इसलिए न्यूज़ीलैंड से हार गई कोहली की स्टार टीम

  • 11 जुलाई 2019
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न्यूज़ीलैंड की आबादी लगभग 50 लाख है. यानी बेंगलुरु की आबादी की लगभग आधी. अगर न्यूज़ीलैंड के सभी भेड़ों को भी जोड़ दिया जाए, जो कि एक व्यक्ति पर सात होते हैं, तब भी उनकी आबादी कई भारतीय राज्यों से कमतर रहेगी.

न्यूज़ीलैंड में क्रिकेट नहीं बल्कि शीर्ष पर रग्बी है. रग्बी यहां क्रिकेट की तुलना में ज़्यादा पैसा, प्रतिभा और लोगों के ध्यान आकर्षित करता है. दूसरी तरफ़ भारत की आबादी लगभग एक अरब 30 करोड़ है और क्रिकेट की दुनिया में भारत का दबदबा है.

भारत के पास खिलाड़ियों के चयन के ज़्यादा विकल्प हैं. बेशुमार पैसे और ताक़त है और वनडे क्रिकेट में नंबर वन है. जब न्यूज़ीलैंड ने भारत को हराया तो ऐसा लगा कि मामला कितना एकतरफ़ा था और भारत न्यूज़ीलैंड को टक्कर देने की स्थिति में कहीं से भी नहीं था.

भारत के पास स्टार्स हैं और न्यूज़ीलैंड के पास टीम. भारतीय टीम के बैकरूम स्टाफ़ किसी भी कॉर्पोरेट प्रोफ़ेशनल से ज़्यादा पैसे कमाते हैं दूसरी तरफ़ न्यूज़ीलैंड के पास फ़िज़ूलख़र्ची के लिए इतने पैसे नहीं हैं. भारत के पास दुनिया के बेहतरीन बल्लेबाज़ हैं.

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भारत के पास अच्छे गेंदबाज़ हैं और रोहित शर्मा भी हैं जिन्होंने इस टूर्नामेंट में अकेले पाँच शतक बनाए. न्यूज़ीलैंड के पास कप्तान केन विलियम्सन प्रमुख बल्लेबाज़ हैं और उन्होंने कुल स्कोर के एक तिहाई के क़रीब अकेले रन बनाए हैं.

इंग्लैंड पहुंचकर भारतीय खिलाड़ियों का हौसला अफ़ज़ाई करने वाले प्रशंसक बड़ी संख्या में भारत के थे. न्यूज़ीलैंड के कमेंटेटेर मैदान में अपने समर्थकों को नाम से बुला सकते थे.

दोनों टीमों की हैसियत में इतनी असामनता होने के बावजूद न्यूज़ीलैंड ने मैच जीता. यही खेल है. भारत में हार को लेकर पोस्टमॉर्टम शुरू होगा. शायद चेहरे बदलेंगे और खिलाड़ी संन्यास लेंगे.

भारत ने बेकार नहीं खेला बल्कि नासमझ की तरह खेला. दो ख़तरनाक गेंदों पर दो बेहतरीन बल्लेबाज़ आउट हुए. पहला रोहित शर्मा, जिन्होंने इस मैच से पहले पाँच शतक लगाए थे और दूसरा विराट कोहली जो दुनिया के बेहतरीन बल्लेबाज़ हैं. इसके बाद 12 ओवर के पहली पाली में ही भारतीय खेल का रथ फँस चुका था.

हालाँकि रविंद्र जडेजा जब तक रहे तब तक भारत खेल में बना रहा. महेंद्र सिंह धोनी जो कि विकेट बचाकर खेल रहे थे, वो भी जडेजा के जाते ही ख़तरनाक तरीक़े से रन आउट हो गए. धोनी के जाने के बाद बचा ही क्या था.

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जडेजा के साथ 116 रनों की साझेदारी में धोनी ने 45 गेंद में 32 रन बनाए और जडेजा ने 59 गेंद पर 77 रन की शानदार पारी खेली.

