बिहारः गाँव से निकलकर खेल के मैदान में परचम लहराने वाली लड़कियां

  • 17 फरवरी 2019
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Image caption ममता, काजल, निशा और गायत्री (बाएं से)

सिवान शहर से गोरखपुर जाने वाले स्टेट हाइवे पर क़रीब पंद्रह किलोमीटर आगे बढ़ने और फिर लक्ष्मीपुर के पास पक्की सड़क से उतर कर क़रीब दो किलोमीटर गाँव के अंदर जाने के बाद जो हलचल दिखी उससे आंखें खुली रह गईं.

पीले-हरे सरसों के खेतों के बीच एक बड़े से मैदान के अलग-अलग हिस्सों में रानी लक्ष्मीबाई स्पोर्ट्स एकेडेमी की दर्जनों लड़कियां फुटबॉल और हैंडबॉल की प्रैक्टिस कर रही थीं.

खेल में बहुत पिछड़ा माने जाने वाले सूबे में एक साथ इतनी लड़कियों को खेलों के गुर सीखते देखना और ज्यादा रोमांचित कर रहा था.

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इस एकेडेमी की लड़कियां आज गांवों से निकलकर राष्ट्रीय ही नहीं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेल के मैदान में बिहार का परचम लहरा रही हैं.

यहां की खिलाड़ी भारतीय टीम की कप्तान बन रही हैं. विदेशों में जाकर भारत का प्रतिनिधित्व कर रही हैं.

यहां की फ़ुटबॉल टीम की क़रीब दस लड़कियां अलग-अलग आयु वर्ग की बिहार टीम का लगातार हिस्सा रही हैं.

जिन्होंने अपने गाँव और बिहार का नाम रोशन किया

यही स्थिति हैंडबॉल टीम की भी है. यहां खेल के हुनर सीखने वाली ज्यादातर लड़कियां बेहद ही साधारण परिवारों से ताल्लुक़ रखती हैं.

किसी के पिता साइकिल मिस्त्री हैं तो किसी के इलेक्ट्रीशियन तो कोई किसान की बेटी हैं.

तीन भाइयों और दो बहनों में सबसे छोटी निशा कुमारी एकेडेमी में ट्रेनिंग लेने रोज़ अपने गाँव सिमरपुर से दो किलोमीटर साइकिल चला कर आती हैं.

वह 2014 में इस एकेडेमी से जुड़ी और यहां मिली ट्रेनिंग की बदौलत ही निशा एक साल के अंदर भारतीय अंडर-14 महिला फ़ुटबॉल टीम का हिस्सा बन गईं.

साल 2015 में उन्होंने काठमांडू जाकर भारत का प्रतिनिधित्व भी किया. हालाँकि यह टूर्नामेंट उस साल नेपाल में आए विनाशकारी भूकंप के कारण बीच में ही रोक देना पड़ा था.

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नेशनल टीम का हिस्सा

मशहूर फ़ुटबॉलर रोनाल्डो निशा को सबसे ज्यादा पसंद हैं. ग्यारहवीं में पढ़ने वाली निशा जब पहली बार काठमांडू से अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट खेल के गाँव लौटी तो वह दिन उनके लिए यादगार बन गया.

वो याद करती हैं, "घर और पूरे गाँव के लोग बहुत ख़ुश थे कि उनके यहाँ की एक लड़की ने गाँव और बिहार का नाम रोशन किया है."

हैंडबॉल खिलाड़ी काजल कुमारी की कहानी थोड़ी अलग है. वो मुज़फ्फ़रपुर के गोरौल इलाक़े से यहां आकर ट्रेनिंग हासिल कर रही हैं.

उनके पिता एक निजी स्कूल के प्रभारी हैं. काजल मुज़फ्फ़रपुर में जिस स्कूल में पढाई करती थीं, वहां प्रैक्टिस कि सुविधा नहीं थी.

काजल ने इस स्पोर्ट्स एकेडेमी का बहुत नाम सुन रखा था तो ऐसे में वह स्पोर्ट्स में आगे बढ़ने के लिए मुज़फ्फ़रपुर से लक्ष्मीपुर आ गईं.

