विनेश फोगाट: BBC Indian Sportswoman of the Year की नॉमिनी

  • 16 फरवरी 2020
पहलवानी करना तो मेरी किस्मत में लिखा था: विनेश फोगाट

90 के दशक के बॉलीवुड गानों की धुन पर वार्म-अप करती छोटे-छोटे बालों वाली युवा महिला खिलाड़ी. कुश्ती के दांव पेच से पहले ये पहलवान ख़ुद को तैयार कर रही थीं. लखनऊ के इनडोर स्टेडियम का ये नज़ारा अपने आप में बहुत कुछ बयां कर रहा था.

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जनवरी की एक सर्द सुबह हम लखनऊ में महिला पहलवान विनेश फोगाट से मिलने पहुँचे थे. विनेश सुबह-सुबह यहाँ पूरे जोशो-खरोश से ट्रेनिंग में लगी हुई थी.

हमें देखकर वो हल्के से मुस्कुराईं, हाथ हिलाया और फिर तल्लीनता से प्रैक्टिस में लग गईं, कोच की एक-एक बात को ध्यान से सुनते हुए- मानो अगले मैच की हार-जीत का फ़ैसला इसी पर टिका हुआ है. बीच में बस वो अपने पंसदीदा गाने लगाने के लिए रुकती थी- कुछ पंजाबी और कुछ हिंदी. उस दिन की थीम थी: उदास लव सॉन्ग्स.

ये 25 अगस्त 1994 को हरियाणा के बलाली गाँव में जन्मी एक ऐसी महिला खिलाड़ी की कहानी है जो अपनी कड़ी मेहनत, हिम्मत, हौसले के बूते पर अब दुनिया की सबसे बेहतरीन पहलवानों में गिनी जाती है.

करीब तीन घंटे की ट्रेनिंग के बाद विनेश इंटरव्यू के लिए मैट पर बैठते हुए कहती हैं कि पहलवानी करना तो उनकी किस्मत में शायद पहले से ही लिखा हुआ था.

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ओलंपिक मेडल का सालों पुराना सपना पूरा करना चाहती हैं पहलवान विनेश फोगाट

'गांव में निक्कर पहनकर प्रैक्टिस करते थे'

विनेश का इशारा अपने ताऊ महावीर फोगाट की ओर था.

अपने शुरुआती दिनों के बारे में विनेश ने बताया, "मेरे ताऊजी ख़ुद भी एक पहलवान थे. मेरे दादा जी भी पहलवान थे. जब हम बच्चे थे, तभी ताऊजी ने ठान लिया था घर की लड़कियों को पहलवानी सिखानी है. मैं तो सिर्फ़ छह साल की थी."

गीता और बबीता महावीर फोगाट की बेटियाँ थीं और विनेश उनकी भतीजी. ये उतना आसान नहीं था.

विनेश बताती हैं, "20 साल पहले हरियाणा के गाँव में लड़कियों को कुश्ती सिखाने के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता था. लोगों की सोच पुरुषवादी और रूढ़िवादी थी. लोगों ने ताऊजी को बहुत भला-बुरा कहा. हम बहनों के बाल छोटे-छोटे थे, लड़कों की तरह. हम निक्कर पहनकर गाँव में प्रेक्टिस करने जाती थीं. पड़ोस की औरतें माँ से आकर बोलती थीं कि अपनी बेटी को कहो कम से कम फ़ुल पैंट पहनकर निकले. शुरू-शुरू में ये सब सुनकर माँ को भी शर्म आती थी."

बात करते-करते विनेश के चेहरे के भाव बदल जाते हैं.

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'भाई, ये ओलंपिक कौन है?'

बात जारी रखते हुए विनेश हरियाणवी ठसक से बताती हैं, "पर मैं किसी की बात नहीं सुनती थी और पलट कर जवाब देती थी. माँ से कहती कि उन्हें कहो कि ज़्यादा दिक्कत है तो अपनी बेटियों की पहनवा लें. मेरे कपड़ों पर कमेंट न करें. ताऊजी की ट्रेनिंग से हमारे अंदर ये बात घर चुकी थी कि हम किसी से कम नहीं हैं."

