#Changethegame | जिमनास्ट सनसनी प्रियंका दासगुप्ता 4 गोल्ड जीत कर सुर्खियों में छा गईं

  • 20 जनवरी 2020
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Image caption प्रियंका दास गुप्ता ने जीते चार गोल्ड मेडल

16 साल की प्रियंका दासगुप्ता ने 'खेलो इंडिया- यूथ गेम्स' में चार गोल्ड जीतकर एक चैंपियन एथलीट के रूप में उभरी हैं.

असम के गुवाहाटी में आयोजित 'खेलो इंडिया- यूथ गेम्स' के तीसरे संस्करण के दौरान अंडर 17 वर्ग में चार गोल्ड जीतने वाली प्रियंका दासगुप्ता त्रिपुरा राज्य से हैं. त्रिपुरा की ओलंपिक जिमनास्ट दीपा कर्माकर पहले से ही पूरे देश में अपने जिमनास्टिक के लिए मशहूर हैं. दीपा की तरह ही प्रियंका को जिमनास्टिक की कोचिंग, गुरु द्रोणाचार्य पुरस्कार से सम्नानित कोच विशेश्वर नंदी ही दे रहे हैं.

10 जनवरी से शुरू हुए 'खेलो इंडिया- यूथ गेम्स' में प्रियंका के अलावा अब तक त्रिपुरा से किसी भी खिलाड़ी ने गोल्ड मेडल नहीं जीता है.

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माँ को दिया सफलता का श्रेय

प्रियंका अपनी इस सफलता का श्रेय अपनी पहली कोच सोमा नंदी, द्रोणाचार्य पुरस्कार प्राप्त कोच विशेश्वर नंदी और खासतौर पर अपनी माँ को देती हैं.

गुवाहाटी के भोगेश्वरी फुकनानी इंडोर स्टेडियम में बीबीसी से बातचीत में प्रियंका ने कहा, "बचपन की शरारत और उछल-कूद के कारण मम्मी ने स्पोर्ट्स में भेजने की बात सोची थी."

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Image caption दीपा कर्माकर ओलंपिक गेम्स में खेलने की योग्यता प्राप्त करने वाली पहली भारतीय महिला जिमनास्ट हैं

ओलंपिक में खेलना लक्ष्य

"इसके बाद मम्मी ने जिमनास्टिक सीखने के लिए मुझे अकैडमी में भर्ती करा दिया. अब मैं एक अच्छी जिमनास्ट के तौर पर आगे बढ़ना चाहती हूं. इसके लिए मैं रोजाना छह से 7 घंटे ट्रेनिंग (अभ्यास) करती हूं. मेरा लक्ष्य अंतरराष्ट्रीय जिमनास्टिक प्रतियोगिता में खेलना है और मेडल लाना है. इसके बाद मुझे धीरे-धीरे ओलंपिक में जाना है."

दीपा कर्माकर से प्रेरणा लेने के सवाल पर प्रियंका कहती है, "जिमनास्टिक को लेकर दीपा दीदी का जो समर्पण है, वो जिस कदर जिम में मेहनत करती हैं वो हम सभी के लिए एक प्रेरणा है."

"मेरे कोई भाई-बहन नहीं हैं. इसलिए दीदी ही मेरी सबकुछ है. दीदी मेरी आदर्श हैं. 'खेलो इंडिया यूथ गेम्स' में गोल्ड मेडल जीतने की पहली बधाई दीदी ने दी जो मेरे लिए बहुत बड़ी बात है. मैं बहुत खुश हूं कि मेरे कोच द्रोणाचार्य अवार्डी नंदी सर ने मुझे बधाई दी."

'पापा टैक्सी चलाते हैं'

घर के माहौल और माता-पिता के सपोर्ट को लेकर प्रियंका कहती है, "हमारे परिवार में लड़की या लड़का को लेकर किसी तरह का भेदभाव नहीं है. मेरे माता-पिता ने हमेशा मेरा साथ दिया है जिसकी बदौलत मैं लगातार अपने खेल को बेहतर कर पा रही हूं."

वह बताती हैं, "मैं ग़रीब परिवार से हूं. मेरे पिता टैक्सी चलाते हैं. पापा बहुत मेहनत करते हैं. कई बार सुबह पांच बजे ही घर से निकल जाते हैं और देर रात घर लौटते हैं. मुझे उनसे बात करने का मौका नहीं मिल पाता क्योंकि जब तक वो लौटते हैं, मैं सो जाती हूं."

"मुझे इस खेल में अपना लक्ष्य पता है. मैं आगे बहुत मेहनत करना चाहती हूं. साथ ही मैं अपनी पढ़ाई को भी जारी रखना चाहती हूं ताकि कोई मेरे पापा से यह न कहें कि खेल के कारण मेरी पढ़ाई ख़राब हो गई."

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अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जाने से जुड़े एक सवाल का जवाब देते हुए प्रियंका कहती हैं, "मेरे कोच नंदी सर जितने घंटे प्रैक्टिस करने को कहेंगे मैं करूंगी. सर हमेशा एक बात कहते हैं कि तुम एक एलिमेंट को एक हज़ार बार प्रैक्टिस करोगी तो वो परफेक्ट हो जाएगा."