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प्रैक्टिस करने का मौक़ा

बारहवीं की स्टूडेंट काजल बिहार जूनियर हैंडबॉल टीम का हिस्सा हैं और नेशनल टीम का हिस्सा बनना चाहती हैं.

काजल ने हरियाणा, तेलंगाना, महाराष्ट्र जैसे राज्यों में हुए टूर्नामेंट्स में बिहार हैंडबॉल टीम का प्रतिनिधित्व किया है.

वह बताती हैं, "यहां आकर बहुत फ़ायदे हुए हैं. यहां सुबह-शाम एक टीम के साथ प्रैक्टिस करने का मौक़ा मिलता है. यहाँ ध्यान देने वाले कोच हैं."

"बिहार को हैंडबॉल में मेडल मिलता है तो सिवान के दम पर ही मिलता है. खेल के साथ-साथ यहां हमारी पढ़ाई का भी ध्यान रखा जाता है."

"यहाँ अनुशासन है और अच्छी देख-रेख मिलती है. हमें जो नहीं आता है वह सीनियर दीदी सिखाती हैं."

'पुरुष पहलवान हमें लड़का समझ लेते हैं'

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Image caption संजय पाठक

खिलाड़ियों को तराशने वाले टीचर संजय

फ़ुटबॉलर ममता कुमारी एकेडेमी से क़रीब सात किलोमीटर दूर गाँव सिसवां झुर्द की रहने वाली हैं.

वो अंडर-16 और अंडर-18 भारतीय महिला फ़ुटबॉल टीम के इंडिया कैंप का हिस्सा रही हैं.

उन्होंने बताया, "मैंने सोचा कि जब दूसरी लड़कियां खेल सकती हैं तो मैं क्यों नहीं खेल सकती."

"मेरे गाँव से तब कोई लड़की स्पोर्ट्स में आगे नहीं आई थी. ऐसे में मैंने अपने गाँव का नाम रोशन करने के लिए खेलना शरू किया."

चाहे निशा हो या ममता या कोई और खिलाडी, इन सबको तराशने और इस मक़ाम तक पहुंचाने में काफ़ी योगदान संजय पाठक के जोश और जुनून का है.

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ग्रामीण प्रतिभाओं को प्लेटफ़ॉर्म

पेशे से शिक्षक संजय के सफ़र की शुरुआत क़रीब दस साल पहले तब हुई जब उनका तबादला मैरवा के आदर्श राजकीय मध्य विद्यालय में हो गया.

यहां उन्हें तारा ख़ातून और पुतुल कुमारी जैसे दो स्टूडेंट मिले जिन्हें वे पहली बार किसी टूर्नामेंट में खेलने ले गए.

संजय बताते हैं, "प्रखंड स्तरीय पंचायत युवा क्रीड़ा अभियान में इन दोनों ने दौड़ प्रतियोगिता में बेहतर प्रदर्शन किया और आगे जाकर ये दोनों राज्य स्तरीय टीम का भी हिस्सा बनीं."

"इतना ही नहीं 2014 में तारा ख़ातून और अर्चना कुमारी ने फ्रांस में हुए स्कूल स्तरीय फ़ुटबॉल वर्ल्ड कप में भी हिस्सा लिया था."

इस सफल शुरुआत के बाद संजय ने ग्रामीण प्रतिभाओं को प्लेटफ़ॉर्म देने की योजना पर काम शुरू हुआ.

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स्पोर्ट्स एकेडेमी की शुरुआत

सबसे पहले उन्होंने अपने स्कूल के लड़के और लड़कियों की अलग-अलग फ़ुटबॉल टीम बनाई.

लड़कियों की टीम बनाते हुए उन्हें जहां एक ओर लड़कियों के परिवार वालों का समर्थन और सहयोग मिला तो दूसरी ओर समाज के रूढ़ीवादी लोगों की आलोचना भी झेलनी पड़ी.