जूझने और भिड़ जाने की इसी क्षमता ने विनेश को बड़े मुकाबलों में सफलता दिलवाई है लेकिन शुरुआती संघर्ष को विनेश भूली नहीं है.

वो बताती हैं, "जब बच्चे थे तो शुरू-शुरू में तो एक-दो महीने बहुत अच्छा लगा जब ताऊजी कुश्ती के लिए ले जाते. खेलना किस बच्चे को अच्छा नहीं लगता? धीरे-धीरे उन्हें लगना लगा कि इन लड़कियों में वाकई पहलवान बनने का दम है. उसके बाद हमारी कड़क वाली ट्रेनिंग शुरू हो गई. हमें सुबह साढ़े तीन बजे उठना पड़ता. ट्रेनिंग कितने घंटे चलेगी ये तय नहीं होता था. अगर आज के बच्चों को ऐसी कड़ी ट्रेनिंग करनी पड़े तो वो पहले ही दिन भाग जाएँ."

विग्नेश बताती हैं, "अगर कोई ग़लती हुई तो ट्रेनिंग और खिंच जाती और जो ज़बरदस्त वाली मार पड़ती वो अलग. इसके बाद हम स्कूल जाते. क्लास में तो हम सोते ही थे बस. तब ज़िंदगी का मतलब था: कुश्ती करो, खाओ और चुपचाप सो जाओ. बस. बाल लंबे करने तक की इजाज़त नहीं थी क्योंकि ताऊजी को लगता था कि इससे ध्यान भटकेगा. लोग उन्हें काफ़ी कुछ बोलते थे लेकिन ताऊजी की नज़र सिर्फ़ ओलंपिक मेडल पर थी."

उस वक़्त गाँव में नन्हीं विनेश को पता तक नहीं था कि आख़िर ओलंपिक होता क्या है.

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Image caption विनेश की माँ प्रेम लता कहती हैं कि विनेश ने उनके लिए बहुत कुछ किया है और ऐसी बेटी सबको मिले.

मां ने अकेले पाला

वो बताती हैं, "हम ट्रेनिंग से इतने तंग आ चुके थे कि हमें लगता था: भाई कौन है ये? ओलंपिक कहाँ मिलता है? कोई इनको लाकर दे दो तो हमारा पीछा छूटे. सिर्फ़ ताऊजी को ही पता था कि वो कितना आगे की सोच रहे थे."

कहते हुए विनेश के चेहरे पर मुस्कान आ जाती है.

धीरे-धीरे विनेश की मेहनत और ट्रेनिंग रंग लाने लगी. वो गाँव से निकल राष्ट्रीय स्तर पर मेडल जीतने लगीं.

ज़िंदगी में टर्निंग प्वॉइंट तब आया जब 19 साल की उम्र में विनेश ने कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड मेडल जीता. ये अंतरराष्ट्रीय मंच पर एक नई महिला पहलवान की दस्तक थी.

Image caption विनेश ने अपनी माँ के लिए गाँव में आलीशान घर बनवाया है

पिता की हत्या कर दी गई...

हर खिलाड़ी की तरह विनेश भी यही कहती हैं कि हारना उन्हें बिल्कुल पसंद नहीं.

जूझने की ये क्षमता शायद विनेश को माँ प्रेम लता से मिली है. अपनी सफलता के लिए वो ताऊ और माँ को ही श्रेय देती हैं.

विनेश बहुत छोटी थीं जब उनके पिता की हत्या कर दी गई.

उस समय हरियाणा के रूढ़िवादी समाज में उनकी माँ ने बतौर सिंगल मदर विनेश को पाला-पोसा.

