खेल की दुनिया में महिला एथलीटों से कितनी उम्मीद?

  • 28 जनवरी 2020
पीवी सिंधु और साइना नेहवाल इमेज कॉपीरइट Robertus Pudyanto/Getty Images
Image caption पीवी सिंधु और साइना नेहवाल (फ़ाइल फ़ोटो)

इस साल होने वाले टोक्यो ओलंपिक खेलों के दौरान भारतीय महिला एथलीटों पर रियो ओलंपिक की तुलना में बेहतर प्रदर्शन करने का दबाव है.

2016 के रियो ओलंपिक में भारतीय महिला एथलीटों को दो पदक हासिल हुए थे- बैडमिंटन में पीवी सिंधु ने सिल्वर मेडल जीता था जबकि कुश्ती में साक्षी मलिक ने ब्रॉन्ज मेडल दिलाया था. इन खेलों में परंपरागत तौर पर भारतीय दल का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा है, इसलिए लक्ष्य भी कमतर ही है.

2019 में वर्ल्ड बैडमिंटन चैंपियनशिप का खिताब जीतने वाली सिंधु इस बार भी पदक की सबसे तगड़ी दावेदार हैं. बावजूद इसके, बीते कुछ सालों में महिला एथलीटों ने अपने प्रदर्शन से बेहतर संकेत दिए हैं.

निशानेबाज़ी, तीरंदाज़ी, कुश्ती, बैडमिंटन, जिमनास्टिक और ट्रैक एंड फील्ड जैसे खेलों में ओलंपिक की तैयारी के लिहाज से महिला एथलीट, पुरुषों की तुलना में कहीं ज्यादा सशक्त दावेदार लग रही हैं.

एक ऐसे देश में जहां परंपरागत तौर पर पुरुषों की प्रधानता रही है, जहां महिलाओं पर सामाजिक और सांस्कृतिक पाबंदियां लगी रही हों और खेल के लिए आधारभूत ढांचे का अभाव हो, वहां अगर महिलाएं पुरुषों के साथ या उनसे आगे खड़ी हैं तो इसकी बड़ी वजह महिला खिलाड़ियों के पिछले कुछ सालों में लगातार जोरदार प्रदर्शन रहा है.

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गीता चौहान 2018 से ही भारत की व्हीलचेयर बास्केटबॉल टीम का हिस्सा हैं.

महिलाओं की भागीदारी

आंकड़े कई बार पूरी कहानी नहीं कहते. उदाहरण के लिए, बीस साल पहले भारत ने सिडनी ओलंपिक के लिए 72 खिलाड़ियों का दल भेजा था, तब दल को एक ब्रॉन्ज मेडल हासिल हुआ था, भारोत्तोलन में कर्णम मलेश्वरी ने मेडल हासिल किया था.

रियो ओलंपिक में 15 खेल प्रतियोगिताओं में भारत की ओर से 117 सदस्यीय दल शामिल हुआ था. इनमें 54 महिला एथलीट शामिल थे जिन्होंने कुल मिलाकर दो मेडल हासिल किए. खेलकूद प्रतियोगिताओं में पुरुषों की तुलना में महिलाओं की भागीदारी कई फैक्टर्स पर निर्भर करती है.

एथलीट के माता-पिता कितने प्रोग्रेसिव हैं, एथलीट का धर्म क्या है? वे शहर में रह रहे हैं या ग्रामीण इलाकों में, कौन से खेल उन्होंने चुना है और उनके परिवार की सामाजिक आर्थिक पृष्ठभूमि कैसी है?

हरियाणा में प्रति हज़ार लड़कों पर लड़कियों की संख्या कम है, 2018 में राज्य सरकार के आंकड़ों के मुताबिक़ प्रति हज़ार लड़के पर 924 लड़कियों का जन्म है. राज्य में महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराध दर भी ज़्यादा है लेकिन भारत भर में मशहूर कई महिला खिलाड़ी इस राज्य से निकली हैं.

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दिल्ली की भास्वती मिश्रा एक कथक नर्तकी हैं

खेलो इंडिया यूथ गेम्स

इनमें फोगाट बहने भीं शामिल हैं, गीता, बबीता और विनेश ने कुश्ती में कई इंटरनेशनल पदक जीते हैं और इनकी ज़िंदगी पर बॉलीवुड में फिल्म भी बन चुकी है. दूसरी ओर, महाराष्ट्र एक लिबरल स्टेट है वहां के मुंबई में महिला निशानेबाज़ी को लेकर बदलाव का दौर 1990 से शुरू हुआ था, जिसका फल अब जाकर मिलना शुरू हुआ है.

