श्रीनाथ अपनी तेजी से जगह बनाने में ज़रूर कामयाब हुए लेकिन समय के साथ खुद को बेहतर और मारक गेंदबाज़ के तौर पर डेवलेप करने में वे पिछड़ गए.

उनका साथ देने के नाम पर वेंकटेश प्रसाद, पारस महाम्ब्रे, डेविड जॉनसन, डोडा गणेश, अभे कुरुविला, प्रशांत वैद्या, आशीष विंस्टन जैदी, देबाशीष मोहंती और हरविंदर सिंह जैसे गेंदबाज़ आए. इनमें वेंकटेश प्रसाद ही थोड़े लंबे समय तक टिक पाए लेकिन उनसे तेज़ गेंदें तो अनिल कुंबले भी फेंक देते थे.

फिर एक दौर अजीत अगरकर और आशीष नेहरा का भी आया. ये दोनों उपयोगी गेंदबाज़ ज़रूर थे लेकिन उनका खौफ़ विपक्षी बल्लेबाज़ों पर कभी नहीं दिखा. ऐसे में 2000 में ज़हीर ख़ान भारतीय क्रिकेट में एक नई उम्मीद की तरह आए और अगले 14 साल तक वे भारतीय क्रिकेट के सबसे भरोसेमंद गेंदबाज़ रहे.

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ज़हीर के बाद टी योहानन और इरफ़ान पठान भी टीम में आए, पठान ने तो बतौर तेज़ गेंदबाज़ टेस्ट क्रिकेट में हैट्रिक भी ली लेकिन वे आलराउंडर की भूमिका निभाते निभाते तेज़ गेंदबाज़ वाली चमक खोते गए.

2006 में आरपी सिंह, श्रीसंत, मुनाफ़ पटेल और वीआरवी सिंह जैसे तेज़ गेंदबाज़ आए. सधे हुए एक्शन और बला की तेजी वाले श्रीसंत इन सबमें सबसे ज़्यादा बेहतरीन गेंदबाज़ ज़रूर थे लेकिन वे अपना फोकस खेल के मैदान पर टिकाए नहीं रख पाए.

2007 में ईशांत शर्मा आए और बीते 11 साल में उन्होंने कई मौकों पर खुद को साबित किया है, हालांकि कई बार आउट ऑफ़ फॉर्म भी रहे हैं लेकिन ईशांत बने हुए हैं.

इस बीच जयदेव उनादकट, प्रवीण कुमार, आर विनय कुमार, वरुण एरॉन और पंकज सिंह जैसे गेंदबाज़ों ने भी चमक बिखेरी. वरुण एरॉन को तो एक समय में उमेश यादव से बेहतर गेंदबाज़ माना गया था.

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2011 में उमेश यादव और 2013 में मोहम्मद शमी- भुवनेश्वर कुमार ने टीम इंडिया से जुड़ने के बाद उस आधार को जमाने में काफ़ी पसीना बहाया है जहां से भारतीय गेंदबाज़ी का वो आधार बना जिसमें 2018 में जब बुमराह का साथ मिला तो भारतीय गेंदबाज़ी उस मुकाम पर पहुंच गई जहां उसे दुनिया में सर्वश्रेष्ठ माना जा रहा है.

भारतीय क्रिकेट में तेज़ गेंदबाज़ी पहली बार इस मुकाम तक पहुंची है, लिहाजा अभी से भविष्य की चिंता तो नहीं होनी चाहिए हक़ीक़त भी यही है कि अभी तो आस पास दमदार गेंदबाज़ मौजूद हैं, तो ये माना जाना चाहिए कि आने वाले दिनों में वर्ल्ड क्रिकेट में भारतीय तेज़ गेंदबाज़ों का डंका बजता रहेगा.

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