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जब टूटा ओलंपिक का सपना

वो बताती हैं, "जब तक पिताजी ज़िंदा थे, सब कुछ ठीक था. वो मुझे खेलते देख बहुत ख़ुश होते थे लेकिन उनकी मौत के बाद सब कुछ बदल गया. गाँव के लोग मम्मी को बोलने लगे कि बिन पिता की बेटी है, उसकी शादी करवा दो, बस. गीता-बबीता तो इसलिए खेल रही हैं क्योंकि उनके पिता हैं. गाँव में किसी को नहीं लगता था कि मैं कुछ कर पाऊंगी. लेकिन मम्मी ने साफ़ कह दिया कि मेरी बेटी खेलेगी. हालात अच्छे नहीं थे लेकिन हमें सुविधाएँ देने के लिए माँ ने बहुत संघर्ष किया."

विनेश ने बताया, "ताऊजी की ट्रेनिंग बहुत की मुश्किल होती थी. कई बार सोचती थी, सब छोड़ दूँ लेकिन जब मम्मी को मेहनत करते हुए देखती थी तो मैंने भी अपने आप को अंदर से मज़ूबत करना सीख लिया."

कॉमनवेल्थ के बाद जब 2016 रियो ओलंपिक में भारतीय टीम गई तो 21 साल की विनेश से पदक पक्का माना जा रहा था लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था.

क्वार्टरफ़ाइनल में अचानक विनेश को गंभीर चोट लग गई. देखते-देखते गेम बदल गया. दर्द से कराहती विनेश को स्ट्रेचर पर ले जाना पड़ा और ओलंपिक का सपना टूट गया.

विनेश बताती हैं कि ये उनके करियर का सबसे मुश्किल दौर था जहाँ वो अपनी ही क्षमता पर शक करने लगी.

विनेश ने बताया, "मैंने लोगों को कहते हुए सुना था कि अगर खिलाड़ी एक बार गंभीर रूप से घायल हो जाए तो समझो करियर ख़त्म. मैंने ख़ुद देखा भी था. तीन साल तक मेरी ख़ुद से लड़ाई चलती रही कि क्या मैं ओलंपिक में वापसी कर पाऊँगी."

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हारना बिल्कुल पसंद नहीं...

इंटरव्यू का मूड अचानक बदल सा जाता है. एक सेंकेड के लिए ही सही विनेश की आँख भर आती है. लेकिन इससे पहले कि आपको एहसास हो, वो ख़ुद को संभालते हुए आगे बढ़ जाती हैं- बिल्कुल अपनी गेम की तरह.

जब एक सफल खिलाड़ी इस तरह के दौर से या दबाव या नाकामी से गुज़रता है तो वो ख़ुद को कैसे संभालता है? इस सवाल के जवाब में विनेश का एक अलग ही चेहरा देखने को मिला.

हमेशा चुलबुली से रहने वाली विनेश ने बताया, "जब भी मुझे कोई सवाल परेशान करता है तो मैं ख़ुद से और भगवान से बात करती हूँ. तीसरा कोई नहीं. मुझे किसी से दिल की बात करना पसंद नहीं है. दरअसल मैं किसी और को अपने मन की बात समझा ही नहीं पाती. मैं अपने आप से ही सवाल पूछती हूँ और उनके जवाब भी ख़ुद से ही लेती हूँ. मेरे लिए यही काम करता है. सौभाग्यवश अभी तक कोई फ़ैसला ग़लत साबित नहीं हुआ."

ख़ैर, रियो ओलंपिक के बाद सर्जरी हुई और विनेश ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वापसी की. कभी सफलता मिली और कुछ नाकामियाँ भी. 2018 के एशियन गेम्स में वो गोल्ड जीतने वाली पहली भारतीय पहलवान बनीं.

कई मैच वो हारी भीं जिसके लिए लोग उनकी कमियाँ भी गिनाने लगी, ख़ासकर ये कि बड़े मैच में स्टैनिमा में मार खा जाती हैं लेकिन विनेश की मेहनत, नया कोच और ट्रेनिंग की नई तकनीक की बदौलत विनेश ने जल्द ही सबको ग़लत साबित किया. वर्ल्ड चैंपियनशिप जिसमें वो हमेशा हार जाती थीं, 2019 में आख़िरकर विनेश ने कांस्य पदक जीता.