हालांकि महाराष्ट्र में स्कूली स्तर पर कितनी महिला खेल कूद में हिस्सा लेती हैं, इसका पता लगाना मुश्किल है लेकिन राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं से तस्वीर का अंदाजा हो जाता है.

केंद्रीय युवा एवं खेल मामले के मंत्रालय की पहल पर 10 से 22 जनवरी के बीच की ओर से असम के गुवाहाटी में आयोजित खेलो इंडिया यूथ गेम्स में महाराष्ट्र ने 591 एथलीटों का दल भेजा, जिनमें 312 लड़कियां थीं. महाराष्ट्र ने इस टूर्नामेंट में पदक तालिका में हरियाणा को पीछे छोड़ते हुए पहला स्थान हासिल किया है.

हर साल 19 जनवरी को होने वाले टाटा मुंबई मैराथन में इस मेडल कैटगरी में 16 पुरुष हिस्सा ले रहे थे जबकि इस वर्ग में 11 महिला एथलीट शामिल हुईं. वहीं, पदक वाले हाफ मैराथन में नौ महिलाएं हिस्सा ले रही थीं जबकि पुरुष एथलीटों की संख्या सात थी.

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रूढ़िवादी परिवार से आने वाली आरती का लक्ष्य अंतरराष्ट्रीय खेलों में गोल्ड मेडल जीतना है.

सामाजिक मान्यताएं

वहीं, ओपन 10 किलोमीटर लंबी दौड़ में 2020 में 3909 महिलाओं ने अपना रजिस्ट्रेशन कराया था जबकि पिछले 753 महिलाएं शामिल हुई थीं.

एथलीट और उनके प्रशिक्षक बढ़ती भागीदारी के पीछे कई वजहों को गिनाते हैं, जागरूकता का बढ़ना, सामाजिक मान्यताओं में ढिलाई, टेलीविजन- इंटरनेट के जरिए मिलने वाला एक्सपोजर, प्राइज मनी और माता-पिता की तरफ से उत्साहित करना.

1990 से 2000 के दशक में निशानेबाजी की दुनिया में अपनी चमक बिखरने वाली सोमा शिरूर अब भारतीय जूनियर टीम की कोच हैं.

वह बताती हैं, "अब कहीं ज्यादा माता-पिता अपनी बेटियों को निशानेबाजी में भेजना चाहते हैं. अगर आप हाल में हुई राष्ट्रीय चैंपियनशिप को देखें तो पाएंगे कि हमारे दल में जितने पुरुष हैं, उतनी ही महिलाएं भी हैं."

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प्रीमियर बैडमिंटन लीग से भारतीय बैडमिंटन को कितना फ़ायदा?

बेहतर हुई है खेलों की स्थिति

अब महिलाएं कहीं ज्यादा खेल को देख भी रही हैं, एक दशक पुराने इंडियन प्रीमियर लीग क्रिकेट यानी आईपीएल की लोकप्रियता का भी इसमें योगदान रहा है.

केपीएमजी की ओर से सितंबर, 2016 की रिपोर्ट 'द बिजनेस ऑफ स्पोर्ट्स' के मुताबिक़, साल 2016 में आईपीएल देखने वाले दर्शकों में 41 प्रतिशत महिलाएं थीं जबकि 2015 के प्रो लीग कबड्डी में 50 प्रतिशत दर्शक महिलाएं थी. वहीं 2014 के इंडियन सुपर लीग फुटबॉल को देखने वालों में 57 प्रतिशत महिलाएं और बच्चे हैं.

भारतीय समाचार पत्रों की रिपोर्ट्स में बताया गया है कि रियो ओलंपिक में सिंधु के खेले गए फ़ाइनल मुकाबलों को 6.65 करोड़ लोगों ने देखा था, जो ओलंपिक में सबसे अधिक टीवी रेटिंग भी है.

परंपरागत तौर पर अब समाज में लड़कियों के खेल कूद अपनाने को लेकर दबाव कम हुआ है. अब समुदायिक स्तर पर कम सवाल पूछे जाते हैं जबकि माता-पिता भी अपनी बच्चियों का उत्साह बढ़ाने लगे हैं.

महिला एथलीटों की कामयाबी

शिरुर अपने समय और आज के दौर की दुनिया पर बताती हैं, "ये लड़कियां निश्चित तौर पर बेहतर कर रही हैं. वे निडर भी हैं और आत्मविश्वास से भरी हुई भी है."

19 जनवरी को लगातार तीसरी बार टाटा मुंबई मैराथन की रेस जीतने वाली सुधा सिंह बताती हैं, "दिल्ली में 2010 में आयोजित कॉमनवेल्थ खेलों के बाद स्थिति में बदलाव हुआ है. हमारे समय से काफी कुछ बदल चुका है. हम पर सवाल उठाने वाले वही लोग, वही पड़ोसी अब ज्यादा सवाल नहीं करते हैं."