फिर अपनी कोशिशों को व्यवस्थित रूप देते हुए संजय ने साल 2010 के नवंबर में रानी लक्ष्मीबाई स्पोर्ट्स एकेडेमी की शुरुआत की.

और बिहार स्पोर्ट्स एसोसिएशन से अपनी फ़ुटबॉल टीम को पंजीकृत भी कराया. शुरुआत संजय ने अपने स्कूल में ही ट्रेनिंग देने से की.

मगर स्कूल के मैदान में आस-पास के लड़के आकर प्रैक्टिस करने वाली लड़कियों के साथ छेड़छाड़ करने के साथ-साथ उन्हें कई दूसरे तरीक़ों से परेशान करने लगे.

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स्पोर्ट्स कल्चर

दिलचस्प यह भी संजय ख़ुद न तो प्रशिक्षित खिलाड़ी रहे हैं और न ही कोच.

मुख्य रूप से सिवान ज़िले के अलग-अलग प्रखंडों की इक्कीस लड़कियां यहां रहकर खेल की बारीकियां सीखते हुए स्कूल की पढ़ाई भी कर रही हैं.

संजय के मुताबिक़ इन इक्कीस लड़कियों को मिलाकर क़रीब सौ की संख्या में खिलाड़ी यहाँ सुबह और शाम में प्रशिक्षण हासिल करते हैं जिनमें क़रीब दो तिहाई लड़कियां हैं.

ये लड़कियां आस-पास के गांवों से यहाँ आकर फ़ुटबॉल और हैंडबॉल का प्रशिक्षण हासिल करती हैं.

हफ्ते में दो दिन यहां हॉकी की भी ट्रेनिंग मिलती है. यहाँ के कई खिलाड़ियों को रेलवे, बिहार पुलिस जैसी जगहों पर सरकारी नौकरी भी मिली है.

संजय की शुरुआत के बाद आस-पास के इलाक़ों में भी स्पोर्ट्स कल्चर पैर जमा रहा है.

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सरकारी मदद ज़रूरी

इस एकेडेमी की अमृता कुमारी अंडर-16 भारतीय महिला फ़ुटबॉल टीम की कप्तान भी रहीं और उन्होंने 2016 में ढाका में भारतीय टीम की अगुवाई की थी.

एकेडेमी के खिलाड़ियों की सफलता में बिहार सरकार की साइकिल योजना का भी हाथ है.

जैसा कि संजय कहते हैं, "अगर इन लड़कियों के पास सरकार से मिली साइकिल नहीं होती तो वो दूर-दराज़ के गांवों से आकर प्रैक्टिस नहीं कर पातीं. क्यूंकि ग्रामीण इलाक़े में यहाँ तक आने का कोई दूसरा साधन नहीं है. यहाँ पंद्रह किलोमीटर दूर से भी लड़कियां साइकिल चलाकर आती हैं. करियर बनाने में साइकिल का बड़ा योगदान है."

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फ़ुटबॉल में आगे बढ़ने के लिए निशा कुमारी को अच्छे ग्राउंड, जिम जैसी सुविधाओं की कमी खलती है. वह चाहती हैं कि सरकार की तरफ़ से ये सारी सुविधाएँ मुहैया कराई जाएं.

हैंडबॉल की खिलाड़ी काजल को यह कमी बहुत खलती है कि जब वह बिहार से बाहर खलेने जाती हैं तो उन्हें प्रशिक्षित महिला कोच का साथ नहीं मिल पता है.

साथ ही उन्हें और बाक़ी दूसरे खिलाडियों को अच्छे किट और दूसरे स्पोर्ट्स वियर न मिलने का भी मलाल है. खिलाड़ियों के मुताबिक़ इन कमियों के कारण वह अपना बेहतरीन प्रदर्शन नहीं कर पाती हैं. उनकी ये भी शिकायत है कि मेडल जीत कर लाने पर भी बिहार सरकार हरियाणा और कुछ दूसरे राज्यों की तरह प्रोत्साहन और मदद नहीं करती है.

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