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दुनिया की चोटी की खिलाड़ी

आज विनेश दुनिया की चोटी की खिलाड़ी हैं. साल 2020 की शुरुआत उन्होंने रोम में गोल्ड मेडल जीतकर की है. कड़ी ट्रेनिंग और कुश्ती के दांव पेंच के बीच एक और व्यक्ति है जो विनेश के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा रहा है-सोमवीर राठी.

सोमवीर ख़ुद भी एक पहलवान हैं और विनेश को आठ साल से ज़्यादा से जानते हैं. कुश्ती के दंगलों के बीच दोनों के बीच मोहब्बत भी परवान चढ़ने लगी थी.

सोमवीर के बारे में विनेश कहती, "मेरे करियर के लिए उसने अपना करियर का नुक़सान किया है. एक वो ही है जो बिना कुछ कहे मेरे दिल की बात समझ सकता है."

2018 में एशियन गेम्स से गोल्ड जीतने के बाद जब विनेश लौटीं, एयरपोर्ट पर ही सोमवीर ने प्रपोज़ किया और कुछ महीनों के अंदर दोनों की शादी भी हो गई. कुश्ती दोनों का जुनून है.

वैसे कुश्ती से परे अगर कभी समय मिलता है तो विनेश म्यूज़िक सुनना और फ़िल्में देखना पसंद करती हैं. हालांकि वो बताती हैं कि पिछले कुछ सालों में वो चंद ही फ़िल्में देख पाई हैं जिसमें उन्हें 'बाहुबली', 'चक दे' और 'अपने' अच्छी लगी.

फ़िल्म स्टार्स में वो रणवीर सिंह, अक्षय कुमार, कंगना और दीपिका की फ़ैन हैं. विनेश का एक और बड़ा शौक़ है- खाना. वो ख़द की फ़ूडी बताती हैं.

वो कहती हैं, "मरने से पहले मैं हर मुमकिन खाना टेस्ट करना चाहती हूँ. मेरे सपनों में से एक सपना है कि मैं पूरी दुनिया घूमूं और हर तरह के व्यजंन खा डालूँ."

अपने ऊपर ख़ुद ही ज़ोर-जोर से हँसती विनेश बोलती चली जाती हैं.

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अधूरे सपने को पूरा करने की ख़्वाहिश

तो लजीज़ खाना विनेश को ख़ुश करने का बढ़िया तरीका है लेकिन क्या इस पहलवान को ग़ुस्सा भी आता है? ख़ुराफ़ाती मुस्कान के साथ विनेश कहती हैं, "मुझे बहुत ग़ुस्सा आता है. और जब ग़ुस्सा आता है तो मैं तोड़ फोड़ भी कर सकती हूँ".

बचपन में तो विनेश को बाल बड़े करने का मौका नहीं मिला तो वो अब अपना शौक़ पूरा कर रही है.

विनेश के पास किस्सों का खजाना है. एक किस्सा सुनाते हुए विनेश बताती हैं, "नेशनल कैंप में एक बार लंबा वक़्त रह गई तो बाल बड़े हो गए. घर आई तो ताऊजी बोले, बुलाओ नाई. मैं घर की अलमारी में छिप गई और मम्मी ने उसे बाहर से बंद कर दिया."

विनेश अपने कई शौक़ और सपने पूरे कर चुकी हैं. अब विनेश का सबसे बड़ा सपना क्या है?

बिना पलक झपके विनेश तपाक से जवाब देती है, "बहुत कम लोगों को ज़िंदगी में दूसरा मौका मिलता है. मुझे दूसरा मौका मिला है ओलिंपक में खेलने का. मैं ओलंपिक मेडल जीतने का अपना सपना पूरा करना चाहती हूँ."

कहते-कहते जैसे वो अपने ही ख़यालों में खो गई. अब हमारा इंटरव्यू उस मकाम पर पहुँच चुकी थी जहाँ लगा मानो किसी फ़िल्म का क्लाइमेक्स आ गया हो. और यहाँ से आगे फ़िल्म 'द एंड' ही हो सकती है.

विनेश का फ़िलहाल एक ही लक्ष्य है- टोक्यो 2020. 2016 के अधूरे सपने को मुकम्मल करना.

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