एक अहम बदलाव ये भी हुआ है कि अब खेल कूद में लड़कियां कहीं कम उम्र में पहुंच रही हैं, दूसरी महिला एथलीटों की कामयाबी को देखकर माता पिता अपनी बच्चियों का उत्साह भी खूब बढ़ाते हैं.

इन लड़कियों के सामने रोल मॉडल के तौर पर सानिया मिर्जा, पीवी सिंधु, फोगाट बहनें, मैरीकॉम, महिला क्रिकेट टीम के सितारे मौजूद हैं. इतना ही नहीं अब खेल कूद को लेकर टैबू भी कम हुए हैं.

सोशल मीडिया

शिरूर बताती हैं, "हमारे दौर में, मैंने 18 साल की उम्र से खेलना शुरू किया. जब मैं अपने करियर की पीक पर पहुंची तब शादी करने और बच्चे पैदा करने का वक्त आ गया था. मेरे पहले बच्चे के बाद मेरा खेल परवान चढ़ा था. लेकिन अब तो 17-18 साल की उम्र में बच्चे अपनी पीक पर होते हैं."

इसके अलावा अब शिरूर जैसी महिला कोचों की मौजूदगी से भी बदलाव हुआ है. अब कंपीटिशन और टूअर के दौरान वीमेन कोच के होने के चलते लोग कोच की देखभाल में बच्चियों को रखने के लिए तैयार हो जाते हैं.

भारत की अर्थव्यवस्था पिछले कुछ सालों में बढ़ रही थी, लोगों की आमदनी बढ़ रही थी और सोशल मीडिया के जरिए दुनिया भर से लोगों का संपर्क भी हो रहा था, ऐसे में माता पिता अपने बच्चों के खेल कूद वाले करियर में निवेश करने को भी तैयार होने लगे.

हालांकि अभी भी पुरुषों के बारे में माना जाता है कि वह परिवार के लिए रोजी रोटी कमाएगा, ऐसे में लड़कियो पर इंजीनियर या डॉक्टर बनने का दबाव भी कम हुआ है.

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शिरूर की समकालीन और राष्ट्रीय राइफल टीम की मुख्य कोच दीपाली देशपांडे बताती हैं, "अगर लोगों का बेटा इंटेलिजेंट है तो उसे इंजीनियरिंग करने के लिए धकेला जाता है. ये बेटियों के साथ नहीं होता है."

मुंबई की ट्रैक एथलीट, ट्रेनर और इंफ्लूएंसर आयशा बिलिमोरिया बताती हैं, "पहले हमारा समाज संकीर्ण सोच वाला हुआ करता था लेकिन अब हमलोग बदलाव को महसूस कर सकते हैं. सोशल मीडिया का दायरा काफी बढ़ चुका है. दूसरों के जीवन और स्टाइल को देखकर उस शैली को आप अपना सकते हैं. पहले प्रतियोगिताओं में लड़कियों को वेस्ट और शॉटर्स में दौड़ना होता था लेकिन अब नेशनल कंपीटिशन में लड़कियों को मैंने टू-पीस ड्रेस में दौड़ते देखा है."

इसके अलावा एक बड़ा बदलाव ये भी हुआ कि हर खेल में लीग प्रतियोगिताएं शुरू हो गई हैं. इन लीग प्रतियोगिताओं को बड़ी कंपनियां प्रायोजित कर रही हैं, टेलीविजन पर इसका प्रसारण होता है. कमाई कई गुना बढ़ गई है. सिंधु दुनिया की 13वीं सबसे ज्यादा कमाई करने वाली एथलीट हैं.

फोर्ब्स की अगस्त, 2019 की सूची के मुताबिक उनकी कुल आमदनी 55 लाख डॉलर की हो चुकी है. मुंबई मैराथन जीतने वाले पुरुष और महिला एथलीट को प्राइज मनी के तौर पर पांच लाख डॉलर की रकम मिलती है.

काफी कुछ बाकी है...

माता पिता का साथ महिला एथलीटों को मिलना बोनस तो है लेकिन कई बार यह चुनौती भी साबित हो रहा है. लड़कों की तुलना में लड़कियों को लेकर माता-पिता में असुरक्षा का भाव कहीं ज्यादा होता है. क्योंकि प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने के लिए काफी ट्रैवल करना होता है और ऐसे में उन्हें एक हद तक की स्वतंत्रता की जरूरत होती है.

