India vs Pakistan: 'जब पाकिस्तान हारता है तो लगता है क़यामत आ गई'

  • 16 जून 2019
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भारत और पाकिस्तान के बीच क्रिकेट मैच का आयोजन एक बड़ा मौका होता है, जिसे दुनिया भर में टीवी पर ही एक अरब से अधिक लोग देखते हैं. आम तौर पर मैदान और बाहर दोनों जगहों पर इसे लेकर थोड़ा भावुक माहौल होता है.

हालांकि इन दिनों दोनों देशों के बीच मुकाबला बहुत आम नहीं है लेकिन विश्वकप के दौरान इस रविवार को ओल्ड ट्रैफ़ोर्ड में दोनों टीमें आमने सामने होंगी.

लेकिन ब्रिटेन में रहने वाले एशियाई लोगों के लिए ये मुकाबला कैसा है?

बीबीसी एशियन नेटवर्क के अंकुर देसाई, कॉमेडियन आतिफ़ नवाज़ और बीबीसी गेट इंस्पायर्ड के कल साजाद ने एक पोडकास्ट कार्यक्रम द दूसरा में अपने अनुभव साझा किए.

अंकुर देसाई भारतीय टीम के प्रशंसक

ब्रिटेन में बड़े होने का मतलब है कि एक पिता अपने बेटे को फ़ुटबॉल ही पकड़ाता है. लेकिन भारत से आने वाले मेरे पिता ने मुझे क्रिकेट बैट पकड़ाया.

भारतीय फ़ुटबॉल में बहुत अच्छे नहीं हैं, लेकिन दूसरी ओर सचिन तेंदुलकर को देखकर मुझे गर्व होता था, जोकि मेरे जैसे दिखते थे और ऐसे व्यक्ति थे जिनके साथ मैं अपनी पहचान जोड़ सकता था.

जब इंग्लैंड में 1999 में विश्वकप के दौरान भारत-पाकिस्तान के बीच मैच हुआ था तो मैं छह साल का था. ये मैच भी ओल्ड ट्रैफ़ोर्ड में ही हुआ.

मैं और मेरे दोस्त खुद को बहादुर समझते हुए इंडिया की टीशर्ट पहनकर कॉलेज पहुंचे. कॉलेज में बहुत सारे पाकिस्तानी छात्र थे.

मेरे टीचर ने कहा था, "बिना पिटे शहर के कुछ ख़ास इलाकों से गुजरने के लिए शुभकामनाएं." लेकिन सच्चाई ये थी कि ये प्रतिद्वंद्विता दोस्ताना थी. मैं ल्यूटन इंडियन्स टीम के लिए ल्यूटन पाकिस्तानी और ल्यूटन कैरिबियन्स के ख़िलाफ़ खेल चुका हूं.

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हालांकि पिच पर प्रतिद्वंद्विता तीखी होती है, लेकिन जो सबसे मुझे पसंद आता था, वो मैच के बाद एक साथ बैठना और भोजन करना.

मैं रविवार का इंतज़ार नहीं कर सकता. जब मैच के कार्यक्रम की घोषणा हो जाती है तो आप सबसे पहले उसे देखते हैं. आपकी पूरी ऊर्जा फिर इसी पर केंद्रित होती है.

एशियन नेटवर्क के लिए कवर करना एक बहुत बड़ी बात होती है. मैंने विम्बलडन, फ़ुटबाल का एफ़ए कप और चैंपियंस लीग के फ़ाइनल को कवर किया है लेकिन इंडिया और पाकिस्तान मैच की अलग ही बात है.

जो माहौल होता है, जो मौका होता है, वो बहुत बड़ा होता है और इसमें बहुत सारे ब्रिटिश एशियन लोग मौजूद होते हैं और आपको एहसास होता है कि ये कुछ अलग है, कुछ खास है.

स्टेडियम में भारी शोर सुनाई देता है और आपको ये माहौल महसूस होता है. आपको लगता है कि आप किसी अनोखे कार्यक्रम में मौजूद हैं.

अगर आप विश्व कप नहीं जीत पाते हैं तो आप पाकिस्तान को हराना चाहते हैं. मेरे लिए ये इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया या किसी और को हराने से ज्यादा अहम होता है.

लेकिन जैसे जैसे मैं बड़ा हुआ, ये एहसास भी थोड़ा कम होता गया है. अब उत्सुकता अधिक होती है क्योंकि हम एक दूसरे से बहुत कम खेल पाते हैं, इसलिए इसका प्रचार भी बहुत होता है.

पाकिस्तानी टीम इतनी शानदार खेलती है कि उन्हें खेलते देखना जोश से भर देता है.

आजकल टूर्नामेंट को जीतना, पाकिस्तान को हराने से ज़्यादा अहम बन गया है. अब ये उन जीतों को हासिल करना ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है.

जब इंग्लैंड के पश्चिम में ये मैच हो तो और बढ़िया होता है. यहां पाकिस्तानी प्रशंसक बहुत हैं. आम तौर पर भारतीय प्रशंसक अधिक से अधिक टिकट खरीदते हैं, इसलिए यहां प्रशंसकों की संख्या लगभग बराबर होती है.

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पाकिस्तानी टीम के समर्थक- आतिफ़ नवाज़

जब भी पाकिस्तान भारत के साथ खेलता है मैं फिर से 15 साल का हो जाता हूं, मैं स्कूल के दिनों में पहुंच जाता हूं और खुद को दोस्तों से घिरा महसूस करता हूं.

कौन जीतता है, किसकी रैंकिंग ऊंची है, कौन सेमी फ़ाइनल में जाता है, इन सबसे उपर एक एहसास होता है. ये शब्दों की लड़ाई जैसा होता है. इसका स्तर अलग ही होता है, बहुत ही डरावना भी.