"मैंने खेलो इंडिया की जिन चार प्रतियोगिताओं में गोल्ड जीते हैं उनको मैंने सैकड़ों बार प्रैक्टिस किया है. कोई नया एलिमेंट जब सीखते हैं तो दिमाग में चोट लगने का थोड़ा डर रहता है. लेकिन नंदी सर की वजह से सब आसान हो जाता है. पिछले साल खेलो इंडिया में मुझे तीन सिल्वर मेडल मिले थे और उस समय मैंने तय किया था कि पूरी मेहनत के साथ इस साल गोल्ड जीतना है."

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Image caption प्रियंका दास गुप्ता त्रिपुरा सरकार के खेल विभाग के अधिकारियों के साथ

विराट की फैन हैं प्रियंका

जिमनास्टिक के अलावा प्रियंका को क्रिकेट देखना अच्छा लगता है.

वो कहती हैं, "मैं अंतरराष्ट्रीय जिमनास्ट के वीडियो ही देखती हूं. लेकिन मुझे विराट कोहली बहुत अच्छे लगते है. जब विराट बैटिंग करने आते हैं तो मैं बहुत चीयर करती हूं. दीपा दीदी ने जब रियो ओलंपिक के लिए क्वालीफाई किया था उस समय सचिन तेंदुलकर सर ने उन्हें बधाई दी थी और तारीफ़ की थी. यह बड़ी बात है."

जब प्रियंका से पूछा गया कि क्या वे ये चाहती हैं कि विराट कोहली भी उन्हें बधाई दें?

इस पर प्रियंका कहती है, "मैंने तो अभी कुछ भी बड़ा काम नहीं किया है. मुझे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मेडल जीतना है तब शायद विराट सर भी मुझे बधाई दें."

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Image caption प्रियंका की पहली कोच सीमा नंदी

प्रियंका की पहली जिमनास्टिक कोच सोमा नंदी आर्थिक रूप से कमज़ोर बच्चों के लिए सरकार से और अधिक सुविधाओं की उम्मीद करती हैं.

वे कहती हैं, "यहां ज़्यादातर बच्चे ग़रीब परिवारों से आते हैं. उनमें प्रतिभा तो है लेकिन घर की माली हालत की वजह से उनके लिए इस गेम को जारी रखना मुश्किल होता है. हमारी सरकार खेल के क्षेत्र में काफ़ी अच्छा काम कर रही है."

"त्रिपुरा में विशेषकर जिमनास्टिक की विश्व स्तरीय सुविधाएं है. लेकिन आर्थिक रूप से कमज़ोर अभिभावकों के लिए अपने बच्चे की पढ़ाई और खेल का खर्च एक साथ उठाना थोड़ा मुश्किल हो जाता है. कई प्रतिभाशाली बच्चे हैं जिनके पिता टैक्सी या रिक्शा चालक हैं."

"ऐसे ग़रीब परिवार के बच्चों को आगे लाने की ज़रूरत है. मैं और मेरे पति ऐसे प्रतिभाशाली बच्चों की मदद कर रहे हैं. भविष्य में त्रिपुरा से कई प्रतिभाशाली जिमनास्ट दिखेंगे."

दीपा से कितनी अलग हैं प्रियंका

दीपा कर्माकर और प्रियंका के खेल में एक जैसी समानता के सवाल पर सोमा नंदी कहती है, "दीपा का जुनून एकदम अलग है. वे बहुत ज़िद्दी हैं. जब तक किसी एलिमेंट को परफेक्ट नहीं कर लेतीं, वो चैन नहीं लेती हैं."

"प्रियंका भी बहुत टैलेंटेड हैं. लेकिन उन्हें अभी और डेडिकेशन के साथ ट्रेनिंग करनी होगी. इंटरनेशनल लेवल पर अच्छा खेलने के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ेगी. उनकी उम्र भी अभी काफ़ी कम है."

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प्रियंका के परिवार की आर्थिक स्थिति पर वे कहती हैं, "उनके पापा टैक्सी चलाकर घर का गुजारा करते हैं और बेटी को जिमानस्ट भी बना रहे हैं."

"अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेलने के लिए प्रियंका को आर्थिक मदद चाहिए. ड्रेस से लेकर अच्छी डाइट तक, कई तरह आवश्कताएं हैं. उनमें टैलेंट बहुत है लेकिन आर्थिक हालात उनके खेल में बाधा नहीं बनना चाहिए."

प्रियंका को भी दीपा की तरह ही रियो ओलंपिक चैंपियन सिमोन बाइल्स और रूस की कलात्मक जिमनास्ट आलिया मुस्तफ़िना काफी अच्छी लगती हैं.

प्रियंका अपने खाली वक्त में इन नामी जिमनास्टिक खिलाड़ियों के वीडियो देखती हैं ताकि वो अपने खेल में और सुधार कर सकें.

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