देशपांडे बताती हैं, "आज के दौर में, पैरेंट्स दयालु हुए हैं लेकिन उनका दखल भी ज्यादा होता है. वे बच्चियों को अकेला नहीं छोड़ना चाहते. एक तरह से वे ओवरप्रोटेक्टिव होते हैं."

हालांकि अभी भी कंजर्वेटिव सोच वाले राज्यों और समुदायों में, महिलाओं से घर में रहने की उम्मीद की जाती है.

देशपांडे आर्किटेक्ट भी हैं, वे गुजराती और मारवाड़ी परिवार से आने वाली अपनी क्लासमेट का जिक्र करते हुए बताती हैं कि उन्हें ग्रैजुएशन की पढ़ाई करने के बाद नौकरी करनी की अनुमति नहीं मिली.

आधारभूत सुविधाओं की स्थिति

दीपाली देशपांडे के मुताबिक़ हर जगह महिलाओं के लिए बराबरी के अवसर हैं लेकिन सरकारी और निजी क्षेत्रों में खेल कोटे से मिलने वाली नौकरियों में महिलाओं के लिए बराबरी के अवसर नहीं हैं, कई पद पुरुषों के लिए आरक्षित होते हैं.

2010 के दिल्ली कॉमनवेल्थ खेलों के आयोजन के बाद आधारभूत सुविधाओं की स्थिति थोड़ी बेहतर जरूर हुई है लेकिन अभी भी यह अंतरराष्ट्रीय स्तर के सामने कहीं नहीं ठहरता.

बिलिमोरिया बताती हैं, "पिछले दिनों मैं स्पोर्ट्स गियर (कपड़े, जूते और अन्य सामान) बनाने वाली कंपनी अंडर आर्मर के मुख्यालय में थी. अमरीका के बाल्टीमोर स्थित इस मुख्यालय में जाकर पता चलता है हम कितने पीछे चल रहे हैं. झटका लगता है. हमारे यहां जो व्यवस्था है उसमें तो वह सुविधाएं आ ही नहीं सकतीं."

एक्सपोजर और लोकप्रियता, दोनों लिहाज से क्रिकेट सबसे प्रभावी खेल है. कुछ विश्लेषकों के मुताबिक इससे दूसरे खेलों को नुकसान होता है. यहां तक कि भारतीय महिला क्रिकेट टीम को भी ना तो मीडिया से ना ही फैंस वह समर्थन मिलता है जो पुरुषों की टीम को मिला हुआ है.

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Image caption इंटरनेशनल शूटर मनु भाखर, टेबल टेनिस खिलाड़ी मनिका बत्रा और बॉक्सर मेरी कॉम

भारत जैसे विशाल देश की चुनौतियां

17 साल की उम्र में कई इंटरनेशनल मेडल जीत चुकी हरियाणवी निशानेबाज मानू भाखर के पिता राम किशन भाखर कहते हैं, "क्रिकेट पूरी तरह से खेल संस्कृति को निगल चुका है. हमारे एशियाई, कॉमनवेल्थ और वर्ल्ड चैंपियनों को क्रिकेटरों जैसी पहचान नहीं मिलती. युवा लड़कियां खेलो इंडिया गेम्स में मेडल जीत रही थीं लेकिन अखबारों में हार्दिक पांड्या की अधनंगी तस्वीरें छप रही थीं."

भारत जैसे विशाल देश की चुनौतियां अपनी जगह हैं लेकिन अगर ग्रामीण स्तर तक खेल की सुविधाएं पहुंचती हैं तो बड़े पैमाने पर महिला एथलीट सामने आ सकती हैं. कई विश्लेषकों का मानना है कि खेल कूद अभी भी शहरी संस्कृति के संरक्षण में है क्योंकि यहां कोचिंग और पोषण की बेहतर सुविधाएं उपलब्ध हैं.

सुधा सिंह बताती हैं, "कुछ गांव तो बहुत ही छोटे हैं, वहां कोई जागरूकता नहीं पहुंची है. उन ग्रामीणों को प्रतियोगिताओं के बारे में कोई जानकारी नहीं है क्योंकि वे अपने खेतों में मजदूरी करते हैं, घरों तक सीमित हैं वे लोग. अगर हम उन लोगों तक पहुंचें तों हमें अच्छे एथलीट मिलेंगे."

वहीं शिरूर बताती हैं, "मुझे ये स्वीकार करने से नफरत है लेकिन महिलाओं को मजबूत होना होगा और जो लड़के कर सकते हैं उसे करने के लिए सक्षम भी होना होगा. इसके लिए महिलाओं को सांस्कृतिक परंपराओं और तौर तरीकों की बेड़ियों को तोड़ना होगा."

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