इस साझेदारी में 20 ऐसी गेंद थी जिस पर कोई रन नहीं बना. आख़िर के तीन ओवर में जीत के लिए 37 रन बनाने थे लेकिन भारत के खेल को देखते हुए लक्ष्य तक नहीं पहुँचने की आशंका गहराती जा रही थी.

नासमझदारी

यह वो मैच है जिसे न्यूज़ीलैंड ने जीता है न कि भारत हारा है. विलियम्सन ने विकेट का आकलन बिल्कुल सटीक किया और इस चीज़ को समझा कि बैटिंग में नई कोशिश और प्रयोग से कतराने का कोई मतलब नहीं है.

हालांकि 240 का स्कोर भारत के लिए कोई बड़ा स्कोर नहीं था. न्यूज़ीलैंड ने तेज़ गेंदबाज़ मैट हेनरी और ट्रेंट बॉल्ट की गेंदबाज़ी से सुनिश्चित कर दिया किया 240 का स्कोर कोई आसान स्कोर नहीं है.

इनके साथ लेफ्ट आर्म स्पिनर मिच सैंटनर ने भारत के मध्य क्रम के युवा तुर्कों के निपटा दिया. न्यूज़ीलैंड ने जैसा खेल दिखाया उससे वो विश्व कप जीत सकता है और भारत को अब चार साल इंतजार करने होंगे.

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ख़राब चयन

भारत इस टूर्नामेंट में मुख्य रूप से तीन बल्लेबाज़ों और तीन गेंदबाज़ों पर निर्भर रहा जो वाक़ई विश्व स्तरीय हैं. मध्य क्रम को भारत ने कभी दुरुस्त नहीं किया. नंबर चार, पाँच और छह को लेकर अनिश्चितता कायम रही.

तीन बल्लेबाज़ों ने तो पहली बार विश्व कप खेला और इन्होंने भारत के कुल स्कोर के दो तिहाई रन बनाए. जिस जडेजा की उपेक्षा विश्व कप में हो रही थी उसी ने मैच के आख़िर तक भारत की उम्मीदों को ज़िंदा रखा.

इस टूर्नामेंट के लिए भारत ने खिलाड़ियों का ठीक से चयन नहीं किया. चयनकर्ता चार नंबर के लिए बल्लेबाज़ की तलाश नहीं कर पाए. भारत ने पिछले विश्व कप से चार और सात नंबर के लिए 24 खिलाड़ियों को आजमाया. प्रतिभा की कमी नहीं है बल्कि टीम के चयन में फ़ैसला लेने की कमी दिखी.

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क्या भारत ने न्यूज़ीलैंड को हल्के में लिया?

भारतीय प्रशंसकों और मीडिया के साथ कमेंट्री बॉक्स में अंधराष्ट्रवादी अंदाज़ में तारीफ़ करने वालों ने ऐसा ज़रूर किया है. लेकिन खिलाड़ियों ने इसे कैसे लिया? जब पहले दिन बारिश के कारण मैच रुका तब न्यूज़ीलैंड ने पाँच विकेट के नुक़सान पर 211 रन बनाए थे.

बारिश के कारण बाक़ी का मैच अगले दिन यानी बुधवार को हुआ. अगले दिन न्यूज़ीलैंड ने 23 गेंद पर 28 रन बनाए. इसे देख भारत को शायद लगा कि बल्लेबाज़ी आसान होगी. आख़िरकार भारत को कमज़ोर मध्यक्रम की क़ीमत चुकानी पड़ी. जडेजा को लेकर भारतीय टीम के प्रबंधन ने अनिश्चितता बनाई रखी.

इसी का नतीजा न्यूज़ीलैंड के साथ मैच में मिला. न्यूज़ीलैंड के सामने इसीलिए भारतीय टीम ने सारी संपन्नता के बावजूद नतमस्तक दिखी.

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