1999 के वर्ल्ड कप के मैच में हमने क्लासरूम टीवी पर आधा मैच देखा. इसके बाद हम घर भागे और बाकी का मैच वहां देखा. यहां हम हार गए थे.

सेकेंड्री स्कूल में मैंने सात सालों तक कभी क्लास नहीं छोड़ी थी, लेकिन एक बार मेरे साथ ऐसा हुआ.

अब जब मैं बड़ा हो गया हूं, मामला अलग है. अब ज्यादा गुस्सा या शाब्दिक सीमा कम ही पार होती है और होती भी है तो उतना आक्रामक नहीं. भारतीय प्रशंसकों की ओर से तो नहीं होता है. अब एकदूसरे पर वो छींटाकशी नहीं होती है. यहां तक कि मज़ाक में भी नहीं.

लेकिन भारत के साथ हारना दुख देता है. खेल से पहले मैं सोचता हूं कि ओह ये तो महज खेल है, कौन जीतता है कोई फ़र्क नहीं पड़ता है, हम भाई हैं, ज़मीन पर खिंची फर्जी लाईन ने हमें बांट रखा है और रंग और एकता में हम एक जैसे ही हैं.

लेकिन जब पाकिस्तान हारता है तो लगता है क़यामत आ गई है, जैसे लगता है कि आपकी पत्नी आपको छोड़ कर जा रही है.

जैसे आपका क्रेडिट कार मज़ूर नहीं होगा, जैसे घर बिक रहा हो, जैसे आपकी नौकरी जा रही हो, हर कोई आपसे नफ़रत कर रहा हो.

लेकिन ईमानदारी से कहा जाए तो बंटवारे की बात भूल जाते हैं, खिलाड़ियों और संस्कृतियों के बीच असली दोस्ती पनपती है और इसको लोग स्वीकार करते हैं.

हां, राजनीति तो होती ही है, लेकिन भारतीय और पाकिस्तान इऩ बातों पर ध्यान नहीं देते हैं. हम सिर्फ़ खेल को पसंद करते हैं.

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कल सजाद- इंग्लैंड टीम के पाकिस्तानी मूल के प्रशंसक

मुझे याद है जब मैं अपने पिता के सामने इंग्लैंड के प्रशंसक के रूप में रूबरू हुआ. उनके चेहरे पर जो हताशा दिखी वो आज तक याद है.

मेरे माता पिता दोनों पाकिस्तान से हैं. ब्रिटेन में जन्मे छह भाई बहनों में मैं सबसे छोटा हूं और मेरे सभी भाई बहन पाकिस्तान को सपोर्ट करते हैं.

एक युवा के रूप में मैं क्रिकेट को जुनून की हद तक प्यार करता था.

क्रिकेट के बारे में जो सबसे शुरुआती याद है वो है पांच साल की उम्र की. 1992 वर्ल्ड कप फ़ाइनल मैच का टीवी पर रिपीट कार्यक्रम प्रसारित हो रहा था जिसमें पाकिस्तान ने इंग्लैंड को हरा दिया था. ये कार्यक्रम मैंने सुबह सुबह देखा.

उस समय मैंने पाकिस्तान का समर्थन करता था. लेकिन जब मैं बड़ा हुआ, मेरी पसंद बदल गई और एशियाई संस्कृति में मैं पूरी तरह डूबा नहीं था, इसलिए मैं इंग्लैंड की टीम को पसंद करने लगा.

ये 1999 का वर्ल्ड कप का समय था जब पूरा घर क्रिकेटमय हो गया. मेरे परिवार में भारत और पाकिस्तान की परम्परागत प्रतिद्वंद्विता का काफ़ी मतलब होता था.

भारत पहले बल्लेबाजी का फैसला कर अच्छा खेल रहा था, एक समय उसके एक विकेट पर 95 रन थे और सचिन तेंदुलकर अभी भी क्रीज़ पर बने हुए थे.

मैं टॉयलेट गया. उसी समय मुझे लोगों का शोर सुनाई दिया. ख़तरनाक़ बैट्समैन तेंदुलकर आउट हो गये थे. क्या अज़हर महमूद की स्मार्ट गेंदबाज़ी थी, या सक़लैन मुश्ताक़ ने अच्छे से कैच पकड़ा या तेंदुलकर अपना ध्यान खो बैठे थे?

लेकिन नहीं, मेरे पिता को इस बात का पक्का यक़ीन था कि मैं उठ कर गया इसलिए ऐसा हुआ.

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ये अंधविश्वास इतनी दूर तर गया कि उसके बाद जब भी पाकिस्तान को विकेट की ज़रूरत होती वो मुझे टॉयलेट जाने के लिए कह देते.

मुझे याद है कि मैं आधी पारी इन्हीं सबमें देख नहीं पाया.

और ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ टूर्नामेंट का फ़ाइनल था. मेरे पिता को जब भी लगता कि पाकिस्तान मुश्किल में है, वो टीवी बंद कर देते थे.

वो सोचते थे कि दस मिनट के लिए टीवी बंद कर देने का मतलब है कि पाकिस्तान चमत्कारिक रूप से किसी तरह 100 रन बना लिया होगा.

जब ऑस्ट्रेलिया की जीत लगभग पक्की थी, इस तनाव के पल में मेरे भाई और पिता ने घंटे भर के लिए पास के शॉपिंग सेंटर में जाने का फ़ैसला किया. मुझे याद नहीं है कि उस दिन हमने क्या ख़रीदारी की लेकिन मुझे इतना पक्का है कि पाकिस्तान की हार के गम में ये बहुत देर तक नहीं चला होगा.

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